असहमति का दमन भारत के लिये अंतर्राष्ट्रीय शर्म की बात- ग्रीनपीस इंडिया
असहमति का दमन भारत के लिये अंतर्राष्ट्रीय शर्म की बात- ग्रीनपीस इंडिया
नई दिल्ली। 25 अप्रैल, 2015। गृह मंत्रालय द्वारा असंतोष की आवाज को दबाने के खिलाफ एक तरफ देश के भीतर आवाज मजबूत हो रही है तो वहीं दूसरी तरफ भारत को इस वजह से अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी शर्मिंदगी का सामना करना पड़ा रहा है। आज ग्रीनपीस इंडिया ने कहा कि सरकार की कार्रवाई से विश्व समुदाय में लोकतांत्रिक देश के रूप में भारत की छवि कमजोर होगी।
ग्रीनपीस इंडिया के कार्यकारी निदेशक समित आईच ने कहा, “हम लोग लगातार कह रहे हैं कि गृह मंत्रालय द्वारा असहमति की आवाज को दबाने की कोशिश भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। गृह मंत्रालय आपातकाल जैसी स्थिति बना रहा है। भारतीय सिविल सोसाइटी पहले से ही एकजुट होकर सरकार के ‘मेरी बात मानो, नहीं तो अपना रास्ता नापो’ जैसे रवैये पर सवाल खड़ी कर रही है। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि सरकार की इस कार्रवाई ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी ध्यान खींचना शुरू कर दिया है। भारत अभी वैश्विक मंच पर कहीं अधिक सक्रिय भूमिका की मांग कर रहा है। ऐसे में देश के भीतर इस तरह की कार्रवाई से भारत के वैश्विक छवि को नुकसान उठाना पड़ेगा”।
पिछले एक साल में, ग्रीनपीस इंडिया लगातार गृह मंत्रालय द्वारा जारी हमले को झेल रहा है। पिछले कुछ हफ्तों मे, गृह मंत्रालय ने ग्रीनपीस के सभी खातों को बंद कर दिया है, एफसीआरए पंजीकरण को निलंबित कर दिया है और कथित रुप से राजस्व विभाग को पत्र लिखकर इसके सोसाइटी पंजीकरण और चैरिटि स्टेट्स को बंद करने की धमकी दे रहा है। 40 देशों में काम करने वाली संस्था के रुप में ग्रीनपीस के लिये इस तरह की कार्रवाई अनोखा है।
समित ने कहा, “अपने घरेलू और विदेशी आय खातों के सील होने के बाद हम संस्था के बंद होने के वास्तवित खतरे का सामना कर रहे हैं, जो कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के लिये अच्छा संकेत नहीं है। हम उम्मीद करते हैं कि लोकतांत्रिक सिद्धांतों को बरकरार रखा जाएगा और सरकार अपनी आलोचना करने वाले सीविल सोसाइटी की आवाज को स्वीकार करेगी”।
भारतीय अदालत ने असहमति के अधिकार को बरकरार रखा है और ग्रीनपीस इंडिया उम्मीद करती है कि सरकार विरोध को दबाने की बजाय देश में एक स्वस्थ बहस को बढ़ावा देगी।


