उड़ जायेगा हंस अकेला- नहीं रहे राजेंद्र यादव
जाने-माने साहित्यकार राजेंद्र यादव का देर रात दिल्ली में निधन हो गया। बताया जाता है कि करीब 12 बजे अस्पताल ले जाते हुये उन्होंने आखिरी सांस ली। वह लम्बे समय से बीमार चल रहे थे।

पत्रिकाएं वैसे ही अकाल मौत मरती हैं ऐसे में साहित्यिक पत्रिका निकालना और उसका लगातार प्रकाशन करना राजेंद्र यादव के ही दिल-गुर्दे का काम था।

28 अगस्त 1929 को आगरा में जन्मे राजेद्र यादव ने सारा आकाश, उखड़े हुये लोग, एक इंच मुस्कान और कुल्टा जैसे उपन्यास लिखे हैं। उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुये हैं।

राजेंद्र यादव की मृत्यु की खबर पर साहित्यिक जगत ने अपने श्रद्धा सुमन अर्पित किये हैं।

जाने माने आलोचक वीरेन्द्र यादव ने कहा है, “राजेंद्र यादव जी नहीं रहे। हिन्दी साहित्य के एक अध्याय का सचमुच पटाक्षेप हो गया।”

वरिष्ठ पत्रकार आनंद प्रधान ने कहा है, “राजेन्द्र यादव का जाना हिंदी पब्लिक स्फीयर के लिए बहुत बड़ा नुक़सान है। इस समय जब जनतंत्र, धर्मनिरपेक्ष और सामाजिक न्याय जैसे मूल्यों और राजनीति को खुली चुनौती दी जा रही हो, उनकी ग़ैर-मौजूदगी खलेगी। उनकी स्मृति को नमन और हार्दिक श्रद्धांजलि।“

जनवादी साहित्यकार अशोक कुमार पाण्डेय ने कहा, “राजेन्द्र जी को तबसे जानता हूँ जबसे साहित्य पढ़ना शुरू किया। मिला कभी नहीं। हंस के आयोजन में देखा था आख़िरी बार। सोचा दिल्ली जमने के बाद उनके दफ़्तर जाऊँगा कभी। पर सुबह-सुबह दिल्ली पहुँचने के साथ उनके जाने की ख़बर मिली। क्या कहूँ. इस शहर का आगाज़ ही इतना बुरा। विदा राजेन्द्र जी। सलाम...श्रद्धांजलि।”

पत्रकार अरविंद शेष, “जड़ सामाजिक सत्तावादी सड़ांधों, बर्बर और सड़ी हुई जाति-व्यवस्था, कुंठित पुरुषवादी ब्राह्मणवाद और यथास्थितिवादी के खिलाफ़ खड़े राजेंद्र की ज्ञरूरत हमेशा बनी रहेगी...।“

स्वतंत्र मिश्र- “राजेंद्र यादव का उपन्यास 'सारा आकाश' , कुछ कहानियां साहित्य के लिए अमूल्य धरोहर हैं. राजेंद्र जी के दफ्तर जब भी गया बहुत गरमजोशी से सबका स्वागत करता हुआ पाया। उनके लिए नए- पुराने, छोटे- बड़े का कोई मतलब नहीं था। मैं पहली बार एक ऐसे अखबार के लिए उनका इंटरव्यू करने गया जिसका नाम मुझे ही याद नहीं रहता। अजय नावरिया द्वारा सम्पादित उनके इंटरव्यू की किताब में उसे भी शामिल किया गया पाया तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई. हालाँकि उनसे किया गया दूसरा इंटरव्यू जो प्रेम कुमार मणि और प्रमोद रंजन द्वारा सम्पादित होनेवाली पत्रिका 'जन विकल्प ' में छपी थी, वो ज्यादा बेहतर है. उन्होंने कभी भी अपनी आलोचना को या आलोचकों से नाराजगी नहीं पाली। राजेंद्र यादव पर जब 'पाखी' का अंक छप कर आया तो मैंने उनसे एक मुलाक़ात में पूछा कि मैंने आपकी आलोचना की आपको बुरा नहीं लगा तो उनका जवाब था- 'आलोचना के रास्ते कभी भी बंद नहीं होने देने चाहिए। खिड़कियां और दरवाजे खुले रखने चाहिए अन्यथा सड़ांध पसरने का खतरा पैदा हो जाता है. उन्हें नम आँखों के साथ आखिरी विदाई।“

शिरीश कुमार मौर्या- “उनसे असहमत होना आसान था। वे खुले घाव थे। ख़ुद को भरपूर कुरेदते भी रहते थे। अकसर उन्‍हें घायल और अपने ही घावों से मज़े लेते देखा। नई कहानी के ज़माने से ही उन्‍हें कई सारी सही-ग़लत बातों का श्रेय लेने की विवादप्रिय आदत थी। उनके जाने से एक टारगेट ख़त्‍म हो गया जिसे उन्‍होंने ख़ुद ही औरों के लिए तय कर दिया था। अब उनकी याद आएगी महज एक याद की तरह।“

