सुन्दर लोहिया

दृश्य मीडिया और देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी मिलकर इस समय ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहे हैं। इसमें मतदाताओं के समक्ष भाजपा और कांग्रेस में से किसी एक को चुनने का विकल्प पेश किया जा रहा है। इसकी तमाम खबरों में भ्रष्टाचार और बलात्कार के अलावा यदि कुछ है तो केवल भाजपाई और कांग्रेसी नेताओं की एक दूसरे पर की गई छींटाकसी मात्र। जिन मुद्दों पर धुआंधार बहस चलाई जा रही है उनमें भावनात्मक मुद्दों को हवा देकर आर्थिक सामाजिक विषयों को बहस के दायरे से बाहर रखा जा रहा है। इसने उसको खूनी पंजा क्यों कहा और उसने इसे सियार कह कर मन हलका कर लिया। बहस के नाम पर दोनों पार्टियों के जबानदराज़ प्रवक्ता अपनी बात तो कहते हैं लेकिन दूसरे को सुनने का धैर्य किसी में नहीं है। बीच में बौद्धिक किस्म के पत्रकार और विश्वविद्यालयों के विद्वान अपना अभिमत प्रकट करने के लिए उंगली उठा उठा कर मंच संचालिका का ध्यान आकर्षित करते रहते हैं। मतलब यह कि आधा पौना घण्टा पार्टी प्रवक्ताओं की तर्कहीन वक्तृता सुनने के बाद आप अपन आप को बेहद थका हुआ महसूस करने लगते हैं। देश की समस्याओं में मोदी और राहुल की जोड़ी में से किसी एक को चुनने का संकट प्रमुख हो जाता है।

वर्तमान परिस्थितियों के चलते आप और मेरे जैसे श्रोता इसमें कोई परिवर्तन लाने की हैसियत नहीं रखते हैं। इसलिए इस जंतर मंतर से बाहर निकलने के लिए किसी दूसरे छोर से प्रयास करना उचित होगा। यहां आम आदमी की पार्टी भी अपने वर्ग सहोदरों के साथ भावनात्मक स्तर पर मुकाबला करने में तत्पर है। वह भी झाड़ू लेकर दिल्ली की राजनीति से बेईमानों को साफ करने पर उतर आई है। बेईमानी किसी अखबार का फटा हुआ टुकड़ा नहीं है जिसे झाड़ू मार कर साफ किया जा सके। बेईमानी की जड़ें जहां है वहां से आम आदमी पार्टी को भी खाद पानी मिल रहा है। उसे बन्द कैसे किया जा सकता है? आम आदमी पार्टी में आदिवासियों के लिए कोई एजेण्डा नहीं है। उन्हें ज़मीन का मुआवज़ा देकर जिन्दगी से जिस तरह बेदखल किया जा रहा है उसके तकलीफ को समझने वाली संवेदनशीलता उनके घोषणापत्र का अंग नहीं है। यह मुआवजा उस नदी की तरह सदानीरा तो नहीं है जो उसके खेत को फसल के लिए पानी दे कर समृद्धि के सपनों से उसे रोमांचित कर देती थी। अकाल में खाने के लिए मच्छली भी दे दिया करती थी। उस नदी को तो कम्पनी ने खरीद लिया पर इसी के साथ कम्पनी ने उनका भविष्य भी अपने खाते में डाल लिया। उनकी तकलीफों को ये बबुआ लोग क्या समझ पायेंगे ?

मीडिया उन नौजवानों के भविष्य की चिन्ता नहीं कर रहा जो लाखों रुपये खर्च करने के बाद जिस डिग्री को हासिल करते हैं वह उसे नौकरी के लिए फिर भी योग्य सिद्ध नहीं कर पाती। सरकार से यह तो पूछा जाना चाहिये कि रोज़गार देने वाली शिक्षा स्वास्थ्य और इन्साफ आम आदमी को कब प्राप्त होगा और कैसे होगा ? चुनाव में लैपटाप या रंगीन टीवी चुनाव भले ही जितवा दे लेकिन लोगों का दिल तो नहीं जीत सकते। इन मसलों पर मीडिया की चुप्पी उसे जनता से दूर ले जा चुकी है। इसलिए कोई अगर यह सोचे कि इस मीडिया के ओपीनीयन पोल या एक्जि़ट पोल से चुनाव परिणाम में कोई फर्क पड़ता है तो वह सिर्फ मीडिया प्रचारित भ्रम का शिकार है।

