आखिर राजेन्द्र यादव की मजबूरी क्या है? बहस के लिए शंकर शरण को बुला लेते!
आखिर राजेन्द्र यादव की मजबूरी क्या है? बहस के लिए शंकर शरण को बुला लेते!
राम प्रकाश अनंत
इकत्तीस जुलाई को प्रेमचंद के जन्मदिन पर हर साल की भाँति इस साल भी ‘हंस’ ने गोष्ठी का आयोजन किया। इस गोष्ठी में आधिकारिक रूप से चार वक्ताओं को बोलना था।दो वक्ताओं ने गोष्ठी का बहिष्कार कर दिया। अरुंधती रॉय ने एक वक्ता के रूप में अपनी स्वीकृति ही नहीं दी थी जबकि वरवर राव को ग्यारह जुलाई को जो पत्र भेजा गया था उसमें दो अन्य वक्ता अशोक वाजपेई व गोविंदाचार्य के नाम नहीं बताए गए थे। वरवर राव दिल्ली आ गए और जब उन्हें पता चला कि उनके साथ-साथ वाजपेई और गोविंदाचार्य भी वक्ता हैं तो उन्होंने आयोजन का बहिष्कार कर दिया। उसका कारण उन्होंने यह बताया कि अन्य दोनों वक्ता प्रेमचंद की परम्परा में नहीं आते।
जैसा कि होना ही था, एक बार फिर वही लोकतंत्र की दुहाई वाली बहस उठ खड़ी हुयी। यानी लोकतंत्र में कोई अछूत नहीं होता, जो लोग ऐसा मानते हैं वे अलोकतांत्रिक हैं, बहस से नहीं भागना चाहिए आदि-आदि। दरअस्ल ये सतही बातें हैं। अगर हम ये सोचने की कोशिश करें कि वरवर राव और अरुंधती को यहाँ क्यों आना चाहिए था और उनके इस आयोजन के बहिष्कार से क्या फायदा और क्या नुकसान हुआ तो ये तमाम बातें कहीं बेहतर ढँग से समझी जा सकती हैं।
साहित्य में हर लेखक का अपना एक विचार होता है। साहित्यिक आयोजन कोई वैवाहिक आयोजन नहीं है कि भतीजे के विवाह में बहन भात पहनाने आई है और चाचा ताऊ में दुश्मनी है, गाँव-मोहल्ले के लोग व रिश्तेदार कहते हैं-ठीक है भाई लड़ो-भिड़ो पर ऐसे मौकों पर तो एक हो जाओ और चाचा-ताऊ अपनी दुश्मनी भुला कर एक हो जाते हैं। कोई लेखक जब अपने विरोधी विचार वालों के साथ मंच पर आता है तो उसका एक संदेश जनता में जाता है, अब यह उस पर निर्भर करता है कि कौन लेखक क्या संदेश देना चाहता है।
जो लोग यह कह रहे हैं कि बहस से भागना नहीं चाहिए, आमने-सामने बहस होनी चाहिए, वरवर राव और अरुंधती ने विरोधियों के सामने अपनी बात रखने का मौक़ा गँवा दिया उन्हें यह समझना चाहिए कि यह कोई आमने-सामने बहस करने का आयोजन नहीं था। यह एक साहित्यक आयोजन था जिसमें वक्ताओं को अपने अपने वक्तव्य देने थे। ऐसे आयोजनों में किसी बहस की गुंजाइश नहीं होती है। ऐसे आयोजनों में विरोधियों के बीच अपनी बात रखने का भी कोई मतलब नहीं है। वरवर राव और अरुंधती के लिए मंच की भी कोई समस्या नहीं है। वे जनता के बीच जहाँ खड़े हो कर अपनी बात रख दें वहीं मंच बन जाता है। अरुंधती जिस पत्रिका में भी लिख देंगी वहाँ से अनुवाद कर के लोग ज़रूरतमंदों तक पहुँचा ही देते हैं। बहिष्कार करने से लोगों में यह संदेश ज़रूर जाता है कि उनके विरोधी विचार क्या हैं और जो लोग उन विचारों के पक्ष में खड़े हैं उन्हें वे स्वीकार नहीं करते।
हालाँकि मीडिया के लिये इस तरह के आयोजन का कोई महत्व नहीं है और न वह इन पर ध्यान देता है। यह अच्छी बात है कि जनसत्ता साहित्य को अभी भी बात करने लायक समझता है और उसने इस मुद्दे को उठाया। पर उसका मकसद साहित्यक दायित्व निभाना न होकर वरवर राव की कार्रवाई से उसके संपादक को चोट पहुँचना था। वरवर राव ने उनके प्रिय कवि अशोक वाजपेई को सत्ता प्रतिष्ठानों व कॉर्पोरेट से जुड़ाव रखने वाला बताया। उन्होंने फेसबुक पर तुरन्त इसका प्रतिवाद किया, अगले दिन सम्पादकीय लिखा और अगले दिन जनसत्ता के मार्क्सवादी स्तंभकार अपूर्वानंद का लेख छापा। जो बातें ओम थानवी ने फेसबुक पर लिखी उन्हें ही अपूर्वानंद ने थोड़े और शब्द मिलाकर अपने लेख में कह दीं। राजेन्द्र यादव से लोग उम्मीद कर रहे थे कि वे कुछ कहेंगे पर गोष्ठी के फोटो शेयर करने के बाद उन्होंने ओम थानवी के स्टेटस को स्वागत के साथ शेयर कर उनकी बात को ही अपनी बात मानते हुये उन्होंने हंस के सम्पादकीय के लिये कहानी बनाने के लिये अपने स्टडी रूम में चले जाना ही ठीक समझा। अच्छी बात यह है कि जनसत्ता में तरुण विजय व शंकर शरण के एजेंडा को लागू करने के अलावा मार्क्सवादियों का समूह बनाने का दायित्व उनके ऊपर था वह पूरा हो गया है और उससे भी अच्छी बात यह है कि मार्क्सवादियों का यह समूह ओम थानवी को फॉलो कर रहा है।
सवाल यह उठता है कि राजेन्द्र यादव की क्या मजबूरी है जो वरवर राव और अरुंधती रॉय को वे कार्यक्रम में बुलाना चाहते हैं। 2010 में अरुंधती रॉय ने विश्व रंजन के साथ मंच शेयर करने से मना कर दिया। वे हंस के कार्यक्रम में नहीं आतीं। इस बार भी उन्होंने अपनी स्वीकृति नहीं दी फिर भी उनका नाम वक्ताओं में डाल दिया। अरुंधती रॉय को बुलाने की आखिर क्या मजबूरी है उनकी? उनके पास गोविंदाचार्य और अशोक वाजपेई दो वक्ता थे। अगर किसी मार्क्सवादी वक्ता की ही ज़रुरत थी तो जनसत्ता के मार्क्सवादी स्तंभकार अपूर्वानंद को बुला सकते थे। मैंने पप्पू यादव की फेसबुक वाल देखी है काफी जनवादी लिखते हैं वे और उन्हें मौक़ा दिया जाता तो निश्चित ही अच्छा बोलते। अगर और अधिक विमर्श की ज़रुरत थी तो शंकर शरण को बुला सकते थे।


