अपने पूर्वाग्रहों को दुरस्त करिये थानवी जी
अपने पूर्वाग्रहों को दुरस्त करिये थानवी जी
पिछले रविवार 'जनसत्ता' के अपने लेख में ओम थानवी ने 'साहित्य में सीआईए' शीर्षक अपने लेख में स्वयं को मिले शमशेर सम्मान का जिक्र करते हुये प्रख्यात आलोचक वीरेन्द्र यादव जी के विषय में लिखा था कि "कुछ कट्टर मार्क्सवादियों को मेरा चयन खल गया। इनमें एक वीरेन्द्र यादव कार्यक्रम में तो नहीं बोले, पर घर लौटकर फेसबुक पर सम्मान के संस्थापक को कोसा"। लखनऊ के उस कार्यक्रम से जुड़े सक्रिय संस्कृतिकर्मी दीपक कबीर ने फेसबुक पर अपने पोस्ट पर इस प्रकरण पर जो लिखा है वहीं से साभार -
दो जून जनसत्ता में छपे ओम थानवी जी के लेख के बाद तीन जून को वीरेन्द्र जी (प्रख्यात आलोचक वीरेन्द्र यादव) ने ये पोस्ट लगायी थी (वाल पर देखें), अब इस बहस से सभी थक और पक से गये हैं... क्योंकि मुद्दों पर बहस पीछे छूट चुकी है और व्यक्तिगत आचरणों के पर्दाफाश करने के बहाने 'जीत-हार' या दाँव पटकने जैसी चेष्टायें सामने आने लगी हैं।
मैंने कुछ साथियों के ब्लॉक होने के बाद भी श्री ओम थानवी की पोस्ट पर असहमति के बिन्दुओं पर बहस की थी मगर फिर लगा कि एक तरह से ये सब अब अर्थहीन हो चुका है। खुद को चुप कर लिया था, खैर बातें तो तमाम हैं मगर वीरेन्द्र जी की इस पोस्ट में उठाये गये सवालों पर कई का मैं चश्मदीद रहा हूँ ..शामिल हूँ.. इसलिये मैंने कहा था की मैं लिखूँगा .., कुछ स्वास्थ्य की उलझनों में तीन दिन बीत गये ..आज जब लखनऊ के अड्डे पर देवेन्द्र भाई, सुभाष कुशवाहा जी, दयानंद पांडे, शिवमूर्ति जी, किरण सिंह, वीना राना आदि साथ थे और ये मुद्दा फिर उठा तो मुझे अपना ये अधूरा वायदा याद आया।
" इसका मूल बहस से यूँ तो कोई लेना देना नहीं मगर ये व्यक्तियों की साफगोई -आचरण -विनम्रता जैसे मूल्यों से ज़रूर जुड़ा है जो एक गम्भीर और सामाजिक व्यक्तित्व के आधार तत्व हैं। शमशेर सम्मान से हम सब इससे वरिष्ठ कवि नरेश सक्सेना के प्रति स्नेह के कारण जुड़े थे जो हमारे शहर के ही हैं। तब तक ओम थानवी जी से जुड़े विवाद या बहस भी इतनी चर्चा में नहीं थे। यह स्वागत समिति मार्च में ही बना ली गयी थी। मई तक आते आते ये विवाद चर्चा में आने लगे थे। यहाँ तक सी.आई.ए. वाला प्रसंग भी हो चुका था, मेरे पैर का ऑपरेशन हुआ था। मैं बेड रेस्ट पर था। मैं बहुत अपडेट नहीं था इसलिये अखिलेश (तद्भव) जब घर देखने आये तो उनसे और वीरेन्द्र जी से भी ये ज़िक्र किया कि मामला क्या है, यह ओम थानवी जी वाला। अगर यह बिलकुल एंटी लेफ्ट बोल रहे हैं तो न ही जाया जाये क्योंकि कार्यक्रम को खराब करना उचित नहीं होगा। हम सब शामिल हैं और चुपचाप सुनना भी अजीब होगा क्योंकि मुझे तो डॉक्टरों ने वैसे भी निकलने से मना किया है। (मेरा नाम आभार -ज्ञापन में छपा था कार्ड में)
अखिलेश और वीरेन्द्र जी दोनों ने कहा कि ऐसा कुछ नहीं। शहर का कार्यक्रम है। नरेश जी का सम्मान है। हम सब जायेंगे... और बहस अपनी जगह है लेकिन हर मौके हर मंच को अखाड़ा बना देना ठीक नहीं। ...और अपनी ओर से हमें शालीन और विनम्र संवाद रखना चाहिये, यही जनवाद का तकाजा भी है ( यहाँ हुबहू वही शब्द नहीं हैं मगर उसके निहितार्थ यही थे। दो नाम इसलिये लिये क्योंकि इन्हीं दोनों से मैंने इस बारे में राय ली थी) इस पूरी व्यक्तिगत और दोस्ताना बातचीत में कहीं भी ये भाव या ज़िक्र नहीं ओम थानवी को कहाँ पुरस्कार मिल गया या बेकार कृति या लेखक है, बल्कि उस संस्मरण (मुअन जोदड़ो) के बारे में मुझे बताया भी और उस चर्चा में फैज़ की बेटी मुनीज़ा से मुलाकात के संस्मरण, असगर वजाहत की किताब (पाकिस्तान का मतलब क्या) आदि का ज़िक्र भी हुआ।
