मेरे जैसे स्वतंत्र एक्टिविस्टों और वाम तहरीक के बीच सेतु थे डॉक्टर पीयुषेंदु गुप्ता
अरुण कुमार
मैंने डॉक्टर पी गुप्ता का नाम ज़रूर सुन रखा था। आम जनता के मुंह से, जन श्रुतियों में। एक गरीब-परस्त चिकित्सक के रूप में उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली थी। तब तक वे बीहट गाँव छोड़कर बेगुसराय शहर में बस गए थे और वहीं रहने और मेडिकल प्रेक्टिस करने लगे थे। मगर मेरे स्वर्गीय पिता जो सरकारी नौकरी में रहते हुए मृत्युपर्यंत अविकल सी पी आई के एक्टिविस्ट रहे, कॉमरेड रामचंद्र सिंह, की सरकारी नौकरी में होने की वज़ह से, और उनके बार बार स्थानान्तरण के कारण मेरे परिवार को बेगुसराय में तबतक कम ही रहने का मौका मिलता था। इसी वज़ह से मेरा सन 1972-73 तक उनसे कोई निजी ताल्लुकात नहीं था।
मुझे आज तक स्मरण है, और शायद यह स्मृति मेरे जीवन-पर्यंत मेरे मानस पटल पर अंकित रहेगी। डॉक्टर गुप्ता से मैं इमरजेंसी के आसपास के दिनों में सन 1974-75 (ठीक याद नहीं) में तब मिला था जब मैं तत्कालीन बिहार विश्वविद्यालय (मुजफ्फरपुर) में ए.आई.एस.एफ़. से सम्बद्ध बिहार विश्वविद्यालय छात्र संघ का अध्यक्ष हुआ करता था। मुझे तब तक छात्र एक्टिविस्ट के रूप में काम करने की वजह से, अनियमित दिनचर्या के कारण, गैस्ट्रिक की बीमारी पकड़ चुकी थी और मुजफ्फरपुर में कई डॉक्टरों से इलाज़ के बाद भी यह मर्ज़ मेरा जान नहीं बख्श रहा था। इसी बीच मेरे पिताजी का पदस्थापन गृह जिला बेगुसराय में बतौर शिक्षा उपाधीक्षक, जिला शिक्षा अधीक्षक कार्यालय, बेगुसराय में हो चुका था।
अपनी बीमारी के साथ मैं तब अपने गाँव मधुरापुर आया हुआ था। तभी मेरे पिताजी मुझे पहली बार अपने साथ मुझे दिखलाने अपने प्रिय चिकित्सक और कामरेड डॉक्टर पी गुप्ता के पास ले गए थे। मेरे पिताजी, कामरेड रामेश्वर सिंह आदि के साथ के, तब के जिले के सीनियर मोस्ट कामरेडों में, हुआ करते थे जिन्होंने अपने छात्र जीवन में ही कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्यता ली थी। शायद इसी वजह से, डॉक्टर साहेब के यहाँ उनकी ख़ास पैठ थी। आश्चर्यजनक यह रहा कि जो बीमारी मेरा जान नहीं छोड़ रही थी उस मर्ज़ ने मेरी जां यूँ बख्श दी जैसे वो कभी मेरे साथ थी ही नहीं। डॉक्टर साहेब ने महज़ चंद दवाएं मेरे लिए लिखी थीं। वो भी बिलकुल सस्ती।
मगर मेरे इलाज़ के दरम्यान ही डॉक्टर साहेब ने मेरा वो गहन साक्षात्कार लिया कि एक साथ ही उन्होंने मेरे सामान्य ज्ञान, मेरे शैक्षणिक ज्ञान, मेरे जीवन आदि की सारी जानकारियाँ इकट्ठी कर लीं। और तब से वे मुझे जानते रहे। मगर शुरू में मैं अपने पिताजी के जानने वालों से कुछ ज़रूरत से ज्यादा ही बचने की कोशिश करता रहा था, इस सन्दर्भ में मेरा आग्रह कुछ ज्यादा ही था। क्योंकि मेरे मानस में कहीं न कहीं से यह बात कुछ ज्यादा ही बैठ गयी थी कि लोग मुझे मेरे पिताजी की वजह से नहीं मेरी अपनी शख्सियत की वजह से जाने। इसलिए उसके बाद भी मैं डॉक्टर साहेब से उसी तरह से मिलता था जिस तरह से रेल और बसों से सफ़र करते हुए हमारी मुलाकात इन दिनों नदियों से हुआ करती है। यानि जब कभी आते-जाते टकरा गए तो श्रद्धा निवेदन के लिए दुआ – सलाम, प्रणाम पाती तक। बस। इससे ज्यादा नहीं। डॉक्टर साहेब ही भले मुझसे कुछ पूछ लिया करते थे मैंने उनसे अपनी और से उनसे कभी कुछ ज्यादा बात करने की कोशिश की होगी, ऐसा मुझे याद नहीं।
