हस्तक्षेप डेस्क
नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री चाहे 56 आईएएस का तबादला कर दें या 156 आईपीएस का तबादला कर दें, सरकार की छवि सुधरने से रही जब तक उनके पास इतना अधिक महान सूचना विभाग विराजमान है।

सूचना एवं जनसंपर्क विभाग का काम सरकार की योजनाओं का प्रचार-प्रसार करना भी है इसके लिए विभाग संचार माध्यमों/ मीडिया में विज्ञापन जारी करता है।

अब ताजा खबर यह है कि मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक बीते शुक्रवार को विधानसभा में 2014-15 के लिए 2,74,704.59 करोड़ रुपये का बजट पेश करते हुए अखिलेश सरकार ने लैपटॉप-टैबलेट वितरण, बेरोजगारी भत्ता, कन्या विद्याधन, हमारी बेटी-उसका कल जैसी लोक लुभावन योजनाओं से किनारा कर लिया। लेकिन यूपी का महान सूचना एवं जनसंपर्क विभाग अभी भी हमारी बेटी-उसका कल का प्रचार कर रहा है।

उत्तर प्रदेश सरकार ने हमारी बेटी, उसका कल योजना रामपुर से 10 दिसंबर 2012 को प्रारंभ की थी। इस योजना की शुरुआत उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव द्वारा मौलाना मोहम्मद अली जौहर की जयंती के अवसर पर मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय रामपुर के परिसर में आयोजित एक समारोह में की गई थी।

हमारी बेटी, उसका कल योजना के तहत अल्पसंख्यक समुदाय की 10वीं पास छात्राओं को आगे की शिक्षा ग्रहण करने या उनके विवाह के लिए एकमुश्त 30 हजार रुपए दिए जाने का प्रावधान इस शर्त के साथ था कि पात्र छात्रा के अभिभावक की अधिकतम वार्षिक आय 36 हजार रुपए से अधिक न हो। इस योजना के तहत मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, पारसी एवं जैन धर्म मानने वाले परिवारों की छात्राओं को शामिल किया गया था।

इस योजना के प्रचार के लिए सरकार ने विज्ञापन भी जारी किए। अब इन्हीं विज्ञापनों को लेकर सवाल है। 5 दिन हो चुके जब मुख्यमंत्री योजना की मद में धन न देने का ऐलान अपने बजट में कर चुके हैं फिर भी योजना का विज्ञापन जारी है। समाचार एजेंसी यूनीवार्ता की वेबसाइट http://www.univarta.com/hindi/ पर इस विज्ञापन को समाचार लिखे जाने (25-06-2014 को 15.22 ) तक देखा गया। यह विज्ञापन दिखाने वाली साइट की कमी नहीं बल्कि उस विभाग की गलती है जिसने इसे जारी किया था।

प्रश्न यह भी है कि इस साइट पर आम पाठक नहीं जाता बल्कि अखबारों/ मीडिया के कर्मचारी ही इसके विजिटर हैं क्योंकि यह पेड सब्सक्रिप्शन वाली साइट है और पूरा समाचार देखने के लिए आपको इसका सदस्य बनना पड़ेगा। अलेक्सा पर इसकी अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग कुल 1,09,527 है। जबकि इससे अधिक रैंकिंग वाली कई पब्लिक न्यूज साइट्स हैं लेकिन यूपी सरकार का यह विज्ञापन किसी ऐसी साइट पर देखने को नहीं मिला जबकि वे वास्तव में सरकार के विज्ञापन की हकदार भी हैं।

चलिए इस पर आपत्ति को खारिज किया जा सकता है कि यह सूचना विभाग का विवेक है कि वह किस साइट को विज्ञापन दे या न दे लेकिन क्या योजना की समाप्ति के बाद भी विज्ञापन का जारी रहना सार्वजनिक धन का अपव्यय नहीं है ?

मुख्यमंत्री जी जरा पत्रकारों पर अपना नजला गिराने से पहले अपने इस विभाग को भी देख लाजिए।