अमरीकी हितों की खातिर गठजोड़
अमरीकी हितों की खातिर गठजोड़
अमरीकी हितों की खातिर मोदी सरकार का अमरीकी खेल के पीछे लग जाना, अदूरदर्शितापूर्ण है।
0 प्रकाश कारात
अगर अब भी इसके लिए किसी साक्ष्य की जरूरत थी कि मोदी सरकार एशिया में अमरीकी रणनीति के साथ पूरी तरह से बंधी हुई है, तो जापानी प्रधानमंत्री शिंजो आबे की भारत यात्रा के साथ इसका सबूत भी मिल चुका है। इस यात्रा के दौरान कई समझौतों पर दस्तखत किए गए हैं, जो जापान के साथ भारत के घनिष्ठ सैन्य व सुरक्षा रिश्ते स्थापित कायम करते हैं। अमरीका भारत से ठीक यही कराना चाहता था क्योंकि जापान और भारत, अमरीका की एशिया-प्रशांत रणनीति के दो स्तंभ हैं। अमरीका के आग्रह पर ही 2014 के सितंबर में मोदी की जापान की यात्रा के दौरान, त्रिपक्षीय सुरक्षा गठजोड़ को गढ़ा गया था।
आबे की इस यात्रा के दौरान दो प्रतिरक्षा सौदों पर दस्तखत किए गए हैं। इनमें एक संयुक्त रक्षा उत्पादन पर है और दूसरा, दोनों देशों के बीच सैन्य जानकारियों की साझेदारी की हिफाजत करने पर।
इसके अलावा यह एलान भी किया गया है कि अब जापान, मालाबार संयुक्त नौसैनिक अभ्यासों का नियमित हिस्सा बन जाएगा। अब तक ये संयुक्त अभ्यास, भारत और अमरीका के बीच के संयुक्त अभ्यास ही थे और जापान ने इन अभ्यासों में दो-तीन बार ही हिस्सा लिया था। अब ये अभ्यास त्रिपक्षीय नौसैनिक अभ्यासों का रूप ले लेंगे।
इस घनिष्ठ सैन्य व रणनीतिक रिश्ते के आधार पर ही जापान अब सिद्घांत रूप में भारत के साथ एक नाभिकीय सहयोग समझौते के लिए तैयार हुआ है। यह समझौता अमरीका के लिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि वेस्टिंग हाउस तथा जनरल इलैक्ट्रिक जैसी अमरीकी कंपनियां, भारत के लिए नाभिकीय रिएक्टरों की आपूर्ति उसी सूरत में कर सकती हैं जब तोशीबा तथा हिताची जैसी जापानी कंपनियों, जिनके पास उक्त अमरीकी कंपनियों के शेयरों का बड़ा हिस्सा है, जपानी सरकार से इन रिएक्टरों के लिए अत्यावश्यक उपकरणों की आपूर्ति के लिए हरी झंडी मिले।
इस नाभिकीय सहयोग समझौते का जापानी संसद से अनुमोदन कराने की जरूरत होगी। इस तरह के समझौते के लिए जापानी जनता के बीच भारी विरोध रहा है। वहां के लोगों दिमाग में फुकुशीमा नाभिकीय दुर्घटना की यादें अब भी ताजा हैं। हीरोशिमा तथा नागासाकी में जो हुआ था उसके बाद से जापानी जनता वैसे भी नाभिकीय हथियारों के खिलाफ है। जापान की जनता भारत जैसे देशों के साथ, जिनके पास नाभिकीय हथियार हैं, नाभिकीय सहयोग नहीं चाहती है। फिर भी शिंजो आबे की दक्षिणपंथी सरकार, जापान के पुनर्सैन्यीकरण के रास्ते पर चल रही है और जापानी संविधान की नयी व्याख्या पेश कर रही है, जबकि यह संविधान जापान की सीमाओं के बाहर सैन्य कार्रवाई करने पर रोक लगाता है। भारत के लिए सैन्य उपकरणों की बिक्री, उस शांतिवादी नीति से अलग हटने को दिखाता है, जिस पर जापान अब तक चलता आया है।
मोदी सरकार बड़े पैमाने पर नाभिकीय रिएक्टरों का आयात करने की उसी नीति पर चल रही है, जिस पर इससे पहले पिछली मनमोहन सिंह सरकार चल रही थी। गुजरात में मीठी विर्दी में और आंध्र प्रदेश में कोव्वाडा में अमरीकी नाभिकीय रिएक्टरों का लगाया जाना, न सिर्फ बहुत खर्चीला साबित होने जा रहा है बल्कि पर्यावरण के लिए और जनता की सुरक्षा के लिए, भारी खतरे भी पैदा कर रहा होगा। यही बात जैतापुर के मामले में भी सही है, जहां फ्रांसीसी रिएक्टर लगाए जाने हैं।
जिस तरह इसी साल जनवरी में राष्ट्रपति ओबामा की भारत की यात्रा के दौरान एशिया-प्रशांत तथा हिंद महासागर पर एक संयुक्त विजन दस्तावेज पर दस्तखत किए गए थे, वैसे ही रणनीतिक व वैश्विक साझेदारी पर भारत और जापान के बीच विजन दस्तावेज पर भी दस्तखत किए गए हैं। यह दस्तावेज भी भारत-प्रशांत क्षेत्र में अमरीकी हितों को ही प्रतिबिंबित करता है। यह एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमरीका, जापान तथा भारत के गठजोड़ का ही सामने आना है।
जापान परंपरागत रूप से भारत में बुनियादी ढांचे और विनिर्माण के क्षेत्रों में निवेश करता आया है। इसलिए, एशिया की इन दो बड़ी ताकतों के बीच आर्थिक रिश्तों का बढऩा, स्वाभाविक भी है और जरूरी भी। लेकिन, यह ऐसा रणनीतिक रिश्ता नहीं होना चाहिए, जो भारत को एशिया में एक गुट में ही बांधकर रख दे।
अमरीका, जापान तथा भारत का सैन्य-सुरक्षा गठजोड़, चीन पर अंकुश लगान की अमरीकी योजना के ही हित पूरे करने जा रहा है। यह भारत के हित में नहीं हो सकता है। शिंजो आबे के राज में जापान, चीन के प्रति अंध-राष्ट्रवादी रुख अपना रहा है। मोदी सरकार का अमरीकी खेल के पीछे लग जाना, अदूरदर्शितापूर्ण है।


