अति पिछड़ी जातियों की राजनीतिक सहभागिता का उमड़ता सवाल
देवेन्द्र कुमार
बिहार की राजनीति में काफी सम्मान के साथ याद किये जाने वाले, समाजवादी धारा के अगुआ स्व. कर्पुरी ठाकुर ने पहली बार पिछड़ी जातियों को वर्गीकृत करते हुये अतिपिछड़ी जाति की अवधारणा को राजनीतिक स्वीकृति प्रदान की थी। यह वह सामाजिक समूह था जो अपनी राजनीतिक- सामाजिक आर्थिक एवं शैक्षणिक वंचना से मुक्ति के लिये तत्कालीन सत्तासीन समूहों से संघर्ष में पूरी शिद्दत के साथ पिछड़ों का साथ देता रहा था। पर सच्चाई यह भी थी कि आर्थिक-सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से बेहद कमजोर और जातीय रूप से छोटे- छोटे टुकड़े में बँटा इन समूहों का जमीनी स्तर पर पहला टकराव दबंग पिछड़ों से ही था। और इस बात की पूरी आशंका थी कि यदि इनके लिये अलग से सुरक्षात्मक उपाय नहीं किये गये तो सत्तासीन समूहों से संघर्ष में निकला अमृत दबंग पिछड़े ही गटक जायेंगे ।
स्व. कर्पूरी ठाकुर ने सरकारी नौकरियों में पिछड़ों के आरक्षण को दो भागों में वर्गीकृत कर अति पिछड़ों की हिस्सेदारी को सुनिश्चित तो कर दिया। पर 90 के दशक से चले उदारीकरण के दौर ने सरकारी नौकरियों की संख्या ही सीमित कर दी। ऊपर से अपने को स्व. ठाकुर का शिष्य बताने वाले लालू यादव ने राजनीति तो पिछड़ों एवं वंचितों के सामाजिक- न्याय के नाम पर की। पर यह सामाजिक न्याय की लड़ाई एक सीमा के बाद गतिरोध का शिकार हो गयी। सामाजिक टोटकों और राजनीतिक प्रतीकों से आगे बढ़कर इन समूहों के आर्थिक सशक्तीकरण की कोई योजना नहीं बनी और खुद पिछड़ों में अंतर्द्वन्द्व पैदा हो गया। कानून-व्यवस्था एक जाति विशेष के दबंगों के हाथ का खिलौना बन कर रह गया। बिहार की पहचान एक अराजक राज्य और समाज के रूप में तो पहले से बनी ही हुयी थी, उसमें और भी आक्रमकता आ गयी और बिहारी जो एक गाली के रूप में पूर्व से ही स्थापित हो चुका था, का प्रकटीकरण और भी तीव्रता के साथ हुआ।
इसी सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में अतिपिछड़ा और दलित जातियों का ध्रुवीकरण तथाकथित उच्च जातियों के साथ हुआ। यद्यपि यह दो नितान्त विपरीत धाराओं का मिलन था और इसके केन्द्रबिन्दु थे सूबे बिहार के सूबेदार नीतीश कुमार। पिछड़ी जातियों ने नीतीश कुमार में अपना चेहरा देखा तो कथित ऊँची जातियों ने कुमार को लालू से मुक्ति का उपकरण माना। सत्ता मिलते ही कुमार को यह एहसास हो गया कि एक लम्बी राजनीतिक पारी के लिये इस सामाजिक समीकरण को अपनी ओर बनाये रखने के लिये ठोस उपाय करने होंगे।
कहा जा सकता है कि अपने जनाधार को स्थाई बनने हेतु ही पंचायत चुनाव में अति पिछड़ों एवम् दलित-महादलितों को आरक्षण प्रदान किया गया। पर थी यह एक युगान्तकारी घटना। अति पिछड़ी जातियों और महादलितों के लिये चुनाव लड़ना ही एक अफसाना था और इस अफसाने को हकीकत में बदलने की प्रक्रिया की शुरुआत नीतीश कुमार ने की। कल का मंगरुआ और डोमना आज चुनावी दंगल में दो- दो हाथ करने को तैयार हो गया। इतिहास में पहली बार उसे नियन्ता बनने की छूट मिली। ग्रास रुट पर ही सही सत्ता में भागीदारी मिली। कथित लोकतंत्र में सहभागिता और समभागिता का अवसर मिला। सच माना जाय तो लोकतंत्र की जीवंतता को भी बल मिला। एक अमुक और क्रांतिकारी बदलाव की सरजमीन तैयार कर दी गयी। जिसकी सकारात्मकता आने वाले एक- दो दशकों में साफ- साफ दिखेगा। यह एक एैसी पौधशाला है जहाँ भविष्य के नेतृत्व तैयार हो रहा है। अब सवाल यह है कि ग्रासरूट डेमोक्रेसी से शिक्षित- प्रशिक्षित हो कर निकले इन युवाओं का आगे का सफर क्या होगा। क्या उन्हें पंचायत की सीमाओं से आगे निकल राज्य और राष्ट्र का प्रतिनिधित्व का अवसर भी मिलेगा। अनुसूचित जातियों को तो लोक सभा और विधान सभा में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था की गयी है। परन्तु अति पिछड़ों की बेबसी का क्या होगा ?
