अभिभावकों और समाज की संवेदना को झकझोरा ‘कैद’ ने
अभिभावकों और समाज की संवेदना को झकझोरा ‘कैद’ ने
नए भारत का निर्माण जनता के गुणों के जरिए होगा इसका अहसास कराया छठे पटना फिल्मोत्सव ने
बच्चों के प्रति ज्यादा संवेदनशील होने की जरूरत का अहसास कराया फिल्म और फिल्मकारों ने
जनस्वास्थ्य का मुद्दा भी उठा फिल्मोत्सव में
पटना: 7 दिसंबर । हिरावल, जन संस्कृति मंच द्वारा कालिदास रंगालय में आयोजित त्रिदिवसीय पटना फिल्मोत्सव, प्रतिरोध का सिनेमा के आखिरी दिन का पूरा एक सत्र बच्चों के नाम रहा, जिसकी शुरुआत ज्ञान प्रकाश विवेक की कहानी ‘कैद’ पर इसी नाम से बनाई गई एक बेहद मार्मिक और हृदय को झकझोर देने वाली फिल्म से हुई। एक बच्चे की चिल्लाहट से फिल्म शुरू हुई, जो एक छत पर बने कमरे में कैद में है। फिर कहानी फ्लैश बैक में लौटती है। लड़के का नाम संजू है। वह बहुत गुस्से में रहता है। बच्चों और बड़ों पर भी हमले करता है, उन्हें काट खाता है। डॉक्टर मेंटल स्ट्रेस का शिकार बताकर उसका इलाज करते हैं, पर वह ठीक नहीं हो पाता। उसके मां-बाप उसे ओझा गुनियों के पास ले जाते हैं। ओझा उस पर जिन्नात का साया बताता है। लेकिन जितना ही उसे रोगमुक्त करने की कोशिश की जाती है, उतना ही उसका मर्ज बढ़ता जाता है। संजू के स्कूल के एक शिक्षक को, जो कि बच्चों पर रिसर्च भी करता रहा है, उसे पता चलता है कि संजू तेज छात्र था। गणित में भी वह अच्छा था, पर ट्यूशन पढ़ाकर कमाई करने वाले उसके गणित शिक्षक को उसकी योग्यता नागवार गुजरती थी। वे उसे डांटते थे, और रोजाना झूठी सजा देकर बेंच पर खड़ा कर देते थे, उसकी कॉपी नहीं चेक करते थे। तब एक दिन उसने कॉपी फाड़कर फेंक दी थी। वह अपने सहपाठियों के साथ टूर में जाना चाहता था, पर हिंदी की शिक्षिका उसे नाराज रहती थी, उसके द्वारा माफी मांगने और आइंदा गलती न करने के वादे के बावजूद टूर पर उसे नहीं ले जाया जाता। वह लगातार उपेक्षित महसूस करता है। इसी उपेक्षा और डांट के कारण वह तनाव में रहता है और हिंसक होता जाता है। अंततः परिवार के लोग उसे छत पर एक कमरे में कैद कर देते हैं। वह लगातार चिल्लाता रहता है- खोल दो, निकाल दो।
यह फिल्म ‘तारे जमीन पर’ से इस मायने में भिन्न है कि यहां बच्चा बीमारी से पहले से ग्रस्त नहीं है, बल्कि डांट और उपेक्षा ने उसे बीमार और विक्षिप्त बना दिया है। इस फिल्म का परिवेश ‘तारे जमीन पर’ के बच्चे से अलग है। यहां एक आम निम्नमध्यवर्गीय परिवार है, जिसमें बाप को बच्चे की इलाज और नौकरी में से किसी एक को चुनना पड़ता है। अगर वह इलाज के लिए जाता है तो नौकरी प्रभावित होती है। उसकी बहन को छोड़कर सबको लगता है कि बच्चा पागल है, हालांकि उसकी बहन को ऐसा नहीं लगता। खैर, रिसर्चर को लगता है कि उसका गुस्सा ही इसका साक्ष्य है कि वह पागल नहीं है, वह जिंदगी में लौटना चाहता है। संजू के मनोभावों को वह ठीक से समझता है और उस पर यकीन करके उसे कैद से मुक्त करता है। इस फिल्म के संवाद लेखक ज्ञानप्रकाश विवेक और हनीफ मदार तथा रिसर्चर की भूमिका सनीफ मदार तथा संजू की भूमिका किशन ने निभाई थी।


