कन्हैया कुमार

इस चेहरे को ध्यान से देखिए। इसमें अख़लाक़ का चेहरा भी नज़र आएगा और पहलू ख़ान का भी। सूनी आँखों में जुनैद की मायूसी भी दिखेगी। मधु नाम के इस आदिवासी की हत्या हमारे दौर की इसी असलियत को सामने लाती है कि नागरिकों को भीड़ में बदलने की साज़िश कामयाब होती दिख रही है।

जब देश की राजधानी की अदालत में हमलावरों को एक्टिविस्टों, टीचरों, पत्रकारों आदि को पीटने की छूट मिलती है तब सरकार असल में लोगों को भीड़ बनने का ही संदेश दे रही होती है।

जब राजस्थान पुलिस पहलू ख़ान की हत्या के आरोपियों को ज़मानत दिलाने के लिए ख़ुद केस कमज़ोर कर देती है तो लोगों को लगने लगता है कि भीड़ बनकर आसानी से किसी की जान ली जा सकती है।

जब अख़लाक़ की हत्या के आरोपी के अंतिम संस्कार में सरकार के लोग शामिल होते हैं तो भीड़ बनकर किसी को मारने का बुरा संदेश पूरे देश में फैल जाता है।

मधु के हत्यारे जेल में हैं, लेकिन पहलू ख़ान की हत्या के सभी आरोपी आज़ाद घूम रहे हैं। जब तक ऐसे अपराधियों को सज़ा नहीं मिलेगी, तब तक नागरिकों का पागल भीड़ बनना जारी रहेगा।

मधु की माँ ने कहा है कि अगर उनका बेटा जंगल में ही रह रहा होता तो उसकी जान इस तरह नहीं जाती। उनकी यह बात उन लोगों के मुँह पर ज़ोरदार तमाचे की तरह है जो दलितों, आदिवासियों आदि को नीची नज़र से देखकर तथाकथित विकास की तारीफ़ के पुल बाँधते रहते हैं।

अरबों रुपये चुराने वाले चोर शहंशाहों वाला जीवन जीते हैं और 100-200 रुपये की चोरी करने वाले लोग मारे जाते हैं। बड़े चोरों ने असली सवालों को दबा दिया है। 2022 तक 10 करोड़ नौकरियाँ पैदा करने के वादे का क्या हुआ? क्यों हम ऐसा समाज बन गए हैं जिसमें भूख से परेशान होकर चावल चुराने वाले मधु की इतनी निर्मम हत्या हो जाती है? अगर हमें नागरिक की ज़िम्मेदारियाँ निभानी हैं तो हमें सरकार से और अपने आप से लगातार ऐसे सवाल करने होंगे।

( कन्हैया कुमार, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष हैं। )

यूट्यूब चैनल सब्सक्राइब करें

Kanhaiya Kumar की एफबी टाइमलाइन से साभार