तबसे काफी लम्बा अरसा हो गया। मैं 1987 में रांची से प्रभात खबर से प्रबंधन से संघर्ष के बाद तुरन्त ही नवभारत टाइम्स ज्वाइन कर चुका था। जहां से टाइम्स प्रबन्धन द्वारा टाइम्स ऑफ़ इंडिया पटना के तत्कालीन स्थानीय सम्पादक सुमंत सेन के कहने पर मुझे टाइम्स ऑफ़ इंडिया में स्थानांतरित कर, 1988 फरवरी में मुज़फ्फरपुर पदस्थापित कर दिया गया।
मेरा स्थानांतरण 1990 के आस-पास मुजफ्फरपुर से टाइम्स ऑफ़ इंडिया में ही पटना कार्यालय में कर दिया गया था। मगर इसी बीच राजनीतिक परिवर्तन आये। मंडल की आंधी चली। कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना वर्ग संघर्ष का सिद्धांत मंडलवादी पार्टियों के नेताओं के यहाँ गिरवी रख दिया और अपनी स्वतंत्र पहलकदमी तक से किनारा कर लिया।
याद रहे कि सीपीआई की राज्य इकाई ने उसी दौरान पिछड़े वर्ग से आने वाले अब मरहूम सूरज प्रसाद को (दो टर्म) पार्टी की राज्य इकाई के सबसे शीर्षस्थ पद पर राज्य सचिव बनाया। उसके बाद से लगातार ही बी एन लाल (तीन टर्म तक), पिछड़े वर्ग के नेता ही राज्य सचिव बनाए गए। अब उन दिनों के बिहार सी पी एम् की बात की जाए। यह सही है कि उस दरम्यान एक द्विज गणेश शंकर विद्यार्थी उस वक्त सी पी एम् के राज्य सचिव रहे थे लेकिन बदली हुई राजनीतिक परिस्थिति में उनकी स्थिति खडाऊं राज्य सचिव वाली ही रही थी और वे सिर्फ हाथी के दिखाने के दांत ही थे। उस वक्त के सी पी एम् में पिछड़े वर्ग से आने वाले नेताओं - यथा सर्वश्री सुबोध राय, रामदेव वर्मा, मंजू प्रकाश, चंडी प्रसाद, प्रेम प्रदीप, प्रेमचंद राम, वीरेंद्र प्रसाद की ही चलती थी जो उस वक्त सारे नीति निर्धारण में निर्णायक और अंतिम भूमिका निभाते थे। यह वही समय है जब पार्टी में इनकी तूती बोलती थी और सरकार में भी यही प्रभावशाली थे। विडंबना यह है कि राज्य सी पी एम में तब जिसकी सबसे ज्यादा हनक थी और जिन्होंने सी पी एम के सेंट्रल कमिटी में एक चौथाई शताब्दी तक रहने से लेकर लोक सभा तक पहुँचने में अपने रसूख का प्रयोग किया उन्ही सुबोध राय ने आज एक साधारण एम एल ए बनने के लिए नितीश जी की पार्टी जद (यू) ज्वाइन कर रखी है।
लगे हाथों भाकपा माले की भी बात एक लाइन में कर ली जाए। इसी दरम्यान पार्टी के पिछड़े वर्ग से आने वाले नेता नन्दकिशोर प्रसाद को राज्य सचिव के साथ ही बनारस पार्टी कांग्रेस में बिना सेंट्रल कमिटी के अनुभव के ही सीधे पार्टी की पोलित ब्यूरो में डाल दिया गया। यह था प्रभाव मंडलेत्तर राजनीति का उस वक्त वाम दलों पर जिसका मुकाबला वाम दल नहीं कर सके। इसी दरम्यान वाम दलों के जनांदोलन कमजोर होते रहे, पार्टी विधायक राजद और अन्य मंडल परिवार की पार्टियां ज्वाइन करते रहे, पार्टी जन संगठन जातीय आधार पर बनते और विभाजित होकर कमजोर होते गए और राज्य में जहां वाम तहरीक कभी एक ताकत हुआ करती थी का "करम" धीरे धीरे "वाम" होता चला गया और जो आज पुराने वाम की प्रेत छाया मात्र बनकर रह गयी है।
