आईएसआईएस- भस्मासुर पैदा करने और फिर उसे मारने के इस सिलसिले का अब अंत होना ही चाहिए।
आईएसआईएस- भस्मासुर पैदा करने और फिर उसे मारने के इस सिलसिले का अब अंत होना ही चाहिए।
महेंद्र मिश्रा
सुबह से ही पेरिस की घटना सुनने के बाद मन कचोट रहा था। जेहन में एक अजीब किस्म की बेचैनी थी। कुछ लिखूं या ना लिखूं? लिखूं भी तो क्या लिखूं? इसको लेकर कशमकश चल रही थी। मेरे लिखने से भी क्या हासिल होगा? कई लोगों की पोस्ट देखी सब लोग अपने-अपने तरीके से घटना की निंदा कर रहे हैं। तो कई इसे अपने पक्ष में इस्तेमाल कर लेने के मौके के तौर पर देख रहे हैं।
आतंकवाद एक समय पूरे विश्व में घृणा और निंदा का पात्र था। एक दौर ऐसा था जब कुछ देशों में कुछ अलगाववादी आंदोलन जरूर थे, लेकिन उस दौरान छिटपुट घटनाओं को छोड़कर किसी बड़े आतंकी हमले की कोई मिसाल नहीं मिलती। राज्य के हस्तक्षेप और राज्यों द्वारा पनाह देने के साथ ही उसका राजनीतिकरण हो गया। देखते ही देखते हाशिये की एक चीज कब मुख्यधारा का हिस्सा बन गई पता ही नहीं चला। पश्चिम से लेकर पूर्व तक हर नागरिक अब इस पर सोचने के लिए मजबूर है। लेकिन अब समय आ गया है जब इस पर समग्रता के साथ विचार की जरूरत है और पूरी गहराई में उतरकर। इस मामले में सबसे बड़ी जवाबदेही पश्चिमी देशों और खासकर अमेरिका की बनती है।
मोटे तौर पर मौजूदा दौर का अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद तीन देशों की पैदाइश है। इराक, अफगानिस्तान और सीरिया। तीनों की कहानी तकरीबन एक सी है। इन तीनों देशों में अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देशों ने गलत तरीके से दखल दिया। इसके लिए कभी उन्होंने झूठ का सहारा लिया (इराक के संदर्भ में) तो कभी यूएन पर अपने बर्चस्व का फायदा उठा कर उससे मनमानी फैसले करवाए। बाकी इतिहास है। एक स्थापित राज्य को खत्म कर पूरी व्यवस्था को अराजक तत्वों के हवाले कर देना। सिर्फ अपने हितों की पूर्ति के लिए। यही इन तीनों की कहानी है। अमेरिकी फौजों ने सद्दाम को कुर्सी से जरूर हटाया लेकिन बाद की व्यवस्था तेल कम आतंकी ज्यादा पैदा कर रही है। अफगानिस्तान एक खूबसूरत देश था। लेकिन अब दुनिया के सामने भीख मांगने वाला एक कटोरा है। उसका यह हाल अमेरिका और तालिबानी ताकतों ने मिलकर किया है। वहां की मौजूदा सरकार तालीबानी गिरोहों के रहमोकरम पर चल रही है। बर्बर ताकतें सत्ता पर फिर से कब काबिज हो जाएं कहना मुश्किल है। आतंक की इस दूसरी फैक्टरी में उत्पादन जारी है। तीसरा मुल्क सीरिया है। मिस्र से लेकर सीरिया और फिर ट्यूनीशिया में लोकतंत्र सांस लेने लगा था। अरब देशों में लोकतंत्र की जुंबिश हुई थी। लेकिन शायद पश्चिमी देशों को यह मंजूर नहीं था। क्योंकि जनता के बरख्श एक पिट्ठू शासक को बश में रखना आसान है। दूसरी तरफ किसी नापसंद शासक को हटाने के लिए अमेरिका को आतंकियों के सहयोग से भी परहेज नहीं। सीरिया इसकी जीती जागती मिसाल है। आईएसआईएस उसी की उपज है। असद को कुर्सी से उतारने के लिए संयुक्त अरब अमीरात की मदद से अमेरिका और पश्चिमी देशों ने मिलकर आईएसआईएस को पैदा भी किया और उसे पाला-पोसा भी।
अमेरिका की प्राथमिकता आतंकवाद है या कुछ और सारिया में उसके रुख से समझा जा सकता है। यहां असद को हटाना उसकी पहली जरूरत है। यही वजह है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन जब आईएसआईएस के खिलाफ अभियान छेड़े हुए हैं तो अमेरिका उसे डिरेल करने की कोशिश में जुट गया है। लेकिन उसे जरूर इस बात का जवाब देना चाहिए कि अगर असद हटते हैं तो सत्ता कौन संभालेगा? वह कोई दूसरी ताकत होगी या फिर आईएसआईएस? या फिर असद को हटाकर पूरे मुल्क को इराक और अफगानिस्तान की तर्ज पर अराजक तत्वों के हवाले कर दिया जाएगा। नतीजतन आईएसआईएस जैसी आतंकी ताकतें इसका सबसे ज्यादा फायदा उठाएंगी।
दरअसल समस्या की जड़ कहीं और है। तेल कहां है तेल की धार कहां? यह देखना ज्यादा जरूरी है। पश्चिमी देशों का सिर्फ और सिर्फ एक हित है मुनाफा। धर्म के बाजार में मुनाफा उसकी सबसे बड़ी आस्था है। पूंजी की इस आत्मा को हासिल करने के लिए वह किसी भी हद तक गुजर सकता है। लाशें गिराने से भी गुरेज नहीं। पश्चिमी देशों के लिए हथियारों का उत्पादन और उनका व्यापार मुनाफे का सबसे बड़ा स्रोत है। उपभोक्ता बाजार में चीन के बर्चस्व के बाद पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका की निर्भरता इस पर और बढ़ गई है। लिहाजा हथियारों की बिक्री युद्धों की पहली शर्त बन जाती है। अरब इस लिहाज से सबसे मुफीद जगह है। जहां तेल के कुंओं पर काबिज होने का मौका तो है ही। अरब देशों के सेना न रखने के चलते उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी में अथाह पैसा भी। ऊपर से उन्हें आपस में लड़ाकर हथियारों की मनचाही बिक्री का मौका भी मिल जाता है। इरान-इराक युद्ध से जारी ये सिलसिला अब भयावह रूप ले लिया है। जो कुवैत, इराक अफगानिस्तान और सीरिया के रास्ते यहां तक पहुंच चुका है। इलाके में लोकतंत्र और चुनी सरकारों की गैरमौजदूगी सोने में सुहागे से कम नहीं। यह अमेरिका को खुलकर खेलने का मौका दे देती है। लिहाजा हथियारों का उद्योग आतंक पैदा करने का सबसे बड़ा स्रोत बन गया है। ऐसे में पश्चिमी देशों की जनता को ये सोचना होगा कि कहीं उनकी सरकारें हथियार बेंच कर उनके लिए मौत तो नहीं खरीद रहीं हैं ? भस्मासुर पैदा करने और फिर उसे मारने के इस सिलसिले का अब अंत होना ही चाहिए।


