अब देश को किसानों की जरूरत ही नहीं, सच्चे 'देशभक्त' किसानों की नहीं सुनेंगे
अब देश को किसानों की जरूरत ही नहीं, सच्चे 'देशभक्त' किसानों की नहीं सुनेंगे
यह प्रतिरोध नहीं, एक डूबती हुई लम्बी करुण हिचकी है
आशुतोष कुमार
तमिल किसानों का प्रदर्शन अघोर नाटकीय हो रहा है। ठीक है। लेकिन इसी कारण तो आप इसकी चर्चा कर रहे हैं। आपको जो असहनीय और अस्वीकार्य लग रहा है, हो सकता है वह आत्महत्या से बचने की आख़िरी हताश कोशिश हो।
आख़िर किसान करे क्या ? हम भी जानते हैं, इस सब से कुछ नहीं होगा। जब लाखों आत्महत्याओं से फर्क नहीं पड़ा, तो इस अघोर कर्म से क्या पड़ेगा।
दरअसल अब देश को किसानों की जरूरत ही नहीं है। वे राष्ट्रीय बोझ हैं। जमीनें घेरे पड़े हैं टुकड़ों में। वे हटें तो जमीनें खाली हों। 'सेज़' सजें। खेती तो मशीनों से भी अच्छी हो जाएगी। वैसे भी दुनिया में बहुत फालतू अनाज है। आयात कर लेंगे। 'किसानों की आत्महत्या' एक तरह का व्यवस्था-प्रायोजित भूमि-स्वच्छता अभियान है। यह देश के तेज विकास के लिए जरूरी है।
ज़ाहिर है सच्चे 'देशभक्त' किसानों की नहीं सुनेंगे। इसलिए किसान को खुद सोचना पड़ेगा कि इस देश में किसान वोट बैंक क्यों नहीं है। और मजदूर वोट बैंक क्यों नहीं है, जो किसानों के लिए देश का चक्का जाम कर दे?
इन दो तरह के वोटबैंक बनने पर मलिकारों का राज पलट जाएगा। बिलकुल इसीलिए वे ऐसे वोटबैंक नहीं बनने देंगे।
धर्म, मजहब, जाति, भाषा के वोटबैंक बनाए ही इसलिए जाते हैं कि किसान-मजदूरों के न बन सकें।
बिलकुल इसीलिए वामपंथ को पानी पी पी कर रातदिन गालियाँ दी जाती हैं, बावजूद इसके कि राजनीतिक परिदृश्य वे लगभग अदृश्य हो चुके हैं।
आज शाम चार बजे इंडिया गेट पहुंचिए। और कुछ नहीं होगा तो किसान को हिम्मत की दोचार साँसें जरूर मिल जाएँगी। यही सोचकर पहुंचिए कि यह प्रतिरोध नहीं, एक डूबती हुई लम्बी करुण हिचकी है।