इसी साल उनके जीवन के 88 वसंत पूरे हुए थे। वे महज़ न केवल, सी पी आई के नेता और गरीबों के डॉकटर थे बल्कि वे पटना और पूरे देश के पैमाने पर बेगुसराय के सांस्कृतिक ब्रांड एम्बेसडर भी थे। तक़रीबन एक दशक पूर्व मैंने ही उन्हें उन्हें पटना में बेगुसराय का सांस्कृतिक (कल्चरल) ब्रांड एम्बेसडर कहना शुरू किया था। शायद कहीं मेरी लिखित टिपण्णी भी थी। मेरे इस जुमले को काफी लोगों ने पसंद भी किया था। क्योंकि यह मेरे दिल से निकला हुआ जुमला था। वैसे सच पूछा जाये तो उन्होंने पूरे सूबे बिहार के लिए ही सांस्कृतिक ब्रांड एम्बेसडर का काम किया है जिसकी ताईद नोबेल लौरेट अमर्त्य सेन जैसों को भी करना पड़ा है। मगर बिहार से ज़्यादा उन पर बेगुसराय का हक़ बनता है। जहां उन्होंने अपने जीवन का आधा से ज्यादा समय बिताया और वहां की मिटटी में वे रच बस से गए थे। जब कभी वे किसी भी बेगुसरायवासी से मिलते थे तो वे नोस्टालजिक हो जाया करते थे और घंटो उससे वहाँ की एक एक खबर जानने की कोशिश किया करते थे।
उन्होंने वहाँ की राजनीति, संस्कृति, समाजनीति के लिए उतना योगदान किया जितना इस मिटटी के भूमिपुत्रों ने भी नहीं किया चाहे वे डॉकटर रामशरण शर्मा हों, आलोचक डॉकटर मुरलीमनोहर प्रसाद सिंह हों या मेरे निजी मित्र रहे साहित्यकार अरुण प्रकाश ही क्यों न हों। यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं हैं। यदि उनका योगदान नहीं होता तो इतिहास के प्रसिद्द विद्वान मरहूम प्रोफेसर राधाकृष्ण चौधरी या फिर बेगुसराय के ही प्रोफेसर अखिलेश्वर कुमार ने बेगुसराय के लुप्त प्राय इतिहास की वो खोज करने में वो सफलता नहीं प्राप्त की होती जो आज हमारे सामने है। आज बेगुसराय में जो म्यूजियम है उसके पीछे भी डॉक्टर साहेब का ही योगदान है। इस काम में उन्होंने अपने रसूख का इस्तेमाल किया और अपने प्रिय प्रोफेसर ओ पी जायसवाल, विजय कुमार चौधरी (जायसवाल रिसर्च इन्सटीच्युट) आदि प्रमुख इतिहासकारों का सहयोग भी लिया। शैवाल गुप्ता के आद्री के म्यूजियम “धरोहर” के पीछे भी उनकी ही परिकल्पना बतायी जाती है। उनके इतिहास प्रेम का आलम यह था कि उनके जैसे एक मेडिकल डॉक्टर ने इतिहास में एम ए की डिग्री भी ली।
उन्होंने ‘आर्कियोलॉजी एंड आर्ट ऑफ गंगा, गंडक एंड कोसी बेसिन’ नाम की किताब भी लिखी। इतिहास और पुरातत्व पर उनके शानदार काम के लिए एशियाटिक सोसाइटी, पटना ने हाल ही में उन्हें ‘इतिहासरत्न’ की उपाधि से नवाजा था।
