अन्ना भट्टा परसौल क्यों नहीं गए ?
अन्ना भट्टा परसौल क्यों नहीं गए ?
पंकज चतुर्वेदी
अन्ना दुखी है की रामदेव के अनशन पर लाठियां चलीं . पुलिस बल का इस तरह इस्तेमाल बिलकुल गलत है, लेकिन बाबा को कुछ हकीकत भी जनता को बताना चाहिए -
१- जब उनका समझौता हो गया था, जिसका ख़त देख करा बाबा भड़के, उसे जनता से क्यों छुपाया गया ?
२- जब बाबा को पुलिस अफसरों ने गिरफ़्तारी के लिए कहा तो उन्होंने पहले कूद फंद की, औरतों के बिच छपे, उनके कुछ समर्थक पत्थर क्यों चला रहे थे. क्या इतनी भीड़ की सुरक्षा के बीच बाबा चुप-चाप गिरफ़्तारी नहीं दे सकते थे ?
३- क्या बाबा का धरना क़ानूनी भाषा में अवैध नहीं था ?
४- शाम छः पचास पर केंद्र सरकार की तारीफ में तालियाँ बजवाने के बाद यदि उनकी चिट्ठी में कुछ गलत नहीं था तो भड़के क्यों ?
५- क्या बाबा ने पांच सितारा होटल में केंद्र के मंत्रियों के साथ जो समझौता किया था, उसकी ख़ुशी मामने के लिए बंगाली मार्केट के नाथू स्वीट से रसगुल्ले मंगवा कर खुद और मंत्रियों को नहीं खिलाये थे ?
यदि बाबा के चाल, चरित्र और चहरे में इतना प्रभाव है तो अन्ना हजारे और उनका सभ्य समाज अपने उद्देश्य- लोकपाल बिल का मसौदा तैयार करने से अलग हट कर धरने की नौटंकी क्यों कर रहा है ?
अन्ना को यदि पुलिस जुल्म देखना था तो दिल्ली से सटे भट्टा और परसौल गाँव में जाते , उनके बीच चुगम में जा कर देखते, हाल ही में बिहार के अररिया में पुलिस की गोली से चार मुसलमानों के मारे जाने और लाश को पुलिस वालों द्वारा पैरों से रोंदने पर दुःख जताते . ऐसा लगता है की अन्ना और उनके सभ्य समाजी, एन केन प्रकारेण सरकार से टकराव, उधम , हंगामे के लिए जमीं तैयार कर रहे हें , यह उनका उद्देश्य से भटकना उनकी नियत पर सवाल खड़ा करता है . विशेष रूप से उनके साथी केजरीवाल तो हर समय आँखे लाल और धमकी वाले अंदाज़ में ही रहते हें, या तो सब लोग मिल कर संसद को भंग करने, सत्ता सँभालने की अपनी मंशा स्पष्ट कर दो, या फिर आम लोगों की भावनाओं और उम्मीदों से अपनी दुकान चमकाने से बाज आओ
लेखक वरिष्ठ पत्रकार और साहित्यकार हैं. इस समय नेशनल बुक ट्रस्ट में सम्पादक हैं.


