पिछले सप्ताह देश के पृथक-पृथक् हिस्सों में चार महत्वपूर्ण घटनाएं हुईं। मणिपुरी लड़की थंगजाम मनोरमा हत्याकांड में लगभग एक दशक से दबाकर रखी गई न्यायिक जांच रिपोर्ट को हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय को सौंपा गया। इस जांच रिपोर्ट में इस हत्या को 17 असम रायफल्स के जवानों का "क्रूर और निर्दयी अत्याचार" करार दिया गया है। एक अन्य एतिहासिक फैसले में साढ़े चार साल पुराने कश्मीर के माछिल फर्जी एनकाउंटर केस (machil fake encounter case ) में दोषी पाए गए कर्नल समेत सात सैन्यकर्मियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई तो जनसंगठनों ने उड़ीसा सचिववालय के सामने 14 नवंबर 2012 भालीगुडा फर्जी एंकाउंटर की निंदा करते हुए 14 नवंबर 2014 को धरना दिया। जनसंगठनों ने फर्जी एंकाउंटर केस की उड़ीसा उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश से जांच कराए जाने की माँग करते हुए हत्यारे पुलिसकर्मियों के विरुद्ध भारतीय दंड संहिता की दारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करने की माँग की। उधर जम्मू-कश्मीर के बड़गाम जिले में पिछले दिनों फायरिंग में मारे गए दो किशोरों की मौत पर सेना ने अपनी गलती मानते हुए मृतकों के परिजनों को 10 लाख का मुआवजा देने की घोषणा की।
माछिल फर्जी मुठभेड़ मामले के बाद कश्मीर घाटी में दो माह तक आंदोलन चला था जिसमें 123 लोगों की जान जाने की ख़बरें आई थीं। उस समय सेना ने दावा किया था कि उसने माछिल सेक्टर में तीन घुसपैठियों को मार गिराया है। मृतकों के रिश्तेदारों की ओर से की गई शिकायत के बाद पुलिस ने प्रादेशिक सेना के एक जवान और दो अन्य को गिरफ्तार किया था।
बडगाम फायरिंग पर रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता का मीडिया में यह कहते हुए बयान आया था कि 'खुफिया सूत्रों से जानकारी मिली थी कि आतंकवादी 3 नवंबर को सफेद मारुति कार के जरिए हमला कर सकते हैं, जिसके चलते नौगाम से पुलवामा रोड के बीच 3 चेकपोस्ट लगाए थे। तकरीबन 5 बजे एक सफेद मारुति कार पहली चेकपोस्ट से गुजरी जिसे जवानों ने रोकने की कोशिश की। लेकिन कार नहीं रुकी।' प्रवक्ता ने कहा था कि 'दूसरे चेकपोस्ट पर भी कार को रोकने की कोशिश की गई लेकिन वह उसे नहीं रोक सके। तीसरी चेकपोस्ट पर जब कार नहीं रुकी, तब जवानों ने फायरिंग की। इसमें कार सवार घायल हुए जिन्हें श्रीनगर के आर्मी हॉस्पिटल ले जाया गया। फायरिंग में दो की मौत हो गई जबकि गंभीर रूप से घायल दो का इलाज किया जा रहा है।'
इस हत्याकांड के विरोध में बाढ़ की आपदा से जूझ पहा कश्मीर एक बार फिर अशांत हो गया था और वहां विरोध प्रदर्शन हुए थे।
32 वर्षीया तंगजम मनोरमा देवी को मणिपुर स्थित उनके घर से सुरक्षा बल के जवानों ने हिरासत में लिया था। 11 जुलाई, 2004 को गोलियों से छलनी हुआ उनका शव सड़क पर पड़ा मिला। मनोरमा की मौत की वजह से क्षेत्र में अनेक विरोध प्रदर्शन हुए थे। अपराध जांच विशेषज्ञों की रिपोर्ट के मुताबिक मणिपुर में मारी गई मनोरमा देवी के कपड़ों में वीर्य के निशान पाए गए। उस वक्त अधिकारियों का कहना था कि मनोरमा के संबंध एक चरमपंथी गुट से था। इस हत्याकांड के विरोध में इंफाल के कांगला फोर्ट स्थित असम राइफल्स मुख्यालय के सामने करीब तीन दर्जन मणिपुरी औरतें निर्वस्त्र होकर हाथों में ‘इंडियन आर्मी हमारा बलात्कार करो’ का प्ले कार्ड लेकर सड़कों पर उतर आई थीं।
मानवाधिकार संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच का कहना है कि भारत सरकार 2004 में कथित हत्या और बलात्कार की शिकार महिला को न्याय दिलाने में विफल रही है।
'द ह्यूमन राइट्स वॉच' ने 79 पृष्ठ की रिपोर्ट “'These Fellows Must Be Eliminated': Relentless Violence and Impunity in Manipur “ सितंबर 2008 में जारी की थी। रिपोर्ट में कहा गया था, "हत्या और संभावित बलात्कार के इस मामले में जिसे 2004 में आसाम राइफ़ल्स ने अंज़ाम दिया, मनोरमा देवी को अब तक न्याय नहीं मिला है।"
रिपोर्ट का कहना है कि भारत की सरकार सेना और पैरामिलिटरी बल की हिरासत के दौरान जाने वाली ज़्यादतियों को रोक पाने में विफल साबित हुई है।