इतना ही नही बेगुसराय, जो उस वक्त तक बिहार के एक कॉस्मोपॉलिटन, “बरौनी औद्योगिक क्षेत्र” के रूप में उभर ही रहा था, के न सिर्फ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक वरन आर्थिक मामलों में भी डॉक्टर साहेब ने बेगुसराय का नेतृत्व किया था जिनकी देखरेख में बेगुसराय में उस वक्त बेगुसराय के उद्यमियों का एक तबका उभरा था जिसने उस वक्त के जिले में स्थापित ट्रेड और कामर्स के संगठनों के मठाधीशों के बरक्श एक चुनौती खड़ी कर दी थी। मगर अफ़सोस की बात है कि डॉक्टर साहेब के बेगुसराय छोड़ कर पटना चले जाने से इस सिलसिले में आगे कुछ ज्यादा प्रगति नहीं हो सकी। बहुत कम लोग ही डॉक्टर साहेब के आर्थिक और उद्यम के क्षेत्र में इस योगदान का आकलन आज तक कर पाए हैं।
उन्होंने वहाँ आई एम ए का गठन किया और इस संगठन को जनता के साथ बहुत हद तक जोड़ा भी। मगर अफ़सोस के साथ लिखना पड़ रहा है कि बेगुसराय के डॉकटरों ने उनसे आई एम ए की राजनीति तो सीखी, अपने अधिकारों को तो जाना, मगर उनसे एक सही जन-चिकित्सक का कर्तव्य नहीं सीखा।
एक ज़िला केंद्र में बैठ कर यह शख्स ज़िले को राज्य और देश के पैमाने पर प्रोजेक्ट करता रहा। आज यदि इस जिले में संस्कृति नाम की थोड़ी सी भी कुछ चीज बची है तो उसमे डॉकटर पी गुप्ता का ही योगदान है। इनके नेतृत्व और मार्गदर्शन में बेगुसराय इप्टा कभी देश और राज्य के पैमाने मशहूरियत हासिल कर चुकी थी। रंगकर्म और कला आज जो कुछ भी जिले में नाम मात्र की बची हुई है उसे इस शख्स की बड़ी भूमिका है। मगर अफ़सोस आज जिले में पीपुल्स थिएटर तो बराय नाम ही बच गया है। जो कुछ है तकरीबन वह सत्ता प्रतिष्ठान के साथ खड़ा दिखता है।
जिले ही नहीं, राज्य के पैमाने पर भी एक-एक गतिविधि पर उनकी पैनी नजर रहती थी। 1990 के दशक में जब वाम दल पूरी तरह से लालू जी प्रसाद यादव जी के शरणागत हुआ करते थे। पूरा प्रशासन एक किस्म की राजनीति से प्रेरित था जिसमें रूल ऑफ़ लॉ की जगह शासक का काननों सर्वोपरि था। बेगुसराय जैसे तब तक संघर्षशील माने जाने वाले जिले में भी मानवाधिकार के हनन की घटनाओं पर कोई बोलने वाला तक नहीं था। क्योंकि वहां की जो संघर्ष की शक्तियां हुआ करती थी राजनीतिक कारणों से उन सबों की बोलती बंद थी और कहीं से कोई आवाज़ तक नहीं उठा करती थी। उसी दरम्यान इस स्थिति के मद्दे-नजर बतौर तत्कालीन पी यू सी एल राज्य उपाध्यक्ष मैंने अपने पी यू सी एल के साथियों रामनरेश शर्मा, रामाश्रय सिंह, राममूर्ति बाबु, चन्द्रशेखर बाबू, बशिष्ट कुमार अम्ब्ष्ठ आदि के सहयोग से जिले में पी यू सी एल का सशक्त हस्तक्षेप किया था।
इन संघर्षों में माले दफतर पर पुलिस गोलीकांड, छात्र कन्हैया हत्याकांड, फर्जी पुलिस मुठभेड़ में रामदीरीगांव में पंकज -मुकेश की दिन दहाड़े हत्या, दादपुर में फर्जी पुलिस मुठभेड़ में लड्डू- भरत हत्याकांड भगवानपुर थाने में हाजती बलात्कार, दुलारपुर के रणजीत की पुलिस प्रायोजित हत्या, उलाव में अजय-अटल की फर्जी मुठभेड़ में हत्या, रामउदित सिंह की मंझौल ओ पी में कस्टोडियल हत्या,चेरिया-बरियारपुर थाने में 80 वर्षीय वृद्ध