आज देश जो भुगत रहा है उसके लिए लोहिया व्यक्तिगत रूप से बहुत दूर तक उत्तरदायी हैं
आज देश जो भुगत रहा है उसके लिए लोहिया व्यक्तिगत रूप से बहुत दूर तक उत्तरदायी हैं
आलोक वाजपेयी
Chanchal Bhu साहेब ने एक बड़ा माकूल सवाल उठाया है जो सभी सच्चे समाजवादियों, प्रतिबद्ध कांग्रेसियो और समाज वैज्ञानिकों को परेशान करता है कि
1- पंडित नेहरू समाजवादियों के नेता थे, लेकिन जब पटेल जी दबाव के चलते समाजवादी कांग्रेस से बाहर निकलने लगे तो पंडित नेहरू ने इन्हें क्यों नहीं रोका ?
2- क्या पंडित नेहरू को आखिर तक यह मलाल रहा की अगर समाजवादी कांग्रेस से बाहर न गए होते तो कांग्रेस का चेहरा कुछ दूसरा ही होता ?
उनके द्वारा उठाये बिन्दुओं पर कुछ रौशनी डालने की कोशिश करता हूँ।
आजादी से पहले सोशलिस्ट पार्टी लगभग हमेशा भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्लेटफॉर्म से ही राजनीति करती रही। कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के रूप में। कांग्रेस में भी समाजवादी विचारधारा का खूब दबदबा था। नेहरू उसके अगुआ थे। गांधी सबके मान्य नेता थे।
समाजवादियों पर एक ओर तो गांधी की जन आंदोलनों की राजनीति और प्रगतिशील भारतीय परम्परा का प्रभाव था वहीँ वो वामपंथ से भी गहरे प्रभावित थे। गांधी वह धुरी थे कि सबको जोड़े हुए थे। गांधी की राजनीति और मंशा अक्सर उनके घनिष्ठतम सहयोगी भी नहीं समझ पाते थे, लेकिन सब के सब गांधी की प्रखर राजनीतिक दृष्टि और कार्य योजना के कायल थे और इसलिए अपने संदेहों को दरकिनार कर वफादार सिपाही की तरह काम करते थे।
गांधी ने तीसेक साल से अपने सिपहसालारों को political power के प्रति एक निस्पृह भाव से रहना सिखाया था, क्योंकि राजसत्ता एक उपनिवेशिक शासन के पास थी और अगर तमाम तरह से वो लालच देती थी कि आंदोलन की धार कुंद हो जाए और राज सत्ता उन्हें अपने में खपा ले।
जो समाजवादी खेमा था वह यह अंतर न समझ पाया कि political power अपने आप में बुरी चीज नहीं, क्योंकि समाज में ठोस बदलाव political power और state structure पर अपना वर्चस्व बना कर ही किया जा सकता है।
इसके अलावा सब समाजवादियो में लोहिया सबसे जुझारू प्रखर राजनेता थे। जेपी एक संकोची और अनिश्चित मनस्थिति में रहने वाले थे। कृपलानी गांधी के सबसे पुराने सहयोगी होने के नाते अत्यधिक स्वतन्त्र और स्वाभिमानी थे। नरेंद्र देव सबसे सुलझे हुए और प्रखर चिंतक जरूर थे लेकिन उनका स्वास्थ्य खराब रहता था अस्थमा के मरीज थे इसलिए सक्रिय न थे।
कांग्रेस वास्तव में क्या है इस पर कभी गंभीर चर्चा तब बौद्धिक जगत में नहीं हुई। इन्हें कभी जब आंदोलन सड़क प्रदर्शन वाला नहीं होता और indirect politics हो रही होती यानी अंग्रेजों से उच्च स्तरीय बातचीत या रचनात्मक कार्यक्रम पर जोर तो इन्हें कांग्रेस दक्षिणवादी लगने लगती थी।
इन समाजवाइयो पर वामपंथ का भी असर था और ये बहुत जल्दी अधीर हो जाते थे।
लोहिया ने अपना कांग्रेस से अलग होने का फैसला अपने तेजस्वी व्यक्तित्व और प्रखर वक्त होने के चलते मनवा लिया।
नेहरू ने हर समय कोशिश की कि समाजवादी धड़ा कांग्रेस से अलग न हो। वो अपने को बचे कांग्रेसियों के बीच अकेला महसूस करते थे।
ये लोहिया ने जो गैर कांग्रेसवाद का नारा दिया और अपने जीवन भर जिसका प्रचार प्रसार किया, उससे कांग्रेस का तो नुक्सान हुआ ही बल्कि समाजवादी भी हर तरह की नकारात्मक शक्तियों के उभरने का कारण बने।
आज देश जो भुगत रहा है, उसके लिए लोहिया व्यक्तिगत रूप से बहुत दूर तक उत्तरदायी हैं। उनकी राजनीति में एक अवसरवादिता थी और भारतीय समाजवाद ने इसकी बड़ी कीमत चुकाई।
कांग्रेस का विकल्प बनने की अधीरता और न बन सकने के यथार्थ से उपज frustration, उनके सामने यही विकल्प बचता था कि उन शक्तियों को एकजुट करें जिनके पास दूसरा कोई कार्यक्रम नहीं था सिवाय गैर कांग्रेसवाद के। हिन्दू साम्प्रदायिक दल जो गांधीजी की हत्या के बाद राजनीतिक रूप से अछूत थे वो भी साथ हो गए। उन्हें राजनीति में जीत का चस्का 1967 में लगा। लोहिया पूरे धर्मनिरपेक्ष थे लेकिन साम्प्रदायिकता की उनकी नजर दूर दृष्टि वाली नहीं थी। वे अपने चातुर्य पर कुछ ज्यादा ही भरोसा करते थे और समझते थे कि शंकर जी की बारात टाइप पॉलिटिक्स करके भी उस पर समाजवादी वर्चस्व रखा जा सकेगा। यह उनकी दूसरे ऐतिहासिक भूल थी।


