अखिलेश जी, फुर्सत मिले तो तारिक कासमी के बेटे को भी सुन लीजिएगा

राजीव यादव

लोकतंत्र के राजकुमारों से फुर्सत मिले तो 10 साल पहले 12 दिसबंर 2007 को आजमगढ़ से उठाए गए तारिक कासमी के बेटे जो गिरफ्तारी के वक्त ढाई साल के थे, को सुनने की कोशिश कीजिएगा। शायद आप उसके दर्द को महसूस कर सकें और उसके सवालों के हल तलाशने की कोशिश कर सकें...

मेरे अब्बू का नाम हकीम तारिक कासमी है, मुझे अपने अब्बू के बारे में बस इतना याद है कि वो मुझे बहुत प्यार करते थे और मेरे लिए बहुत अच्छी-अच्छी चीजें लाते थे। वे कहते थे कि मैं तुझे खूब पढ़ाउंगा और बड़ा आदमी बनाउंगा।
मगर अचानक एक दिन ऐसा आया कि हमारे अब्बू हमसे जुदा हो गए और आज तक वापस न आए।
एक सबेरा ऐसा आया जब अपने हुए पराए

उसके आगे क्या पूछो आगे कहा न जाए

यादों का झोंका आते ही आंसू पांव बढ़ाए

जैसे एक मुसाफिर आए और एक मुसाफिर जाए
मैं कुरान, इंग्लिश, मैथ, उर्दू, नात, तराना सब पढ़ता हूं। लोग दुआएं देते हैं तो मैं सोचता हूं कि जब दूसरे लोग सुनकर इतना खुश होते हैं, तो मेरे अब्बू होते तो कितना खुश होते।

आप लोगों से गुजारिश है कि मेरे अब्बू की वापसी के लिए दुआएं करें, कोशिश करें अल्लाह ताला आपकी मदद फरमाए।

और मैं इन हवाओं से कहता हूं कि मेरे अब्बू को मेरा ये पैगाम पहुंचा दो कि वो हिम्मत न हारें वो जल्द ही वापस आएंगे और अपनी गोद में लिए-लिए हमें फिरेंगे...

तेरे आने की जब खबर महके

तेरी खुशुबू से सारा घर महके...