डॉ. इमरान इदरीस, “हंस कल रात अपने अनिश्चितकालीन यात्रा पर चला गया। कोई अपना चला गया, हंस ने सोचना सिखाया, नयी नज़र दी... दलितों, स्त्रfयों, मुसलमानों की जगह बनाने के लिए आपकी क़लम ने जो मोर्चा लिया। निर्भय और निर्भय लोगों के सहारा, आधुनिक कबीर, जनतांत्रिक, तमाम आलोचको के आलोचक के जाने के बाद और उन्हें लोग कविता के विरोधी कहते रहे लेकिन कविता का पक्षधर उनसे बड़ा कोई नहीं दिखा। भारतीय साहित्य की सामंती ठाठ को नाक रगड़ने और आभिजात्य़ हनक को दुम दबाकर रहने को मजबूर करने वाले हंस अपनी यात्रा पर। श्रद्धांजलि।”

सुनील आचार्य- “मेरे जैसे तमाम पाठकों के लिए यह समाचार किसी सदमे से कम नहीं है। 'हंस' जब पुनः प्रकाशित करने का निर्णय उन्होंने लिया तो उस समय यह यह कोई बड़ी खबर नहीं बनी। लेकिन शायद तीन या चार अंकों के बाद ही हिंदी के साहित्यप्रेमी हलकों में इस पत्रिका को नज़रअंदाज़ करना नामुमकिन हो गया था। मैं समझता हूँ कि हंस के प्रकाशन ने आम बुकस्टाल पर कथादेश, नया ज्ञानोदय, साक्षी और वागर्थ व अन्य साहित्याभिमुखी पत्रिकाओ की उपलब्धता सुनिश्चित करने हेतु ज़मीन तैयार की। 'मेरी तेरी उसकी बात' के बीच से निकल कर मौन रहना सम्भव नहीं था। मेरी श्रद्धांजलि !”

हरे प्रकाश उपाध्याय- “साहित्य का राजहंस हमें छोड़ गया। आदरणीय राजेंद्र यादव के न रहने से हमने हिंदी साहित्य के उस आवेग, असहमति और साहस को गंवा दिया है, जिसकी भरपाई शायद ही कभी संभव हो और उसके बिना हम एक भारी निरसता और ठंडेपन का अनुभव करेंगे। अभी कल ही तो दृश्यांतर में उनके उपन्यास भूत का अंश पढ़कर मैंने टिप्पणी की थी। राजेंद्र जी के साथ मुझे भी कुछ महीनों काम करने का समय मिला था। मैंने अब तक के जीवन में उन जैसा जनतांत्रिक व्यक्ति नहीं देखा। वे हम जैसे नवोदित और अपढ़-अज्ञानी लोगों से भी बराबरी के स्तर पर बात करते थे और अपनी श्रेष्ठता को बीच में कही फटकने तक नहीं देते थे। किशन से नजरें चुराकर कवि रवींद्र स्वप्निल प्रजापति और मुझे अनेक बार उन्होंने अपनी थाली की रोटी खिलाया था। मैं जब-तब उनका हमप्याला भी बना। वे एक बार कृष्णबिहारी जी के पास अबूधावी गये थे, तो वहाँ से मेरे लिये वहाँ की एक सिगरेट का पैकेट लेकर आये थे। उन्होंने सबसे नौसिखुआ दिनों में हंस के कुछ महीनों में मुझे जो आजादी दी थी, उसे मैं भूल नहीं सकता। बाद में रोजी-रोटी और पारिवारिक जरूरतों के कारण मुझे हंस छोड़ना पड़ा था। राजेंद्र जी को जब पता चला कि हंस से अधिक मेहनताने का ऑफर एक दूसरी जगह से मुझे है, तो उन्होंने मेरी भावुकता को फटकारते हुए कहा था कि जा, तू...आगे की जिंदगी देख। तुम्हारे आगे अभी लंबी जिंदगी पड़ी है। उन्होंने हंस के संपादकीय में अगले महीने लिखा कि हमारे सहायक संपादक हरे प्रकाश उपाध्याय अब कादंबिनी में आ रहे हैं। ऐसा ही कुछ था। मैंने उनसे पूछा कि आपने जा रहे हैं, क्यों नहीं लिखा तो बोले कि तुम जा नहीं सकते मेरे यहाँ से। बाद में जीवन की आपाधापी में उनसे मिलना कम होता गया। मैंने उनसे क्या-क्या छूट नहीं ली। अपनी अज्ञानता में उन पर तिलमिलाने वाली न जाने कैसी-कैसी टिप्पणियां की, कभी एकदम सामने तो कभी लिखकर, पर उन्होंने शायद ही कभी बुरा माना। अगर माना भी हो, तो मुझे तो कम से कम ऐसा आभास नहीं होने दिया। आज यह सब लिखते हुए मैं सचमुच रो रहा हूँ। राजेंद्र जी, आपसे जो लोग निरंतर असहमत रहते थे और झगड़ते रहते थे- वे सब रो रहे होंगे। अब हमें जीवन और कोई राजेंद्र यादव नहीं मिलेगा। राजेंद्र यादव जैसा कोई नहीं मिलेगा। राजेंद्र जी का जीवन सचमुच खुली किताब की तरह है। दिल्ली के बड़े लेखकों में अगर सबसे ज्यादा उपलब्ध, सहज और मानवीय कोई था, तो राजेंद्र यादव। दिल्ली के मेरे दिनों की अगर मेरी कोई उपलब्धि है, तो राजेंद्र यादव से मिलना, उनसे बहसना और उनके साथ काम करना। बातें काफी हैं, पर मैं अभी नहीं लिख पाऊंगा और सभी तो कभी नहीं लिख पाऊंगा।“