मुर्दा गायों की मदद से जिन्दा इंसानों को काटने की मुहिम तेज़ हुई
डॉ. विनय भरत
हमारा देश अभी कई बदलावों से होकर गुजर रहा है। राजनीति में कई प्रयोग हो रहे हैं और ये प्रयोग बड़ी तेज़ी से किये जा रहे हैं। विगत 25 सालों में कमजोर केंद्र ने आर्थिक नीतियों में विषमता बरती। नतीजतन, क्षेत्रवाद और क्षेत्रीय राजनीति वक्त की जरुरत बन गयी। शायद, उत्तर–आधुनिक युग में चूँकि माइक्रो स्टडी और माइक्रो-प्लानिंग का खास महत्त्व है, इसलिए भी क्षेत्रीय राजनीति सम-सामयिक उपचार के तौर पर उभरी है।
केंद्र दिनों-दिन कमजोर होता गया। विकेंद्रीकरण को देश की परिधियों ने अपने-अपने हाथों में लेना शुरू कर दिया। जिस सत्ता की विकेंद्रीकरण की बात गांधी ने अपने दर्शन में कहा था, वो दुःख की बात है कि प्रदान नहीं की गयी। लगभग, छीन ली गयी। केंद्र पंचायत तक पहुँच नहीं पायी। बहरहाल, आश्चर्यजनक ये रहा कि जिन-जिन प्रान्तों–राज्यों में क्षेत्रीय शक्तियां हावी हुईं, या उनके नेतृत्व में सरकारें बनीं, खास बात ये रही कि उन राज्यों ने प्रगति-सूचकांक में आशानुरूप काम किया। प्रगति हुई। चाहे, वो केरल हो, तमिलनाडु हों या कि बिहार, यूपी। आन्ध्र प्रदेश, तेलंगाना या छत्तीसगढ़ ( झारखण्ड अपवाद हैं। ज्ञात रहे कि पिछले साल में जाकर यहाँ पहली बार पूर्ण बहुमत की सरकार बन सकी)। पर बाकी राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों के अन्दर ऐसा शायद इसलिए हो पाया कि सत्ता पर काबिज लोग अपनी-अपनी मिट्टी की तासीर जानते हैं और उनकी जवाबदेही लगभग रोज़ की होती है। जनता उनकी पहुँच के अन्दर होती है और विरोध की आग भी जल्द पहुँच जाती है। इसलिए सतर्क रहते हैं।
लेकिन विगत दिनों केंद्र एक बार फिर बहुत मजबूत होता नज़र आया। अच्छे संकेत भी मिले। देश को एक सूत्र में बाँधने के लिए यह एक नयी आशा के अनुरूप लगा। इस केंद्र में आई सबसे बड़ी पार्टी भाजपा ने अलग-अलग राज्यों के क्षेत्रीय पार्टियों को “सबका साथ –सबका विकास” के नारे के साथ आमंत्रण भी दिया कि अगर आप साथ चलने को इच्छुक हैं, तो साथ आयें और चलें। कई राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियाँ साथ भी आयीं। उम्मीदे जगीं। अलग विघटन की ओर बढ़ते देश ने फिर एक बार मुख्य-धारा की ओर लौट चला है, ऐसा प्रतीत हुआ।
पर अफ़सोस, देश में राजनीति ने अहिस्ते ( शोर के लिहाज से ) लेकिन तेज़ी से ( गति के लिहाज़ से ) करवट बदली और देश में धर्म के नाम पर बांटने की मुहीम तेज़ की गयी। मुर्दा गायों की मदद से जिन्दा इंसानों को काटने की मुहिम तेज़ हुई। कई बार ऐसा लगा, जैसे अब देश फिर से मज़हबी हिंसा के लिए तैयार खड़ा है। पर ऐसा नहीं हुआ। ख़ुशी भी हुई कि देश समझदार हो गया है। धर्म के नाम पर गर्दनें झुकाता तो है, पर गर्दनें काटता नहीं।
पर जब एक दो गायें और एक- गो अखलाकों की कब्रें सूखतीं, कुछ पहलू यक़ीनन अखलाक के कब्र से बाहर निकल कर आते हैं, जिसे इमानदारी से सोचना होगा।
आखिर वो क्या वजहें रही होंगी कि गाय और सूअर जैसी मांस, जिसने कभी 1857 के ग़दर की पृष्ठभूमि लिखी थी, 2015 में बेअसर हो गयीं। क्या लोग सच में इतने समझदार हो गए हैं कि अपने पूजा–घरों पर हो रहे हमलों की हकीकत को जान गए और घर में बैठे रहे ? उनके घरों में रखी तलवारें अगली रामनवमी के इंतज़ार में म्यानों में ही छोड़ दिए गए?
