अरविंद केजरीवाल के मैकियावेली चरित्र में निहित है आप का विवाद
अरविंद केजरीवाल के मैकियावेली चरित्र में निहित है आप का विवाद
अरविंद केजरीवाल के मैकियावेली चरित्र की उलझनें
मेरे राजनीतिक रुख़ पर विरोधी नाराज़ होते हैं, जो बड़ी अच्छी बात है।
अनेक राजनीतिक मित्र भी नाराज़ होते हैं। उनकी आपत्तियों को दूर करने की कोशिश करना मेरा फ़र्ज़ है ।
वामपंथ, मज़दूर आंदोलन का इतिहास, भारत की सामाजिक-राजनीतिक स्थिति की बुनियादी समझ - इनके सिलसिले में मतभेद ज़रूरी है, वे जारी रहेंगे, उनके आधार पर विमर्श बेहद ज़रूरी है। वे सामयिक राजनीतिक घटनाओं पर आधारित होंगे, उनके विश्लेषण व उस विश्लेषण के आधार पर तात्कालिक अवस्थान ऐसी बहस के प्रस्थान विंदू होंगे।
आम आदमी पार्टी ऐसा एक मौका देती है।
मेरी राय में उत्तर वैचारिक योगेंद्र यादव, अवैचारिक अरविंद केजरीवाल व राष्ट्रवादी वैचारिक कुमार विश्वास के इर्दगिर्द इकट्ठा राजनीतिक ताकतों के बीच संघर्ष लाज़मी था।
लेकिन यह ज़रूरी नहीं था कि यह संघर्ष इस भोंडे रूप में हो। कुछ लोगों को वहम था कि आप के नेतागण ऐसे वैचारिक संघर्ष का स्वागत करेंगे। मुझे ऐसी ग़लतफ़हमी नहीं थी, लेकिन मेरा ख़्याल था कि सहिष्णुता के साथ उसे मान लिया जायगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। शायद इसका कारण अरविंद केजरीवाल के मैकियावेली चरित्र में निहित है - शायद भारतीय राजनीतिक परिदृश्य व उसके इतिहास में लोकतांत्रिक संस्कृति की सीमितता इसका कारण है - शायद वामपंथी न होने के बावजूद आप के चरित्र में वामपंथी असहिष्णुता गहराई तक समाई हुई है। एक स्पष्ट जवाब के लिये अभी और अनुभव जुटाने पड़ेंगे।
मेरी सहानुभूति योगेंद्र यादव के इर्दगिर्द इकट्ठा ताकतों के साथ है। यह उनकी उत्तर-वैचारिकता के कारण नहीं, बल्कि इस वजह से है कि योगेंद्र उत्तर वैचारिक के अलावा भी बहुत कुछ हैं।
मैंने केजरीवाल के लिये मैकियावेली शब्द का इस्तेमाल किया। उस पर टिके रहना चाहूंगा। देर- सबेर उन्हें योगेंद्र यादव से निपटना था। वे निपट लिये। इसके तहत उन्हें अपनी टोपी साफ़ रखनी थी। इसमें वे बुरी तरह नाकाम रहे।
इन सबसे परे ऐतिहासिक रूप से एक बात कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। जिस प्रक्रिया के तहत आम आदमी पार्टी का उदय हुआ है, उसमें से युवाओं की एक बड़ी तादाद राजनीति के बारे में सोचते हुए सक्रिय हुई है। अपनी सारी सीमाओं के बावजूद यह समुदाय आने वाले समय में विभिन्न राजनीतिक खेमों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। उसके साथ दूरी बनाये रखना बेवकूफ़ी है। साथ ही, आआप के ज़रिये कुछ मुद्दे राजनीतिक रूप से प्रासंगिक हुए हैं, उन पर नज़र रखना ज़रूरी है।
बात विभिन्न स्तरों पर जारी रहेगी । फ़िलहाल इतना ही।
उज्ज्वल भट्टाचार्य


