रोहिणी अग्रवाल
लोक-स्मृति में रचे-बसे किस्से आज के उत्तर आधुनिक परिदृश्य में हवा हो गए हैं, जैसे इंसान को परिभाषित करने वाले मूल्य और संवेदनाएं। अपनी ही बेख्याली में खोई नई पीढ़ी नहीं जानती कि सांस्कृतिक चेतना की संवाहक लोक-कथाएं काल की सरहदों से मुक्त कर व्यक्ति के भीतर जीवन का स्पंदन, राग और लय भरती हैं। जानते हैं सत्यनारायण पटेल। इसलिए महानगरीय सभ्यता में आत्म-विस्मृति का जीवन जीते व्यक्ति को जब वे कहानी नहीं, किस्सा सुनाने लगते हैं, तब विज्ञान और तकनीक की भूलभुलैया में हड़बड़ाए ’मानुष’ को अनायास अपनी कहन-शक्ति में बांध लेते हैं; और फिर सूखी जमीन पर भीतर-भीतर धंसते पानी की तरह उसकी अंतश्चेतना पर सवालिया निशान बना काबिज हो जाते हैं। धर्म, राजनीति तथा प्रशासन की शह पाकर उग्रतर होती अमानवीय व्यवस्थाएं मनुष्य पर थोपी गईं अनिवार्यताएं तब तक हैं जब तक उनका प्रतिकार करने के लिए वह अपनी अंतःशक्तियों को संगठित कर रचनात्मक रूप नहीं देता।
सत्यनारायण पटेल ’न्याय’ के आमिर की आक्रोशमयी पीड़ा या ’का़फिर बिजूका उर्फ इब्लीस’ के बिजूका की स्वप्नशीलता को कोई निश्चित सिरा देने का दावा नहीं करते, लेकिन हौले से उनके परिपाश्र्व में बंजारा बांध और घट्टी वाली माई की पुलिया बनाने में जुटी संकल्पदृढ़ता और आशावादिता को रख देते हैं। स्याह अंधेरों को अपने हौसलों के बूते चीर देने का विश्वास इस संग्रह की कहानियों की ताकत है जो सबसे पहले अपने भीतर पसरे अंधेरों को चीन्हने की तमीज देता है। शायद इसीलिए बिजूका की तरह अपने मानवीय वजूद का उपहास सहता आम आदमी उनकी कहानियों में क्रमशः निखरता हुआ व्यवस्था की कठमुल्ला ताकतों के लिए पहले काफिर बन जाता है और फिर इब्लीस।
सचमुच अद्भुत किस्सागो हैं सत्यनारायण पटेल। भीतरी तड़प और प्रश्नाकुलता केा रोचकता का बाना पहना कर लेखक ने कहानी दर कहानी पाठक से अपने वक्त को नई आंख से देखने और नई तरकीब के साथ गढ़ने की अपील की है। भाषा का सृजनात्मक उपयोग और आडंबरहीन ईमानदार कहन-शैली कहानी को अर्थ-व्यंजक भी बनाती है और पाठक को लेखक का राज़दार भी। साझेपन की रचनात्मक आत्मीयता का विस्तार इस संग्रह की विशेषता है और वक्त की मांग भी।
सत्य नारायण पटेल का पहला कहनी संग्रह- “भेम का भेरू माँगता कुल्हाड़ी ईमान” है। इस संग्रह के लिए उन्हें “वागीश्वरी पुरस्कार” मिला। दूसरा संग्रह- “लाल छींट वाली लूगड़ी का सपना” है। इस संग्रह के लिए.. “प्रेमचन्द कथा स्मृति सम्मान”, बांदा, मिला है। यह दोनों संग्रह अंतिका प्रकाशन से प्रकाशित हुए हैं। तीसरा संग्रह- “काफ़िर बिजूका उर्फ़ इब्लीस”, आधार प्रकाशन से आ रहा है जिसकापुस्तक मेले में विमोचन होगा......
जानी-मानी आलोचक प्रोफेसर रोहिणी अग्रवाल, महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक में हिंदी की विभागाध्यक्ष एवं डीन हैं।