जिस अपराध में दयाशंकर भागे फिर रहे हैं उसी अपराध में मायावती, नसीमुद्दीन, राजभर खुलेआम क्यों घूम रहे हैं.
मनीष कुमार
राजनीति के रंग समझना इतना सरल नहीं होता. यूपी में भाजपा और बसपा के बीच चल रही खीचतान से ये स्पष्ट हो गया है. इसमें समाजवादी की सरकार और उसकी पुलिस रेफरी की भूमिका में तो है लेकिन, अपने मन से निर्णय लेने की उसकी क्षमता जाती रही है या खुद कुछ न करने की राजनीतिक चाल है.
जिन धाराओं के तहत भाजपा के उपाध्यक्ष रहे दयाशंकर सिंह के खिलाफ मुकदमा दर्ज हुआ और यूपी पुलिस ने बसपाईयों को उनकी गिरफ्तारी का भरोसा दिया, लगभग उन्हीं धाराओं के तहत मायावती, नसीमुद्दीन सिद्दिकी और रामअचल राजभर के खिलाफ भी दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वीति ने मुकदमा दर्ज कराया है।...लेकिन, हैरत की बात ये है कि एक बार भी इन तीनों आरोपियों को गिरफ्तार करने की बात सुनाई नहीं पड़ी.

और भी हैरत की बात तो ये है कि भाजपाईयों ने भी गिरफ्तारी पर कोई खास जोर नहीं दिया है. उनका आन्दोलन बेटी बचाओ के तर्ज पर हो रहा है ना कि आरोपी बसपा नेता की गिरफ्तारी को लेकर.

आखिर क्यों भाजपा गिरफ्तारी की मांग को जोर शोर से नहीं उठा रही है?
आश्वासन किसी भी विरोध प्रदर्शन के लिए जहर जैसा होता है. कोई भी आन्दोलन हो, पुलिस और प्रशासन या फिर सरकार का कोई मंत्री आन्दोलित लोगों को मांगें माने जाने का आश्वासन देकर शांत करा लेते हैं। लेकिन, फिर शायद मांगों के उपर अपने तरीके से अमल करते हैं. यूपी पुलिस का भी कुछ ऐसा ही चरित्र अब तक देखने को मिला है.
गुरुवार को लखनऊ के हजरतगंज में बसपाईयों के दयाशंकर की गिरफ्तारी की मांग को लेकर जो उग्र प्रदर्शन हुआ, उस समय पुलिस ने आश्वासन दिया था कि 36 घण्टे के अंदर दयाशंकर को गिरफ्तार कर लिया जायेगा. शनिवार की शाम तक ये समय सीमा पूरी हो जायेगी लेकिन, अभी तक गिरफ्तारी तो दूर दयाशंकर के बारे में किसी भी जानकारी से भी पुलिस इनकार कर रही है. सक्रियता दिखाने के लिए दयाशंकर के ठिकाने पर तथाकथित रेड किया था पुलिस ने, लेकिन गंगाजल फिल्म की तरह आरोपी को शायद पुलिस की भनक पहले ही मिल गयी थी और वो गायब हो गया. आन्दोलन भी खत्म हो गया और शायद आश्वासन भी....
मैं किसी भी हाल में दयाशंकर सिंह का पक्ष नहीं ले रहा या उनकी करतूत को सही नहीं ठहरा रहा, लेकिन सरकार और पुलिस के सामने ये सवाल तो उठता ही है कि जिस अपराध में दयाशंकर भागे फिर रहे हैं उसी अपराध में मायावती, नसीमुद्दीन सिद्दीकी और रामअचल राजभर खुलेआम क्यों घूम रहे हैं?

सवाल भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर भी उठ रहे हैं.
भाजपा ने बसपाईयों की अभद्रता पर बेटी बचाओं नाम का आन्दोलन क्यों छेड़ दिया है. वो शायद बसपाईयों के खिलाफ प्रदर्शन नहीं कर रही है, बल्कि अपनी सुरक्षा की मांग कर रही है.
असल में ये भाजपा और बसपा की रणनीति को प्रतिबिम्बित भी करता है.
भाजपा ये मांग करते हुए आन्दोलन नहीं कर रही है कि बसपाईयों को गिरफ्तार करो बल्कि उसने मुद्दे को दूसरी तरफ मोड़ दिया है.

क्या भाजपा सवर्णों को बेटी बचाओे के नाम पर डरा रही है ?
क्या वो ये संदेश देना चाह रही है कि मायावती का राज आया तो ऐसे ही सवर्णो को भागना और छुपना फिरेगा ? आखिर भाजपा विरोध प्रदर्शन के बजाये सुरक्षा की मांग क्यों कर रही है.
इस पूरे एपिसोड में सरकार,उसकी पुलिस, विपक्षी दल और बुद्धिजीवियों की भूमिका भी खासा ध्यान देने वाली है.
गाली गलौज अपराध है और इसमें कोई आरोपी है तो पुलिस उसे गिरफ्तार करे, लेकिन पुलिस ने किसी को भी गिरफ्तार नहीं किया. दयाशंकर सिंह को वो गिरफ्तार नहीं कर पाई, जिसके लिए लखनऊ सहित पूरे प्रदेश में इतना तहलका मचा और बसपाईयों की गिरफ्तारी के लिए तो उसके उपर कोई दबाव ही नहीं है.

मुखिया अखिलेश यादव जरा ध्यान दें कि उनके सामने खुलेआम गंभीर धाराओं के आरोपी क्यों घूम रहे हैं.
क्या इसपर भी कानून व्यवस्था के खराब होने की तोहमत सरकार पर कोई लगायेगा. सारे विपक्षी, सामाजित संगठन एक सुर में चुप क्यों हैं. चैनलों की परिचर्चा में ये बात उठेगी क्या कि यूपी में कानून व्यवस्था बेहद खराब है. क्या राजभवन से भी कानून व्यवस्था पर कोई बयान आयेगा ???????