पूरे कार्यक्रम में भी जब वीरेन्द्र यादव बोले तो उन्होंने विषय पर ही अपनी बात रखी और दोनों पुरस्कृत साथियों को खुले दिल से उनकी रचनाओं पर बधाई दी। रमेश दीक्षित का पूरा भाषण ओम थानवी जी की पुरस्कृत कृति से ज्यादा उनके सम्पादन और उनकी जनतान्त्रिकता की प्रशंसा पर केन्द्रित रहा (शायद वो इस पूरे प्रसंग से अनभिज्ञ भी थे) मगर थानवी जी ने अपने वक्तव्य को अपनी वाम मित्रता / हमदर्दी ...,कम्युनिस्ट पिता के अनुभव और इन मुद्दों पर अपनी सफाई पर ज्यादा केन्द्रित किया,( हॉल में उपस्थित ज़्यादातर लोग इन विवादों / फेसबुक प्रसंगों से अनजान थे इसलिये आज मैं सोचता हूँ थानवी जी अपने बोलने के दौरान वीरेन्द्र यादव के साथ हुयी बहसों को ध्यान में रखे हुये थे और अपने स्पष्टीकरण दे रहे थे।)
अब अगर वीरेन्द्र यादव को कुछ बहस ही उठानी होती या कुछ और मंशा होती तो वो थानवी जी के बाद उनके पक्ष के बरक्स तमाम प्रतिपक्ष रख सकते थे। भले दोस्ताना लहजे में रखते,उनके पास ये मौका था, हाल में दोबारा बोलने की भी छूट थी।
जो सबसे महत्वपूर्ण बात मुझे लगती है इस कार्यक्रम के ख़तम होने और दो दिन बाद मेरे द्वारा एक छोटा नोट फेस बुक पर लिख देने के बाद 19 मई को असगर अली इंजिनियर की स्मृति सभा के बाद पहली बार वीरेन्द्र यादव जी ने मुझे बताया कि अज्ञेय वाली बहस में मार्च महीने के आस पास ही थानवी जी उन्हें ब्लॉक कर चुके हैं। यानी एक महत्वपूर्ण आलोचक जिसे बहस के दौरान उसके तथ्यों और तर्कों की वजेह से ब्लॉक कर दिया जाता है और वो मौका मिलने पर भी, ज़िक्र छिड़ने पर भी सिर्फ इस वजह से कि ये कार्यक्रम का न विषय है न सामान्य शिष्टाचार, उन प्रसंगों को मंच पर नहीं उठाता और अगर बाद में ये उसकी कमजोरी या अवसरवाद मानें जायें तो इससे ज्यादा अभद्र और अश्लील बात क्या होगी। ये भी स्पष्ट है कि शमशेर सम्मान में शामिल होने या न होने का निर्णय हम सबके पास खुला था। यही नहीं, कार्यक्रम के चार-पाँच दिन बाद एक क्रान्तिकारी लेखक संगठन के साथी ने मुझसे वीरेन्द्र यादव के कार्यक्रम में शामिल होने की भर्त्सना भी की। यानी प्रगतिशील आचरण पर यह दोहरी मार। ...और थानवी जी कह रहे हैं कि वीरेन्द्र वहाँ पर कुछ नहीं बोले ? आपको क्या लगता है प्रताप राव कदम से वीरेन्द्र जी या किसी को कोई डर था? हँसी आती है इन आरोपों पर।
"क्या कोई साझा मंच साम्प्रदायिकों और सीआईए समर्थकों का भी बनाना चाहिये" ये पोस्ट मनसे वाले प्रकरण पर बिलकुल भिन्न पोस्ट थी, जो अभी भी देखी जा सकती है। हम ओम थानवी जी को नहीं जानते थे पर वीरेन्द्र जी ने व्यक्तिगत और करीबी साथी होने के बावजूद कभी अपने पक्ष में लाने के लिये घटनाओं के विवरण नहीं दिये, उल्टा ब्लॉक होने जैसी बात को भी जब और लोग ब्लॉक हुये तब ही बताया।
कहने का मतलब यह है कि ओम थानवी जी की यह आशंका और आरोप गलत हैं कि उनको पुरस्कार मिलने से वीरेन्द्र जी को बुरा लगा। अगर मैं ब्रेख्त के नाटक 'अपवाद और नियम' को याद करूँ तो थानवी जी को ऐसा लगा चूँकि उन्होंने वीरेन्द्र जी को बहस के दौरान ब्लॉक कर दिया था। इसलिये नियमतः उन्हें चिढ़ना ही चाहिये और ये चिढ़न उन्हें मंच पर निकालनी ही चाहिये थी मगर जैसा कि ब्रेख्त का नाटक भी दिखाता है कि उच्च स्तर की मानवीयता ऐसे अपवादों से ही परवान चढ़ती है, क्या करें।
अन्त में, जैसा आप देख ही रहे हैं थानवी जी मुझ पर आपकी जनतान्त्रिकता का कायल होने की बात कही गयी है (वीरेन्द्र जी द्वारा ) और ये भी आप जानते हैं कि आप स्वयम् अपनी वाल पर मुझे आपसे चिर असहमत होने की बात भी लिख चुके हैं। ये स्पष्ट करता है कि मेरी सारी प्रतिक्रियायें सिर्फ और सिर्फ पढ़ी हुयी भाषा / तथ्यों पर आधारित रही हैं, किसी के प्रभाव में नहीं। इस आलोक में आप अपने पूर्वा ग्रहों को दुरस्त करेंगे ऐसी उम्मीद है। हाँ आप अपनी बहसों और पक्षधरताओं को पूरी ताकत से आगे बढ़ाइये उसमें कोई आग्रह नहीं है।
मुद्दों के आधार पर मैं एलानिया पूरी तरह वामपंथी हूँ यह भी आप सब जानते हैं।


