रीता तिवारी
उगते सूरज की धरती कहे जाने वाले पूर्वोत्तर राज्य अरुणाचल प्रदेश में करोड़पति उम्मीदवारों की तादाद तेजी से बढ़ रही है। पिछले पांच वर्षों में इसमें लगभग 20 फीसद वृद्धि हुई है। पिछले विधानसभा चुनाव में 41 फीसदी उम्मीदवार करोड़पति थे। इस बार यह तादाद बढ़ कर लगभग 60 फीसदी तक पहुंच गई है। आम चुनावों के दूसरे दौर में बुधवार को लोकसभा की दो सीटों के साथ ही विधानसभा के लिए भी वोट पड़ेंगे। लोकसभा की दो सीटों के लिए कांग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है।
राज्य में विधानसभा चुनाव कई मामलों में दिलचस्प हैं। 60 सदस्यीय विधानसभा में मुख्यमंत्री नबाम टुकी समेत कांग्रेस के 11 उम्मीदवार तो निर्विरोध चुने जा चुके हैं। लेकिन बाकी बची 49 सीटों के लिए जो 152 उम्मीदवार हैं उनमें से 91 करोड़पति हैं। यह अपने आप में एक रिकार्ड है। इतनी कम सीटों के लिए इतने ज्यादा करोड़पति उम्मीदवारों के मैदान में उतरने की दूसरी कोई मिसाल मुश्किल है। इसके अलावा एक और दिलचस्प बात यह है कि अरुणाचल में महिला वोटरों की तादाद पुरुषों के मुकाबले ज्यादा है। लेकिन विधानसभा की महज छह सीटों पर ही महिलाएं मैदान में हैं। किसी भी राजनीतिक दल ने यहां आधी आबादी को कोई तवज्जो नहीं दी है।
वर्ष 2009 में हुए पिछले विधानसभा चुनाव में करोड़पति उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 3.51 करोड़ थी जो अब 6.30 करोड़ हो गई है। राज्य में सरकार कांग्रेस की है। सो जाहिर है सबसे ज्यादा 51 करोड़पति उम्मीदवार इसी पार्टी के हैं। उसके बाद भाजपा का नंबर है। उसके 24 उम्मीदवार करोड़पति हैं। नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) और पीपुल्स पार्टी आफ अरुणाचल (पीपीए) में ऐसे क्रमशः पांच और चार उम्मीदवार हैं। इन सीटों के लिए मैदान में उतरे निर्दलीय उम्मीदवार भी कम नहीं हैं। ऐसे 14 निर्दलीय उम्मीदवारों की औसत संपत्ति 8.05 करोड़ रुपए है।
करोड़पति उम्मीदवारों की सूची में पालिन विधानसभा सीट से मैदान में उतरे कांग्रेस के टकाम पारिओ 187.56 करोड़ की संपत्ति के साथ पहले नंबर पर हैं। इसी पार्टी के प्रेमा खांडू 129.57 करोड़ की संपत्ति के साथ दूसरे नंबर पर हैं। निर्दलीय के तौर पर तवांग सीट से मैदान में उतरे शेरिंग ताशी 96.43 करोड़ की संपत्ति के साथ तीसरे स्थान पर काबिज हैं।
इन चुनावों की एक और खासियत यह है कि राज्य में महिला वोटरों (3.77 लाख) की तादाद पुरुषों (3.75 लाख) के मुकाबले ज्यादा है। लेकिन महज छह महिलाएं ही चुनाव मैदान में हैं। सत्तारुढ़ कांग्रेस ने अबकी महज दो महिलाओं को टिकट दिया है जबकि भाजपा ने यहां किसी भी महिला को टिकट नहीं दिया है। एनसीपी और पीपीए ने एक-एक महिला को अपना उम्मीदवार बनाया है। दो महिलाएं निर्दलीय के तौर पर अपनी किस्मत आजमा रही हैं।
आखिर महिला उम्मीदवारों की तादाद नगण्य क्यों है ? ईटानगर स्थित राजीव गांधी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर केसांग देगी कहते हैं कि इसके लिए राज्य का पितृसत्तात्मक समाज ही जिम्मेदार है।‘ इसी विश्वविद्वालय के तहत अरुणाचल आदिवासी अध्ययन संस्थान की असिस्टेंट प्रोफेसर लीसा लोमडाक कहती हैं कि अरुणाचली समाज व परिवार समाज में महिलाओं की भूमिका का दायरा बढ़ाने को तैयार नहीं हैं। ज्यादातर लोगों का मानना है कि राजनीति में उतरने से महिलाओं का घरेलू जीवन प्रभावित होगा। वे कहती हैं कि सामाजिक जीवन में सदियों से पुरुष ही महत्वपूर्ण फैसले करते रहे हैं। यह समाज अब भी महिलाओं को नेता के तौर पर स्वीकार करने की मानसिकता नहीं बना सका है।
पश्चिम सियांग जिले में गारो जनजाति के जुमीर बासर कहते हैं कि राज्य के आदिवासी तबके में संपत्ति पर महिलाओं का अधिकार नहीं होता। चुनाव लड़ने के लिए काफी पैसा चाहिए। वे सवाल करते हैं कि महिलाएं इसके लिए धन कहां से लाएंगी ?
जनादेश न्यूज़ नेटवर्क