अर्चना की अगरबत्ती के धुंए से, गंध क्यूँ बारूद वाली आ रही है ?
अर्चना की अगरबत्ती के धुंए से, गंध क्यूँ बारूद वाली आ रही है ?
अर्चना की अगरबत्ती के धुंए से,
गंध क्यूँ बारूद वाली आ रही है ?
कत्लोगारत तो दो विश्व युद्धों में भी खूब हुआ, शीत युद्ध के दौरान भी और उसके बाद आज तक समूची धरती पर लगातार हो रहा है... कभी खुला, तो कभी गुपचुप तरीके से अवाम को मारा ज़ा रहा है... भूख से, बीमारी से, हत्या या आत्म हत्या से। आधुनिक काल के ऐसे सभी कत्लोगारत का मकसद साफ रहा है- मुनाफाखोर निजाम को बरक़रार रखना। धर्म के नाम पर मध्ययुगीन खूनखराबा का मकसद भी सामंती निजाम को कायम करना और उसे बनाये रखना था। हर शासक का अपना धर्म, लेकिन मकसद एक ही... मगर आज का धर्मयुद्ध/जेहाद लोगों को पचता नहीं, क्योंकि धर्म धुरंधरों की वर्दी भाड़े के सैनिकों से अलग दिखती हैं, तनख्वाह भी किसी सरकार से सीधे नहीं मिलती है। हालाँकि उनकी बातें भी मध्यकालीन लड़ाकों की तरह पवित्र, रहस्यमय और शब्दाडंबरपूर्ण होती हैं, मगर थोड़े से अंधश्रद्धालु या मतलबपरस्त लोग ही आज उनके कुकर्मों को सही ठहराते हैं, बाकी लोग अचरज से पूछते हैं कि-
अर्चना की अगरबत्ती के धुंए से,
गंध क्यूँ बारूद वाली आ रही है ?
धर्मधुरंधर, ये बतला क्या तेरे पास दवाई है?
भूख, गरीबी, मंहंगाई, बेकारी, कितनी छाई है,
सत्ता इनको पाल रही, क्या वह तेरी भौजाई है?
भूख, गरीबी, मंहंगाई, सब दंगे में जल जायेंगे?
नहीं जले तो धर्मधुरंधर समझो तेरी बारी है.
तेरी भी तय्यारी है और अपनी भी खुद्दारी है......
दिगंबर


