“आप” में चली झाड़ू- केजरीवाल में नेतृत्व क्षमता न होने का शांति भूषण का आरोप
“आप” में चली झाड़ू- केजरीवाल में नेतृत्व क्षमता न होने का शांति भूषण का आरोप
नयी दिल्ली। देश की राजनीति की पर झाड़ू चलाकर गंदगी साफ करने का दावा करने वाली आम आदमी पार्टी में एक बार फिर कलह सतह पर आ गयी है। पार्टी के अंदर अब अरविंद केजरीवाल के विरोध में खुल कर बोला जाने लगा है। केजरीवाल पर पार्टी के कई वरिष्ठ नेता पहले भी कई बार हमला बोल चुके हैं, लेकिन इस बार पार्टी के सबसे पुराने सदस्य और एक करोड़ रुपया दान करके पार्टी की बुनियाद रखने वाले पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने हमला बोला है। उन्होंने आरोप लगाया कि 'अरविंद में वह क्षमता नहीं कि वे पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर चला सकें। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र की कमी है और वे सिर्फ अपनी बात सुनते हैं।' तो पार्टी सुप्रीमो पर इतने गंभीर आरोप पर आप भी कहां चुप रहने वाली थी, पार्टी ने भी तुरंत पलटवार करते हुए अपने बयान में शांति भूषण के औरोपों की पुष्टि ही कर दी। पार्टी की ओर से जारी बयान जो मीडिया में आया उसमें साफ तौर पर यह आशंका जताई गई कि संभवत: शांति भूषण हरियाणा विधानसभा चुनाव में पार्टी के नहीं लड़ने के फैसले से नाराज हैं। लेकिन यह फैसला पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राजनीतिक मामलों की समिति (पीएसी) में लिया गया है। इससे पहले पार्टी के एक और शीर्ष नेता योगेंद्र यादव भी पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठा चुके हैं।
बुधवार को केजरीवाल की नेतृत्व क्षमता पर हमला बोलते हुए शांति भूषण ने हुए कहा कि उनमें नेतृत्व क्षमता का अभाव है, किसी और को पार्टी का नेतृत्व सौंपा जाना चाहिए। इस बयान के बाद से पार्टी के अंदर घमासान शुरू हो गया। कई नेता तो शांति भूषण के पक्ष में खड़े दिखे तो कई नेता शांति भूषण के विपक्ष में। कई पार्टी नेताओं ने शांति भूषण के इस बयान की घोर आलोचना की और उनसे कहा गया कि उन्हें अगर कोई नाराजगी है तो सदस्यों के साथ बोलना चाहिए था इस तरह सार्वजनिक मंच पर बोलना ठीक नहीं है।
आप नेता और शांति भूषण के बेटे प्रशांत भूषण ने अपने पिता से असहमति जताते हुए कहा कि उन्होंने निजी विचार व्यक्त किया जिसे वह सार्वजनिक तौर पर चर्चा करने के बजाए अगर पार्टी फोरम पर चर्चा करते तो अच्छा होता।
पार्टी के दिल्ली संयोजक आशुतोष का मीडिया में बयान आया कि, यह कहना फैशन हो गया है कि पार्टी में अंदरुनी लोकतंत्र नहीं है। पार्टी के अंदर लोकतंत्र कैसे काम करता है इसका “आप” एक अच्छा उदाहरण है।
हालांकि शांति भूषण ने कोई नया आरोप नहीं लगाया है, इसी तरह के आरोप पहले भी पार्टी के कई नेता जिनमें विनोद कुमार बिन्नी, अश्विनी उपाध्याय और शाजिया इल्मी भी शामिल हैं, लगा चुके हैं। पार्टी ने पिछले हफ्ते करन सिंह को बर्खास्त कर दिया जो एक वरिष्ठ कार्यकर्ता थे। करन ने भी अंदरूनी लोकतंत्र के अभाव की शिकायत करते हुए पार्टी के अन्य कार्यकर्ताओं के साथ मिलकर आप वालंटियर्स विचार मंच (अवाम) का गठन कार्यकर्ताओं के मुद्दों को उठाने के लिए किया था जिसके बाद उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। भूषण ने अवाम का समर्थन किया था।
पूर्व कानून मंत्री शांति भूषण ने कानूनी पेचीदगी बताते हुए कहा कि चूंकि केजरीवाल निर्वाचित नेता नहीं हैं इसलिए वह पार्टी की एकमात्र आवाज होने का दावा नहीं कर सकते। उन्होंने कहा, आज वह अपने पद पर पार्टी के अखिल भारतीय सदस्यों के निर्वाचित व्यक्ति के रुप में नहीं हैं इसलिए वह नहीं कह सकते कि उनकी आवाज पार्टी की एकमात्र आवाज है। संभवत: वह सोचते हैं कि राष्ट्रीय परिषद ने उन्हें राष्ट्रीय कार्यकारिणी का समन्वयक नियुक्त किया इसलिए वह मानते हैं कि उनकी बात ही प्रमुख है।
Sad that a revered leader like Shanti Bhushan ji has gone public with his views that are best discussed within the party.
— Yogendra Yadav (@AapYogendra) August 13, 2014
दरअसल केजरीवाल की शैली को लेकर अन्ना आंदोलन के समय से ही सवाल उठते रहे हैं और टीम अन्ना से लेकर आप के गठन के बाद से अब तक एक-एक करके कई महत्वपूर्ण लोग टीम और पार्टी छोड़ चुके हैं। टीम अन्ना के शुरुआती दौर में ही स्वामी अग्निवेश, जल पुरुष राजेंद्र सिंह, मुफ्ती शमून अहमद काजमी से जो सिलसिला शुरू हुआ, वह थमने का नाम नहीं ले रहा है।
पार्टी की अंदरूनी राजनीति को जानने वाले सूत्रों का कहना है कि पार्टी में एक खास एनजीओ समूह का कब्जा है, जो धीरे-धीरे सभी महत्वपूर्ण लोगों को ठिकाने लगाकर पार्टी को एनजीओ की तरह संचालित करना चाहता है। इसी रणनीति के तहत पहले योगेंद्र यादव पर हमला बोला गया था, बाद में शाजिया इल्मी भी बाहर हो गईं और चर्चा है कि इस एनजीओ समूह का अगला निशाना कुमार विश्वास हो सकते हैं।
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