आज उधर से बारात की आमद है
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जो तेरी हद है वही मेरी हद है
फिर क्यों दोनों के बीच सरहद है

कल इधर से एक बारात उधर गई
आज उधर से बारात की आमद है

कँटीले तार लगे हैं मुल्कों के दरमियाँ
क्या पंछियों पे कोई पाबंदी आइद है

गले मिलते शख्स की बाज़ू टटोली
उस पर भी बंधा मेरे जैसा तावीज़ है

// जसबीर चावला //