आदत से मजबूर
आदत से मजबूर
जुगनू शारदेय
घोंघा प्रसादा जी वीर हैं । घोघा प्रसाद जी की वीरता अखबार तक सीमित है । अब थोड़ा हाई टेक हो गए हैं , इसलिए इंटरनेट पर ब्लाग भी लिखने लगे हैं । उनकी थ्योरी , गया वह जमाना जब सिद्धांत हुआ करता था – अब थ्योरी होती है या फंडा होता है । जैसे अंडा का फंडा या पुलिस का डंडा या गोबर का कंडा । सब में घोंघा प्रसाद जी का कोई न कोई फंडा होता है । मतलब की बात इतनी है कि समाचार पत्र में घोंघा प्रसाद जी का नाम छप जाए तो क्या बात है । फोटो छपने पर घोंघा प्रसाद जी दारु – दावत वाली पार्टी भी दे सकते हैं । समझौता भी कर लेते हैं कि कुछ न छपे , कहीं न छपे तो संपादक के नाम पत्र में तो छपे । क्या करें घोंघा प्रसाद जी आदत से मजबूर हैं । उन्हें छपास की बीमारी जो है । वसंत लाल जी महावीर हैं । उनका विश्वास अखबार में नहीं है । कभी थोड़ा बहुत होता भी था , लेकिनसंपादकोंसेलेकरसंवाददाताओं का नखड़ा झेलते झेलते अखबार से प्रेम न रहा । खास तौर पर तब जब खबरिया चैनलों की खबर के बल पर अखबार वालों ने अपनी खबर शैली ही नहीं भाषा भी बदल दी । इंटरनेट को वह मायाजाल समझते हैं । जिसको देखो एक ब्लॉग लिख दे रहा है । जरा बड़ा आदमी हुआ तो उसका ब्लॉग अखबार में भी छप जाता है , जैसे लालकृष्ण आडवाणी । सब बेमतलब है । मतलब यही है कि टेलीविजन पर चेहरा दिख जाए । वसंत लाल जान गए हैं कि क्या करने से खबरिया चैनल पर उनका चेहरा दिख जाए । दिखता ही रहता है । क्या करें वसंत लाल जी आदत से मजबूर हैं । उन्हें दिखास की बीमारी जौ है । अब मान लीजिए कि घोंघा प्रसाद – वसंत लाल की जोड़ी एक साथ देखना चाहेंगे तो आप क्या करेंगे । एक ही व्यक्ति में छपास – दिखास दोनों की बीमारी हो तो उसे कैसे पहचानेंगे । आम तौर पर यह व्यक्ति किसी पार्टी का नेता होता है । इस नेता ने मान लीजिए कि राष्ट्रमाता को एक पत्र लिखा । वह पत्र किसी भी प्रकार की डाक से राष्ट्रमाता को पत्र नहीं भेजता । प्रेस कांफ्रेंस करता है , वहां पत्रकारों को वह पत्र देता है । कहीं न कहीं छप जाता है । खबरिया चैनल पर न सही थोबड़ा , पट्टी पर तो चल ही जाता है । ऐसे नेताओं में दिग्विजय सिंह सबसे आगे हैं । क्या करें आदत से मजबूर हैं कि वह घोंघा प्रसाद – वसंत लाल में भी हिंदुत्व खोज लेते हैं । क्या करें आदत से मजबूर हैं । इन्हें हिंदुत्व से लड़ने की बीमारी है ।हिंदुत्व को राष्ट्र , राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता में बदलने की बीमारी संघ परिवार के अनेक बाल बच्चो को है । जेसे श्रीनगर के लालचौक में 26 जनवरी को तिरंगा फहराना । छपास – दिखास भी हो जाता है । पहले से ही पता होता है कि श्रीनगर जाने नहीं दिया जाएगा । ऐसे अवसर पर घोंघा प्रसाद श्रीनगर के उमर अब्दुल्ला के समर्थन में बयान दे देते हैं । वसंत लाल उनका पुतला फूंक देते हैं । दोनों अपनी आदत से मजबूर हैं । ऐसा करने से भ्रामक जनता पार्टी की हिंदुत्व की दुकान चलती रहती है ।इसका विरोध करने से काग्रेस की सेक्यूलर दुकान चलती रहती है । इसमें कुछ सोचना भी नहीं पड़ता है । वैसे भी इस देश में सोचना जरूरी नहीं होता है ।कांग्रेस पार्टी की सरकार से लेकर दूसरी पार्टियों की सरकार रोज ही कुछ न कुछ ऐसा करती है कि आप सोचने पर मजबूर हो जाते हैं । यह सोचने वाले भी आदत से मजबूर हैं । क्या करें यह सोचना भी एक बीमारी है । आप भ्रष्टाचार पर सोचना चाहते हैं – सामने अपनी पाखंडी राष्टीयता खड़ी है कि कश्मीर से कन्याकुमारी एक है । इस एकता को समझने का आसान तरीका है कि दोनों जगह महंगाई एक समान है । भ्रष्टाचार और महंगाई अपनी आदत से मजबूर हैं कि बढ़ते ही रहते हैं । यह दोनों भी तो एक नहीं अनेक बीमारी हैं ।