इसे देश में सैकड़ों ऐसी जातियाँ हैं जिनकी जनसंख्या बेहद न्यून है। यद्यपि इन्हें एक साथ जोड़ा जाय तो एक बड़ी आबादी बनती है। इनका आर्थिक-सामाजिक और शैक्षणिक स्तर बेहद गंभीर है। बल्कि अनुसूचित जाति और जनजाति से भी बदतर है। विधायिका में इनकी उपस्थिति लगभग शून्य है। एक सफल और जीवंत लोकतंत्र के लिये यह घातक है।
आज समय की माँग है, लोक सभा और विधान सभा में इन वंचित जातियों के समुचित प्रतिनिधित्व के लिये, लोकतंत्र की जीवंतता और वैघानिकता के लिये वैधानिक उपबंध बनाये जायें और यही वह सवाल है जहाँ सारी राजनीतिक पार्टियाँ चुप हैं। अति पिछड़ों के कथित चैम्पियन नीतीश कुमार इस मुद्दे पर कुछ ज्यादा बोलने को तैयार नहीं, तर्क है अति पिछड़ों को राष्ट्रीय स्तर पर चिह्नित करना और वैधानिक उपवंध बनाना केन्द्र का दायित्व है। तर्क दुरुस्त है पर सच्चाई यह है कि अनुसूचित जाति और जनजाति की तरह अतिपिछड़ों के लिये भी विधायिका में आरक्षण की माँग पुरानी है। पर चूँकि राष्ट्रीय स्तर अति पिछड़ों की कोई पहचान नहीं है, उनका कोई नेतृत्व नहीं है। उनकी आवाज नक्कारखाने में तूती की आवाज बन कर खो जाती है। पर कशमकश हर जगह बरकरार है। यदि कोई सक्षम नेतृत्व जोखीम ले इस मुद्दे को उठाता है तो निश्चित रूप से उसे एक राष्ट्रीय पहचान और व्यापक पकड़ मिलेगी।
जरूरत है कि राष्ट्रीय स्तर पर अति पिछड़ों को चिह्नित करने के लिये आयोग का गठन किया जाय और इसका पैमाना आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक स्तर के साथ ही विधायिका में {लोक सभा, राज्य सभा और संबधित राज्य का विधान सभा में}, उसकी उपस्थिति को भी बनाया जाय। क्या नीतीश कुमार जो खुद को अति पिछ़डों का चैम्पियन मान बैठे हैं, इस जोखिम को उठायेंगे ?
देवेन्द्र कुमार, लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं। मगध विश्वविद्यालय से मनोविज्ञान में एम.ए., एल एल बी, भारतीय विद्या भवन, मुम्बई से पत्रकारिता की डिग्री। क्षेत्रीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों, पत्र-पत्रिकाओं में सामाजिक-राजनीतिक विषयों पर आलेखों का प्रकाशन, बेव मीडिया में सक्रिय व लेखन। छात्र जीवन से ही विभिन्न जनमुद्दों पर सक्रियता। विभिन्न सामाजिक संगठनों सें जुड़ाव।