प्रभात कुमार रॉय

अक्टूबर 1948 को चीन में कामरेड माओ की कयादत में कम्युनिस्ट हुकूमत का आगाज हुआ था। तभी से यानी बीते 64 वर्षो से कम्युनिस्ट पार्टी की एकाधिकारवादी और एकदलीय हुकूमत चीन की सरजमीं पर कायम है। अब चीन के नए प्रेसिडेंट और प्राइम मिनिस्टर के नामों का बाकायदा एलान कर दिया गया है। कम्युनिस्ट पार्टी के पूर्व निर्धारित निर्णय के मुताबिक सोशलिस्ट रिपब्लिक ऑफ चीन के उपराष्ट्रपति रहे शी जिनपिंग के प्रेसिडेंट निर्वाचित हो जाने का एलान हो चुका है। व्यावहारिक तौर पर 8 नवंबर 2012 के पश्चात चीन के प्रेसिडेंट शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के सेकेट्ररी जनरल के पद पर भी रहेंगे। चीनी हुकूमत के प्राइम मिनिस्टर पद के लिए ली केकीयांग और कम्युनिस्ट पार्टी के पोलित ब्यूरो के सात नए सदस्यों के नामों का भी ऐलान कर दिया गया है। शी जिनपिंग आधिकारिक तौर पर वस्तुत: मार्च 2013 से चीन के प्रेसिडेंट का ओहदा संभालेंगे।
जिनपिंग के चीनी राजसत्ता के सबसे ताकतवर पद प्रेसिडेंट के लिए चुने जाने के पूर्व विगत कुछ महीनों से चीन में जबरदस्त सत्ता संघर्ष रहा। निवर्तमान प्रेसिडेंट हू जिंताओ का इरादा था कि उनके सबसे चहेते कम्युनिस्ट लीडर ली केच्यांग देश के प्रेसिडेंट और कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना के सेकेट्ररी जनरल बनाए जाएं, परंतु हू जिंताओ से पहले चीन के प्रेसिडेंट रह चुके कामरेड जियांग ने वस्तुत: उनके इरादों पर पानी फेर दिया। समूचा विश्व जानता है कि हू जिंताओ और जियांग के बीच वर्षो से जोरदार सत्ता-संघर्ष जारी रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी में साम्यवादियों के उदारवादी और कट्टरवादी धड़ों के मध्य विगत चार दशक से तल्ख सत्ता संघर्ष जारी रहा है। 1966 में सांस्कृतिक क्रांति के दौर से प्रारंभ हुआ यह सत्ता-संघर्ष किसी न किसी रूप में निरतंर चलता रहा है। कामरेड माओ की मृत्यु के पश्चात 1979 में डेंग शिआओपिंग ने सबसे पहले कट्टर साम्यवादियों से दीर्घकालीन संघर्ष के पश्चात राजसत्ता हस्तगत की थी।
सर्वविदित है कि साम्यवादियों की एकाधिकारवादी हुकूमत के तहत चीन में मीडिया खुदमुख्तार और आजाद नहीं है, इसलिए अफवाह फैल गई कि पूर्व प्रेसिडेंट जियांग जो दीर्घकाल से अस्वस्थ रहे, उनकी मौत हो गई। मगर कुछ माह पूर्व जब कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी की मीटिंग आयोजित हुई, तब यह देखकर दुनिया को अत्यंत विस्मय हुआ कि उम्रदराज पूर्व प्रेसिडेंट जियांग तो जिंदा हैं और प्रसन्न चित्त होकर प्रेसिडेंट हू जिंताओ और पोलित ब्यूरो के अन्य लीडरों से बतिया रहे हैं। इस मीटिंग में निवर्तमान प्रेसिडेंट हू जिंताओ ने पूरी कोशिश की कि उपराष्ट्रपति शी जिनपिंग को देश का नया प्रेसिडेंट नहीं बनाया जाए। कम्युनिस्ट पार्टी की सेंट्रल कमेटी और पोलित ब्यूरो में पूर्व प्रेसिडेंट जियांग के समर्थकों का बहुमत कायम था, सो पोलित ब्यूरो के अधिकतर कम्युनिस्ट लीडरों ने हू जिंताओ की इच्छा को बाकायदा नकार दिया और शी जिनपिंग के नाम का चीन के आगामी प्रेसिडेंट के तौर पर एलान कर दिया गया। साथ ही यह एलान भी किया गया कि शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी के सेकेट्ररी जनरल का ओहदा भी संभालेंगे। उल्लेखनीय है कि साम्यवादी देशों में कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में कोई अध्यक्ष पद नहीं होता। सेकेट्ररी जनरल ही वस्तुत: पार्टी का सर्वशक्तिमान लीडर होता है और वही साम्यवादी देश का प्रेसिडेंट भी नियुक्त होता है। केवल कामरेड माओ को कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना का चेयरमैन कहकर पुकार गया और करोड़ों साधारण साम्यवादियों की ओर से कामरेड माओ को चेयरमैन का ऑनरेरी खिताब हासिल हुआ। जबकि कामरेड माओ कभी कम्युनिस्ट पार्टी के सेकेट्ररी जनरल भी नहीं रहे। 1925 में एक बार पार्टी से निकाले जाने के पश्चात अपनी वापसी पर कामरेड माओ ने बिना कोई पार्टी पद ग्रहण किए चीन में कम्युनिस्ट किसान क्रांति को अंजाम दिया था।
अब शी जिनपिंग के चीन का प्रेसिडेंट नियुक्त होने की खबर से पश्चिमी देशों में एक नई आशा की किरण जगी है। पश्चिमी देशों को संभवत: ऐसी उम्मीद है कि प्रेसिडेंट के रूप में शी जिनपिंग अन्य कम्युनिस्ट लीडरों से कुछ अलग सिद्ध होंगे, क्योंकि सैद्धांतिक तौर पर वे लोकतांत्रिक-उदारवादी विचारों के प्रबल समर्थक रहे हैं। जिनपिंग की पुत्री अपना नाम और पहचान बदलकर अमेरिका की प्रसिद्ध हारवर्ड यूनिवर्सिटी में अध्ययनरत रहीं और उसने ही पत्राचार द्वारा तथा अन्य संचार माध्यमों से अपने साम्यवादी पिता को प्रेरित किया कि वे एक बार अमेरिका आकर देखें कि वहां का लोकतांत्रिक समाज कितना खुला हुआ है। उसने अपने पिता को यह भी बताया कि अमेरिका में विचारों की अभिव्यक्ति की संपूर्ण आजादी है और मानवाधिकारों का भी कोई उल्लंघन नहीं होता। अपनी बेटी के विचारों से प्रभावित होकर प्रेसिडेंट के तौर पर चुने जाने के बाद शी जिनपिंग ने जगह जगह घूमकर कहा भी है कि राष्ट्रपति का पद जब वह बाकायदा संभाल लेंगे, तब चीनी हुकूमत के चरित्र में बुनियादी परिवर्तन लाएंगे। चीनी जनमानस को विचारों को अभिव्यक्त करने की पूरी आजादी प्रदान की जाएगी और चीन में शनै: शनै: लोकतंत्र की स्थापना हो जाएगी।