राष्ट्रीय सुरक्षा और सेना के नाम की नैतिकता के नाम पर राज्य सरकार इन लोगों का बचाव करती है। इससे मणिपुर के निवासियों के पास न्याय पाने के लिए कोई रास्ता नहीं रहता।
रिपोर्ट में भारत की सरकार से अपील की गई थी कि वह सेना, पैरामिलिटरी और पुलिस के उन लोगों को सज़ा दें जो मणिपुर में इस हत्या के ज़िम्मेदार हैं।
ह्यूमन राइट वाच की मीनाक्षी गांगुली ने कहा था, "सुरक्षा बल क़ानून का पालन नहीं करते और चरमपंथी होने का शक होने पर न्यायाधीश के सामने लाने की बजाय उन्हें मार डालते हैं।"
अब इस हत्याकांड में न्यायिक जांच आयोग की जो रिपोर्ट आई है उसमें असम राइफल्स को जांच में दया और त्याग की भावना को खारिज करने के लिए दोषी पाया गया है। जांच में पाया गया कि मनोरमा को मारी गई 16 गोलियों में से एक भी उसकी टांग में नहीं लगी। जांच में असम रायफल्स की आत्मरक्षा में गोली चलाने की थ्योरी को नंगा झूठ “naked lie” कहा गया गया है।
इसी तरह 14 नवंबर 2012 को उड़ीसा के कंधमाल व गजपति-गंजम जिले की सीमा पर भालीगुडा फॉरेस्ट एरिया में दक्षिणी क्षेत्र के डीआईजी व गंजम जिले के पुलिस अधीक्षक ने एक प्रेस कांफ्रेंस करके घोषणा की थी कि एक एंकाउंटर में 5 माओवादी मारे गए। लेकिन सत्यता इसके विपरीत थी। उड़ीसा के मानवाधिकार कार्यकर्ता नरेंद्र मोहंती का दावा है कि कंधमाल जिले के पाँच निर्दोष दलित-आदिवासी समुदाय को लोगों की बड़ी बेरहमी से हत्या कर बाद में इसे एंकाउंटर कह दिया गया।
कैम्पेन अगेंस्ट फैब्रिकेटेड केसेस उड़ीसा के राज्य संयोजक नरेंद्र मोहंती कहते हैं- आप जानते हैं कि उड़ीसा जम्मू-कश्मीर या मणिपुर जैसा पूर्वोत्तर राज्य नहीं हैं जहां सुरक्षा बल आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पॉवर एक्ट( अफ्सपा) की आड़ लेकर किसी की भी हत्या कर सकते हैं। लेकिन यहां सुरक्षाबल किसी भी नागरिक और निर्दोष व निरीह आदिवासी व दलित को माओवादी बताकर मार सकते हैं।
यह चार ख़बरें इस देश में कानून के राज के मखौल की यही तस्वीर बयां करती हैं और बताती हैं कि किस तरह एक लोकतांत्रिक राज्य में सुरक्षाबलों ने सारी शक्तियां अपने हाथों में केंद्रित की हुई हैं और अपने ही देश में यहां का नागरिक सुरक्षित नहीं है। लगता है एक आम भारतीय नागरिक को सबसे ज्यादा खतरा अब उन सुरक्षा बलों से है जिनके ऊपर देश की सुरक्षा का भार है। इससे भी बड़ी बात यह है कि हमारा मीडिया भी सुरक्षाबलों के इस नापाक काम में उनका भागीदार बनता है जब वह सुरक्षाबलों और खुफिया एजेंसियों की फर्जी एंकाउंटर की थ्योरी को अपनी खबर बनाकर तानता है।
यहां ध्यान देने की बात यह भी है कि इन एंकाउंटर्स में मरने वाले अधिकांश दलित-आदिवासी और अल्पसंख्यक होते हैं। जहां अफ्सपा लागू है वहां सुरक्षा बलों को इसके जरिए नागरिकों की हत्या कारने का अधिकार प्राप्त है ही और जहां यह लागू नहीं है वहां किसी को भी माओवादी कहकर मारा जा सकता है। एक समय था जब फर्जी एंकाउंटर्स में मरने वालों को डकैत घोषित किया जाता था, लेकिन समय बदला तो सुरक्षा द्वारा नागरिकों की हत्याओं का पैटर्न भी बदल गया। अब हर फर्जी एंकाउंटर में मरने वाला या तो अलगाववादी-उग्रवादी-आतंकी होता है या माओवादी।
मनोरमा देवी हत्याकांड में न्यायिक जांच की रिपोर्ट, माछिल एंकाउंटर केस में फैसला आने के बाद यह एकदम सही वक्त है कि जब सुरक्षाबलों को किसी भी नागरिक की हत्या करने का अधिकार देने वाला काला कानून अफ्सपा समाप्त कर दिया जाए, क्योंकि अफ्सपा की आड़ में सुरक्षाबलों द्वारा बलात्कार और महिलाओं से बदसलूकी की घटनाएं प्रभावित क्षेत्रों में आम हो चुकी हैं। अफ्सपा पूर्वोत्तर और कश्मीर में सुरक्षाबलों के लिए extra judicial killings व मानवाधिकार हनन का हथियार बन चुका है। इस काले कानून के चलते होता यह है कि हत्यारे सुरक्षाकर्मियों का मुकदमा तो सरकार सालों साल लड़ती है और सुरक्षा बलों की घटिया हरकतों के कारण पीड़ित-मृतक सालों-साल न्याय पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खाते रहते हैं। परिणामतः जो अशांत क्षेत्र हैं वहां जनमानस में भारत सरकार और भारत राज्य के लिए घृणा के भाव उत्पन्न होते हैं जिसका अलगाववादी संगठन भारत विरोध के लिए प्रयोग करते हैं।
O- अमलेन्दु उपाध्याय
अमलेन्दु उपाध्याय, लेखक हस्तक्षेप.कॉम के संपादक हैं।