धनिक यादव की हाजती हत्या, दयानतपुर (समस्तीपुर) में रमेश-विमलेश की पुलिस द्वारापीट कर की गयी हत्या,मंझौल में फर्जी मुठभेड़ दिखा कर रजनीरंजन एडवोकेट एवं साथियों की हत्या जैसे कांडों में अत्यंत विपरीत राजनीतिक परिस्थितियों (में भी जब जंगल -राज में जब ज़िले की तब की सबसे मज़बूत रही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी भी सत्ता के साथ सत्ता की साझीदार हुआ करती थी और सी पी एम् भी उसी पंक्ति में खड़ी थी। इसी सन्दर्भ में पी यू सी एल के तब के उल्लेखनीय कामों में ज़िले में तत्कालीन ज़िलाधीश श्रीमती हरजोत कौर के जेल निरीक्षण के दौरान जेल में बंद मुकेश यादव को चांटा मारे जाने तथा बरौनी खाद कारखाना टाउनशिप स्थित सीमा सशस्त्र बल डी आई जी हेडक्वाटर के जवानो द्वारा महिलाओं के साथ छेड़ छाड़ और विरोध किये जाने पर लोकल ग्रामीणो की बार बार पिटाई के खिलाफ पर्चा युद्ध चला कर मेधा पाटकर के सहयोग और आशीर्वाद से वहाँ से एस एस बी कैम्प का स्थानांतरण जैसे आंदोलन भी शामिल हैं।
हमलोगों ने अपने मानवाधिकार के काम के शुरूआती दौर में ही एक पत्रिका शुरू की, मानवाधिकार पत्रिका के नाम से ताकि बेगुसराय के लोगों तक मानवाधिकार सम्बन्धी खबरें और सूचनाएं दे कर उन्हें इस मुद्दे के प्रति गम्भीर और संवेदनशील बनाया जा सके और साथ ही साथ हमारे कामों के प्रति दुष्प्रचार का जवाब भी दिया जा सके।
अचानक एक दिन मुझे डॉक्टर साहेब का बुलावा आया और मैं पटना में ही उनसे मिलने उनके पास पहुंचा। काफी देर तक मेरे पिताजी, परिवार, जिले और सबसे अंत में जिले में चल रहे मेरे मानवाधिकार ग्रुप की खबरें विस्तार से सुनी। अपनी पार्टी और वाम तहरीक के बारे में काफी गहन चर्चा की। इनमें (वाम में) चल रही गड़बड़ियों को भी काफी खुले दिल से स्वीकारा मगर इस ताकीद के साथ कि हमारे मानवाधिकार आन्दोलन को वाम विरोधी, गरीब विरोधी होने से बचना पड़ेगा अन्यथा नतीजा कुल मिला कर जनता के हितों के विपरीत जाएगा।
मैंने इस सन्दर्भ में उनसे बताया कि कई बार वाम पार्टियां मानवाधिकार के नज़रिए से इतनी दूर खड़ी होती हैं कि उनके विरोध से बचा नही जा सकता। इसपर उनका कहना था कि यथा सम्भव जान बूझकर इस टकराव से बचने की कोशिश करना। तब से हम लोगों ने भी उनकी इस बात का यथासंभव पालन करने की कोशिश की। इस तरह से डॉक्टर साहेब हमारे जैसे स्वतंत्र एक्टिविस्टों और वाम तहरीक के बीच सेतु का काम किया करते थे।
मेरे मीडिया जगत के ट्रेड यूनियन के कामों में भी वे बहुत रूचि लिया करते थे और विभिन्न स्रोतों से जानकारियां इक्कठी किया करते रहते थे। मृत्युपर्यंत वे सतर्क और तमाम तरह की सूचनाओं से लैस रहे और एक आर्गेनिक इंटेलेक्चुअल की तरह काम करते रहे। ऐसे महान शख्शियत को मेरा सलाम। अलविदा कामरेड पी गुप्ता।
अरुण कुमार, लेखक मनावाधिकार कार्यकर्ता, हिंदी- अंग्रेजी के पत्रकार, मीडिया जगत के ट्रेड यूनियनिस्ट और भारतीय प्रेस परिषद् (११ वीं) के निवर्तमान सदस्य हैं।