नई दिल्ली। नरेंद्र दामोदरदास मोदी के प्रधानमंत्री नामित होते ही देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर काले बादल छाना शुरू हो गए हैं। मोदी के लंपटों की फौज लेखकों और पत्रकारो को लगातार धमका रही है। 2014 के आम चुनावों के परिणाम आते ही कन्नड़ के प्रख्यात साहित्यकार यू आर अनंतमूर्ति को डराने-धमकाने की जो हरकतें सामने आयी हैं, वे बेहद चिंताजनक और निंदनीय हैं .

जनवादी लेखक संघ की विज्ञप्ति में कहा गया है कि श्री अनंतमूर्ति द्वारा पुलिस में मौखिक रूप से दर्ज की गयी शिकायत के अनुसार उन्हें धमकाने और बुरा-भला कहने वाले फोन आ रहे हैं . मंगलोर के नमो ब्रिगेड और शिमोगा की भाजपा इकाई ने अलग-अलग उन्हें पाकिस्तान जाने का एकतरफा हवाई टिकट कटा कर भेजा है. ये हरकतें शर्मनाक हैं और असहमति के अधिकार के प्रति इन राजनीतिक शक्तियों की असहिष्णुता की परिचायक हैं. असहमति का अधिकार लोकतंत्र के सबसे बुनियादी उसूलों में से एक है. इस अधिकार पर हमला लोकतंत्र की बुनियाद पर हमला है और दहशत फैला कर इस अधिकार के उपयोग को बाधित करने की कोशिशों का पुरज़ोर विरोध होना चाहिए.

जलेस ने बताया है कि श्री अनंतमूर्ति को पुलिस सुरक्षा तो प्रदान कर दी गयी है, पर लिखित शिकायत नहीं होने के नाम पर इन मामलों की कोई जांच शुरू नहीं की गयी है.

जनवादी लेखक संघ के महासचिव मुरली मनोहर प्रसाद सिंह व उपमहासचिव संजीव कुमार ने श्री अनंतमूर्ति के खिलाफ की गयी इन हरकतों की कठोर शब्दों में भर्तस्ना करते हुए मांग की है कि प्रशासन श्री अनंतमूर्ति की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ इन हरकतों में लिप्त लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करे. इसके लिए सबसे पहले मामले की जांच शुरू करना ज़रूरी है जो कि लिखित शिकायत न होने की बिना पर शुरू नहीं की गयी है. निश्चित रूप से प्रशासन को अपनी ओर से इन घटनाओं का संज्ञान ले कर जांच आरम्भ करने का अधिकार है, जैसा कि उसने श्री अनंतमूर्ति को पुलिस सुरक्षा देने के मामले में किया. जलेस ने तमाम लेखकों से भी अपील की हैं कि वे एकजुट होकर कठोर कार्रवाई की मांग करें और असहमति के अधिकार की हिफाज़त के पक्ष में आवाज़ बुलंद करें.