प्रकाश कारात
अरुणाचल में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया। यह संघवाद के सिद्धांत पर हमला है और एक बार फिर धारा-356 का दुरुपयोग किए जाने का मामला है। इस पूरे प्रकरण में भाजपा की केंद्र सरकार और उसके द्वारा बैठाए गए राज्यपाल, जे पी राजखोवा ने शर्मनाक भूमिका अदा की है।
अरुणाचल प्रदेश के राजनीतिक संकट की शुरूआत पिछले साल नवंबर में हुई थी। सत्ताधारी कांग्रेस के विधायकों के एक हिस्से ने बगावत की थी। बागियों ने राज्यपाल के सामने विधानसभा के स्पीकर को पद से हटाने का प्रस्ताव रखा था।
राज्यपाल ने इसी प्रस्ताव पर विचार करने के लिए, 16 दिसंबर को विधानसभा का आपात सत्र बुलाने की घोषणा की थी। लेकिन, विधानसभा का जनवरी के लिए निर्धारित शीतकालीन सत्र, पहले बुला लेने और स्पीकर को हटाने के प्रस्ताव पर मतदान करने का आदेश देने के राज्यपाल के कदम, सभी नियम-कायदों का उल्लंघन करते थे। गुवाहाटी हाई कोर्ट ने राज्यपाल के निर्णय पर स्थगनादेश भी जारी किया था, लेकिन बाद में इस स्थगनादेश को निरस्त भी कर दिया। विधानसभा के स्पीकर ने इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसने यह मामला विचार के लिए संवैधानिक पीठ को सौंप दिया।
इसी बीच, एक कम्यूनिटी हॉल में कथित रूप से विधानसभा का ‘विशेष सत्र’ करा लिया गया, जिसमें बागी कांग्रेस विधायकों और भाजपा के सदस्यों व दो निर्दलीय विधायकों ने मिलकर, स्पीकर के हटाने का प्रस्ताव पारित कर दिया और मुख्यमंत्री के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव भी पारित कर दिया। विधानसभा का यह कथित सत्र पूरी तरह से अवैध था, लेकिन राज्यपाल ने इसकी निंदा तक नहीं की। जवाब में स्पीकर ने कांग्रेस के 14 बागी विधायकों को अयोग्य करार देते हुए आदेश जारी कर दिए। यह मामला भी हाई कोर्ट के सामने पहुंचा, जिसने बागी विधायकों के अयोग्य घोषित किए जाने पर स्थगनादेश जारी कर दिया। पुन:, इस मामले में भी स्पीकर ने सुप्रीम कोर्ट के सामने याचिका पेश की है। ये सभी याचिकाएं अब सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ सामने हैं।
इन परिस्थितियों में राज्यपाल के लिए सही रास्ता यही था कि वह मुख्यमंत्री से कहते कि एक निश्चित अवधि में विधानसभा की बैठक बुलाएं और अपना बहुमत साबित करें। इसके बजाए, राज्यपाल ने केंद्र को हास्यास्पद रिपोर्टें भेजी हैं, जिनमें राज्य में कानून व व्यवस्था के खत्म हो जाने का दावा किया गया है। इनमें से एक रिपोर्ट में तो राज्यपाल निवास के बाहर सत्ताधारी पार्टी के विधायकों द्वारा ‘‘गोवध’’ को भी उदाहरण बनाकर पेश किया गया है। वास्तव में कथित रूप से यह बलि गाय की नहीं बल्कि एक भिन्न प्रजाति के चौपाए, मिथुन की दी गयी थी, जो अरुणाचल में काफी पाया जाता है और जिसका मांस इस राज्य में बड़े पैमाने पर खाया जाता है।
अरुणाचल के राज्यपाल का आचरण इस सचाई को ही रेखांकित करता है कि मोदी सरकार ने उत्तर-पूर्व में किस तरह के राज्यपालों को बैठाया है। वास्तव में इनमें से ज्यादातर को सिर्फ आरएसएस के साथ उनके संबंध के आधार पर ही राज्यपाल के पद पर बैठाया गया है। मिसाल के तौर पर त्रिपुरा में राज्यपाल बनाकर बैठाया गया तथागत राय, फेसबुक तथा ट्विटर पर बहुत ही भडक़ाऊ तथा सांप्रदायिक टिप्पणियां करता रहता है।

यह समूचा प्रकरण एक बार फिर संविधान की धारा-356 की अलोकतांत्रिक तथा संघवादविरोधी प्रकृति को रेखांकित करता है। सुप्रीम कोर्ट के 1994 के बोम्मई केस के निर्णय में इस दुरुपयोग पर अंकुश लगाने का प्रयास किया गया था। उक्त निर्णय में यह साफ कर दिया गया था कि किसी सरकार की किस्मत का फैसला राजभवन में नहीं हो सकता है बल्कि विधानसभा में शक्ति परीक्षण के जरिए ही हो सकता है। पुन:, इस निर्णय में यह भी स्पष्टï कर दिया गया था कि किसी राज्य सरकार के बर्खास्त किए जाने और राष्ट्रपति शासन लगाए जाने के कारण, न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं।
भाजपा की सरकार ने एक बार फिर इसका सबूत दिया है कि अपने से पहले आयी कांग्रेसी सरकारों की ही तरह, वह भी अपने क्षुद्र राजनीतिक स्वार्थों के लिए इस काले कानून का सहारा लेने में नहीं हिचकेगी। इसलिए, सुप्रीम कोर्ट को तत्परता से राज्यों के अधिकारों की रक्षा करने के लिए हस्तक्षेप करना चाहिए और संवैधानिक प्रक्रिया में राज्यपाल की खुल्लमखुल्ला दखलंदाजी पर अंकुश लगाना चाहिए।
जब तक राज्यपालों की नियुक्ति की व्यवस्था और धारा-356, दोनों में भारी बदलाव नहीं किए जाते हैं, संघीय व्यवस्था और राज्यों के अधिकारों के लिए खतरा हमेशा बना रहेगा। सी पी आइ (एम) यह मांग करती आयी है कि राज्यपाल की नियुक्ति, सरकारिया आयोग द्वारा जिन मानदंडों का उल्लेख किया गया है उनकी कसौटी पर कसकर, मुख्यमंत्री द्वारा पेश किए गए तीन प्रख्यात हस्तियों के पैनल में से, राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए। इस रुख को अनेक क्षेत्रीय पार्टियों का भी समर्थन हासिल है।
जहां तक संविधान की धारा-356 का सवाल है, इसमें संशोधन कर इसका प्रयोग ऐसी स्थितियों तक सीमित कर दिया जाना चाहिए जहां राष्ट्रीय एकता के लिए या देश के धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने के लिए गंभीर खतरा पैदा हो जाए। और जब तक यह संशोधन नहीं हो जाता है, कम से कम बोम्मई केस के निर्णय में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिए गए दिशा-निर्देशों को गंभीरता से लागू किया जाना चाहिए।