हमने ऊपर समस्या को दूसरे छोर से पकड़ने की बात लिखी है उस पर आते हैं। हम यह मान लें कि हमें इन दो पार्टियों के बीच में से ही चुनाव करने की राजनीतिक मज़बूरी है। हमें इन पार्टियों के वर्गचरित्र को समझने की कोशिश करनी चाहिए। दोनों का आधार देश का मध्यम वर्ग है। नई आर्थिक नीतियों के कारण जो नवढनाढ्य मध्यमवर्ग पैदा हुआ है वह दोनों पार्टियों पर हावी है। दोनों के पास प्रतिबद्ध ग्रासरूट कार्यकर्ताओं की कमी है। कांग्रेस के पास सेवादल के नाम पर एक ढांचा ज़रूर है लेकिन वह प्रभावी नहीं है जहां तक पार्टी पर प्रभावकारी पकड़ का सवाल है। इन स्वयंसेवियों के बदले निहित स्वार्थी तत्त्वों का जमावड़ा सत्ता के गलियारों में ज़्यादा प्रभावशाली बन गया है। भाजपा के पास अपना ऐसा कोई संगठन नहीं जो भी कुछ है वह आर एस एस के कार्यकर्ता और उनका अनुशासित संगठन ही है जो भाजपा के लिए संकटमोचन का काम करते करते इसका पर्दे के पीछे से संचालन करने वाला मालिक बन गया है। यशवन्त सिन्हा सुषमा स्वराज और अरुणजेटली भी अब इस नये मालिक के वफादार सेवक इसलिए बन गये हैं कि इनके पास ज़मीनी कार्यकर्ता एक भी नहीं है। जहां तक भ्रष्टाचार और साम्प्रदायिकता का सवाल है दोनों में कोई खास अंतर नहीं है। भले ही कांग्रेस के पंजे पर मुसलमानों का खून न हो लेकिन इसकी अभयमुद्रा मक़बूल फिदा हुसैन को हिन्दुत्त्ववादियों की हुड़दंगी से बचा नहीं पाई और न ही मुल्ला और मौलवियों के विरोध के कारण तसलीमा नसरीन को देश की नागरिकता देने का हौसल्ला जुटा पाई। तो फर्क कहां नज़र आता है?

कांग्रेस के अघोषित प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार राहुल गान्धी की लाईन में आपतकाल जैसा धब्बा ज़रूर है लेकिन वहीं प्रगतिशील परम्परा में बहुत सारे लोकहितकारी कानून और राजनीतिक फैसले भी हैं। इस एक अंक की बढ़ोत्तरी के कारण इस मुश्किल निर्णय की घड़ी में लोकतन्त्र की रक्षा के लिए यही एक रास्ता बचा हुआ है। यह केवल तात्कालिक समाधान हो सकता है न कि दूरगामी लक्ष्य। यदि न्यूनतम बुराई को चुनने की ही इज़ाजत हो तो कांग्रेस एकमात्र सही जबाव है। यदि कांग्रेस किसी तरह यह तय कर सके कि उसे नेहरु गान्धी परिवार से अपने आप को मुक्त कर लेना है तो इस परिवार का मानसिक तनाव कम हो जायेगा। यदि ऐसा फैसला नेहरु गान्धी परिवार करे कि उसका सदस्य प्रधानमन्त्री पद का उम्मीदवार नहीं होगा तो इससे पार्टी में नई ऊर्जा का संचार हो सकता है। ऐसा नैतिक साहस प्राप्त करके पार्टी अपने भीतर धंस चुकी चापलूसी की घुन को छांट कर छिटक सकती है। ऐसी पर्ज या नेहरु युग का कामराज प्लान फिर आजमाने का यह सही वक्त हो सकता है। फिलहाल देश में मध्यमार्गी वामपंथी राजनीति का अनुगमन करने वाली पार्टी की ज़रुरत है जो हमें अस्थिरता की अंधेरी सुरंग के दूसरे किनारे की रोशनी तक ले जाये। इसकी सम्भावना संयुक्त प्रगतिशील गठबन्धन सरकार के पहले दौर में वामपंथियों के सहयोग से बन रही थी जिसे कांग्रेस में गहरे जड़ जमाये दक्षिणपंथी राजनेताओं ने विफलता की कगार तक पंहुचा कर नष्ट कर दिया। यदि इतिहास अपने को फिर दोहराये तो निश्चित है कि उसमें वामपंथ पहले की अपेक्षा ज़्यादा ताकतवर होगा तभी यह सम्भावना वास्तविकता में बदल सकती है।