अघोषित तौर पर लगातार आपातकाल की चपेट में है भारतीय लोकतंत्र
अघोषित तौर पर लगातार आपातकाल की चपेट में है भारतीय लोकतंत्र
26 जून 2013 को देश पर काँग्रेस द्वारा आपातकाल थोपने की 38वीं बरसी है। बुद्धिजीवियों, विपक्षी नेताओं समेत तमाम आम लोगों को जेल में ठूँसने के जरिये इंदिरा सरकार ने विरोध के हर स्वर को कुचल देने की कोशिश की थी। आपातकाल के बाद के पहले आम चुनाव में आजादी के बाद पहली बार काँग्रेस को हार का मुँह देखना पड़ा था। और यह भी सच है कि तब से घोषित रूप से आपातकाल नहीं लगाया गया। लेकिन थोड़ा करीब से देखने पर पता चलता है कि भारतीय लोकतन्त्र अघोषित तौर पर लगातार आपातकाल की चपेट में है। पूरा देश छोटे-छोटे आपातकालों से भरा पड़ा है।
अभिव्यक्ति की आजादी और विरोध की आवाजों पर हमले इसी अघोषित आपातकाल की अभिव्यक्तियां हैं। कबीर कला मंच की शीतल साठे व उनके साथियों की गिरफ्तारी, डॉ. बिनायक सेन व सीमा आजाद जैसे कार्यकर्ताओं पर राजद्रोह के मुकदमे, फर्जी आरोपों में जीतन मरांडी जैसे संस्कृतिकर्मी को सजा, बंगलुरु की गैलरी में युवा चित्रकार अनिरुद्ध साईंनाथ कृष्णमणि की पेंटिंग प्रदर्शनी पर रोक, कश्मीर पर बनी डॉक्यूमेंटरी फिल्मों (जैसे संजय काक की जश्ने आजादी) को कैंपसों में दिखाने पर हिंदुत्ववादी गुंडों के आदेश से रोक, बाल ठाकरे की मौत पर शिव सैनिकों द्वारा थोपे गये बन्द की फेसबुक पर आलोचना करने वाली दो लड़कियों की गिरफ्तारी आदि क्या आपातकाल की याद दिलाने वाली नहीं हैं? संस्कृतिकर्मियों का दमन और उनके एक हिस्से को पालतू बनाने की प्रवृत्ति आपातकाल में थी और आज भी देखी जा सकती है।
जम्मू कश्मीर और उत्तर-पूर्व के राज्यों में सेनाओं को बना वारंट तलाशी लेने, किसी की भी हत्या करने आदि का विशेष अधिकार है और इसके लिये उनके खिलाफ मुकदमा नहीं चलाया जा सकता। कश्मीर और उत्तर-पूर्व में सैन्य बलों द्वारा महिलाओं के साथ बलात्कार की घटनायें आये दिन होती रहती हैं। कश्मीर में मिलने वाली बड़ी-बड़ी सामूहिक कब्रें वहाँ आपातकाल से भी भयावह सरकार प्रायोजित जनसंहार की गवाह हैं। ए।एफ।एस।पी।ए। जैसा दानवीय कानून इन जनसंहारों को वैध ठहराने का जरिया है। मणिपुर में इरोम शर्मिला द्वारा इस कानून के खिलाफ जारी अनवरत संघर्ष को हम सलाम करते हैं।
जहाँ ए.एफ.एस.पी.ए. जैसा कानून नहीं लागू है वहाँ ऑपरेशन ग्रीन हंट और यू.ए.पी.ए. के नाम पर जन संघर्षों का दमन जारी है। पिछले दो दशकों में सरकारें इस देश की खनिज सम्पदा व अन्य संसाधनों को बड़े कॉरपोरेट घरानों को औने-पौने दामों में देने के लिये आकुल-व्याकुल रही हैं। इसी सब के बीच लाखों करोड़ रुपयों के संसाधनों की खुली लूट जारी है। चूँकि ये सारे संसाधन जंगल और उसके आस-पास के क्षेत्रों में हैं, इसलिये वहाँ के निवासियों को भगाने के लिये तरह-तरह के हथकण्डे अपनाये जा रहे हैं। छत्तीसगढ़ में सल्वा जुडुम और अर्द्धसैनिक बलों के जरिये आदिवासियों की हत्या की जा रही है। अभी हाल ही में सल्वा जुडुम के संस्थापक महेन्द्र कर्मा की माओवादियों द्वारा हत्या को प्रधानमन्त्री ने लोकतन्त्र पर हमला करार दिया, लेकिन उसके एक हफ्ते पहले ही जब वहां सीआरपीएफ के लोगों ने निर्दोष आदिवासियों को घेर कर आठ लोगों की हत्या कर दी तो प्रधानमन्त्री से लेकर मीडिया तक सभी मौन थे।
आपातकाल के दौरान हर विरोध की आवाज को देशद्रोही बताने का सरकारी चलन था, आज यह और भी बढ़ गया है। पुलिस नृशंस तरीके से अल्पसंख्यकों की गिरफ्तारी और हत्या करती है और इसका विरोध करने वालों को देशद्रोही करार दे दिया जाता है। परमाणु संयंत्र के जरिये गरीबों की रोजी-रोटी छीनने का विरोध करने वाले कुडनकुलम के आम गरीबों और कार्यकर्ताओं को भी देशद्रोही करार दिया जाता है। मारुति फैक्ट्री के कामगारों का सिर्फ पुलिस दमन ही नहीं होता, उन्हें झूठे मुकदमों में भी फँसाया जाता है। नोएडा में मजदूरों को झूठे मुकदमों में फँसाकर कई महीने जेल में रखा गया। उड़ीसा में पॉस्को विरोधी आन्दोलन हो या उत्तराखंड का कोकाकोला विरोधी आन्दोलन, कैम्पसों में छात्रों के आन्दोलन हों या खेत मजदूरों और ग्रामीण गरीबों के आन्दोलन, हर जगह राज्य दमन का एक ही ढर्रा कायम है।
इन दिनों पूँजी जितने गहरे संकट से गुजर रही है, उससे उबरने के लिये उसे और भी ज्यादा दमनकारी राज्य की जरूरत है। कॉरपोरेट घरानों और कॉरपोरेट मीडिया द्वारा नरेन्द्र मोदी को अगले प्रधानमन्त्री के रूप में प्रचारित करना इसी जरूरत का परिणाम है। अब घोषित आपातकाल की जरूरत शासकों को नहीं रही, उन्होंने हजारों नये रास्ते ईजाद कर लिये हैं। लेकिन इस राज्य दमन और अघोषित आपातकाल के बावजूद आन्दोलनों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। देश का शायद ही कोई कोना हो जिसने पिछले कुछ वर्षों में जबर्दस्त जन उभार न देखे हों। आइये इस 26 जून को आपातकाल को याद करते हुये इसे दमन विरोधी दिवस के रूप में रेखांकित करें।
जन संस्कृति मंच, दिल्ली
अशोक भौमिक द्वारा जन संस्कृति मंच, दिल्ली के लिये जारी। संपर्क : 9811120184


