अखिलेश शासन की नीति से भाजपा को खूब खाद–पानी मिला
मसीहुद्दीन संजरी
उत्तर प्रदेश में चुनावी कसरत शुरू हो चुकी है। सपा सरकार में है। चुनाव उसके कार्यकाल पर जनमतसंग्रह होगा।
भाजपा केंद्र में सरकार में है। राज्यसभा में अल्पमत को बहुमत में बदलने के लिए यह चुनाव अहमियत रखता है। बहुजन समाज पार्टी घूमते सत्ता चक्र में अपनी बारी की प्रतीक्षा में है। कांग्रेस 27 साल बाद फिर से यूपी में अपनी खोई जमीन तलाशने में जी जान से जुटी है। उसे मालूम है कि केंद्र का रास्ता यूपी से होकर गुज़रता है।
कुछ छोटे दल जिनका किसी बड़ी पार्टी से सौदा नहीं पटा, सामाजिक न्याय की लाश लिए घूमते नज़र आ रहे हैं।
मुस्लिम नेतृत्व की पार्टियों में एकता के नारे के साथ घमासान है।

नेता तो अपना कील कांटा फिट ही कर रहे हैं धर्म गुरूओं की भी चांदी का समय करीब है।
सबसे निचले स्तर पर जनता गोश्त और शराब की प्रतीक्षा कर रही है। उसे मालूम है कि हमारे लोकतंत्र में यही नगद है बाकी सब उधार, जिसको अब तक इस व्यवस्था ने कभी चुकाया (अगर अपने और अपने कारपोरेट आकाओं का भला करते समय अगर कुछ इसे भी मिल जाता है तो उसे छोड़कर) नहीं है और नही उसकी उम्मीद है।
विकास के नारे के साथ केंद्र की सत्ता पर कब्ज़ा जमाने वाली भारतीय जनता पार्टी हर कीमत पर उत्तर प्रदेश की सत्ता हासिल करना चाहती है। लेकिन दिक्कत यह है कि विधान सभा चुनाव आते आते केंद्र में इसकी सरकार को तीन साल पूरे होने के करीब होंगे और विकास के नाम पर बताने के लिए इसके पास कुछ नहीं हैं। सरकार को भी इसका आभास है। इसीलिए सत्ता के दो साल पूरा होते ही इसने अपना ट्रैक पूरी तरह बदल दिया। योगी, प्राची, कठेरिया जैसे नेताओं को साप्रदायिकता फैलाने की खुली छूट मिल गई। अराजक कार्यकर्ता सड़को पर तांडव करने के लिए निकल पड़े।

अखिलेश शासन की लुंज–पुंज नीति से इसे खूब खाद–पानी मिला।
लेकिन बनावटी हिंदुत्व की चादर संघी विचारधारा को ज़्यादा समय तक नहीं ढंक पाई। दलितों पर संघी मांसिकता के हमलों ने दलित समुदाय को भाजपा से काट दिया। कांग्रेस के सवर्ण कार्ड ने इस दल की परीशानियों को और बढ़ा दिया है। मंहगाई ने पिछड़ों के सुनहरे सपनों को ध्वस्त कर दिया है। दूसरे दल उसमें सेंधमारी कर सकते हैं। सत्ता तक पहुंचने के लिए इसके पास साम्प्रदायिकता और अंध राष्ट्रवाद के पुराने हथियार अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा है।
इस पूंजी के साथ जीत की सम्भावना बहुत कम रह जाती है।