अंत तक नयी रचनाशीलता और नवीनतम सैद्धांतिक प्रविधियों के
सजीव कोष बने रहे परमानंद श्रीवास्तव
आशुतोष कुमार

सन् पचासी रहा होगा। पटना के कवि- लेखक समाज में हफ्तों से उत्तेजना थी। परमानंद जी आने वाले थे। बाकायदा रणनीतियां बन रही थीं कि कैसे उनका ध्यान अधिक से अधिक अपनी और खींचा जा सके। गोष्ठी- स्थल पर कहाँ कौन बैठे, कौन किसके साथ दिखाई पड़े, किस के साथ बड़ा गोल नज़र आये, क्या कह दिया जाए कि परमानंद जी की नोटिस में आये बिना न रहे। यह सब खींचतान उन लेखकों में चल रही थी, जो तब तक राष्ट्रीय क्या अंतर्राष्ट्रीय ख्याति हासिल कर चुके थे। आज ये बातें अतिशयोक्ति जान पड़ें, लेकिन तब परमानद जी का वैसा ही जलवा था।

दीवानावार पढ़ना और दोनों हाथों से लिखना। यह तो परमानंद जी के सिवा और आलोचकों की भी फितरत है। लेकिन पढ़ा -लिखा सब सब को लगता नहीं। परमानंद जी किसी रचना के बारे में दो लाइनें भी लिखें तो इतना तो पता चल ही जाता था कि उस कृति की नाभि कहाँ है।

समकालीन कविता की पहचान बनाने वाले, उसके व्याकरण की रूपरेखाएं आंकने वाले, उसके अपने आलोचक परमानंद जी ही थे। प्रगतिशील वाम दृष्टिकोण से आजीवन जौ भर भी विचलित न हुए।लेकिन सतही समाजशास्त्रीय प्रणाली और जड़-इतिहासवादी छद्म- आलोचना की छाया उन्होंने अपने लिखने पर न पड़ने दी।

आशुतोष कुमार, लेखक प्रख्यात साहित्यकार व सामाजिक कार्यकर्ता हैं।

वे अंत तक नयी रचनाशीलता और नवीनतम सैद्धांतिक प्रविधियों के सजीव कोष बने रहे।

हाथ से लिखे अपने नन्हे पोस्टकार्डों के अनवरत सिलसिले के बल पर हमन जैसे 'चालाक काहिल' शख्स से भी उन्होंने 'आलोचना' के लिए कुछ लेख लिखवा ही लिए। बिना कुछ किये धरे आलोचक कहलाने के हमारे अयाचित सौभाग्य का अधिकतर जिम्मा आप पर ही है। इसके लिए हम-आप उन्हें कोसना चाहें तो यही मौक़ा है।

अपनी धारदार कलम से हमारा मुंह बंद करने अब वे कहाँ आयेंगे !