अगर इन प्रश्नों का जवाब “हां” है, तो सुकून वाली ख़बर है । लेकिन प्रश्न की एक गली आगे तक जाती है।
क्या ये भी सत्य है कि धर्म नाम की चीज से ही उनकी आस्था खतम हो चुकी है? असमानता की बिसात पर खड़ा धर्म और उससे जुड़े लोग क्या पक चुके हैं ?
क्या इसके लिए उनके धार्मिक गुरु भी जिम्मेदार हैं? बगैर धार्मिक गुरुओं का नाम लिए माफ़ी के साथ कहना चाहूँगा कि चूँकि 2014 से पहले तक ऐसा कभी नहीं हुआ था कि एक प्रधान मंत्री के राज्याभिषेक में घर्म-गुरुओं का एक जखीरा उनका अभिषेक–मन्त्र को पढ़ने के लिए दिल्ली पहुँचा हो।
अब यहाँ यह समझना जरूरी है कि कई बुद्धिजीवी पिछड़े जो इन धर्म-गुरुओं के अनुआयी तो थे, लेकिन इनकी अपनी राजनीतिक सोच या नज़रिया अपने धार्मिक - गुरुओं से भिन्न थी,( इसका इल्म इन्हें भी 2014 से पहले नहीं था – चूँकि चीजें अब तक परदे के पीछे रहती थीं) जब अपने धर्म - गुरुओं को उनके सामने नतमस्तक देखा, वो अंदर तक टूटे। क्योंकि भारत के इन मनीषियों या धर्म-गुरुओं की भारत की मिट्टी ने ही ये बात जेहन में बैठा रखा है कि गुरु सबसे ऊँचा है और सत्ता के सामने नहीं झुकता, बल्कि सत्ता इनके सामने झुकती है। चूँकि हिन्दू- सरीखी पार्टियों से उनकी नफ़रत तो थी ही, उनके सामने नत-मस्तक अपने धर्म-गुरुओं को झुकते देखते कर ये न सिर्फ इन गुरुओं से विमुख हुए, बल्कि धरम से भी विमुख होते नज़र आ रहे हैं।
वरना ऐसी क्या बात है कि आस्था, जागरण – सरीखे चैनलों से घिरे होने के बावजूद ये भक्त बीफ पर नहीं भड़के। बिहार में हिन्दू वोट का पोलराइज़ेशन नहीं हो सका। सामाजिक विषमता के आधार पर बिहार में चुनाव लड़ा गया। ... और नतीजा आपके सामने है।
हो सकता है ये एक छोटा- सा कारण इस धार्मिक इनडिफरेंस के लिए हो, लेकिन इस बात की अनदेखी नहीं की जा सकती कि धर्म का लीडर धर्म-गुरु ही होता है। और जब वो धार्मिक लीडर अपने राजनीतिक कार्ड को खोल कर सीधे तौर पर बेपर्दा होता है, तो उसकी इज्ज़त और साख – दोनों दांव पर तो होते ही हैं। लिहाज़ा, ऐसे मौकों पर धर्म-गुरुओं को चाहिए कि वो राजनीतिक सम्बद्धता को जाहिर न करें। वे अपनी भूमिका को समझें। उनका काम धर्म के प्रसार का है, न कि अमुक राजनीतिक पार्टी के प्रचार-प्रसार का। वे सत्ता के सामने न झुकें। और अगर, झुकते भी हों हो परदे के पीछे रह कर करें। और अगर पास आयें सत्ता के, तो इतने करीब न आयें। मैनेजमेंट की बॉडी-लैंग्वेज के हैप्टिक्स नियमों को फॉलो करें और अंतरंगता की बू से बचें। वो न भूलें कि सरकारें आती-जाती रहेंगी, पर धर्म का बचे रहना अतिअवाश्यक है। और ताकि धर्म का पताका – जो वो पकड़े हैं , लहराती रहे। वरना, वो तो डूबेंगे ही, धर्म और द्जर्मिक प्रतिष्ठानों की आस्था को भी जल-समाधि देने का कारण बनेंगे।
डॉ. विनय भरत, लेखक आजसू के केंद्रीय सह प्रवक्ता हैं।