‘आप’ के उभार के मायने-2
अनिभव सिन्हा

अगर हम ‘आप’ के सामाजिक आधार और उसके घोषणपत्र पर निगाह डालें तो हमें उसकी प्रकृति और चरित्र को समझने में सहायता मिलेगी। जैसा कि हम बता चुके हैं, ‘आप’ की जड़ अण्णा हज़ारे द्वारा शुरू किये गये भ्रष्टाचार-विरोधी आन्दोलन में थी। यह आन्दोलन 26/11 के आतंकवादी हमले के बाद शुरू हुआ था। देश में उस समय भी शासक वर्ग के नग्न भ्रष्टाचार के विरुद्ध गहरा रोष था; आम मेहनतकश जनता महँगाई और बेरोज़गारी के बोझ तले कराह रही थी; देश के निर्धनतम लोग भुखमरी और कुपोषण से मर रहे थे। ऐसे समय में, जब देश के पूँजीवादी राजनीतिक वर्गों के साथ मोहभंग अपने चरम पर था, अण्णा हज़ारे अवतरित होते हैं! अण्णा हज़ारे का पूरा आन्दोलन एक गै़र-जनवादी आन्दोलन था; यह बुर्जुआ जनवाद की विफलता को हर प्रकार के जनवाद के नकार और एक तानाशाही जैसी व्यवस्था के समर्थन तक ले जाता था। पाठकों को याद होगा कि अण्णा हज़ारे का जनलोकपाल का प्रस्ताव चुनाव के सिद्धान्त को ख़ारिज करता था; विद्वत लोगों की परिषद् को जनलोकपाल चुनने की ज़िम्मेदारी देता था; उसे सभी चुने गये प्रतिनिधि (चाहे यह प्रतिनिधित्व कितना भी सीमित हो!) निकायों के ऊपर वरीयता और प्राधिकार देता था। अण्णा हज़ारे खुद कहते थे कि इस जनता के ऊपर कुछ भी कैसे छोड़ा जा सकता है जो टीवी और साड़ी के बदले अपना वोट दे आती है!

रालेगण सिद्धि में अण्णा हज़ारे का प्रयोग भी दिखलाता था कि जनवाद के सिद्धान्त में अण्णा हज़ारे का कोई भरोसा नहीं है। उनके लिये परिवर्तन, विकास और सुधार का कार्य जनता नहीं कर सकती जो कि मूढ़ और अज्ञानी है; यह काम समाज के लिये कुछ विद्वतजन करते हैं और उनकी परिषद् को ही यह उत्तरदायित्व सौंपा जा सकता है, जो दण्ड और अनुशासन के ज़रिये जनता को रास्ते पर रखे! इसी आन्दोलन में अरविन्द केजरीवाल और उसकी वानर सेना भी शामिल थी। अण्णा हज़ारे तो महज़ एक ‘लाँच पैड’ थे! इसी आन्दोलन से निकलकर अरविन्द केजरीवाल ने चुनावी दल बनाने का फैसला किया क्योंकि अण्णा हज़ारे का आन्दोलन अपने सन्तृप्ति बिन्दु पर पहुँच रहा था। अब जनता का भी एक हिस्सा समझ रहा था कि केवल धरना-अनशन कर कुछ हासिल नहीं होगा। ठीक इसी समय पर अरविन्द केजरीवाल ने अपना ‘मास्टर स्ट्रोक’ खेला। हालाँकि, इसके पीछे दिमाग़ योगेन्द्र यादव, आनन्द कुमार, अभय कुमार दुबे, प्रशान्त भूषण आदि जैसे सुधारवादियों, समाजवादियों का था। यहीं से अण्णा हज़ारे और केजरीवाल के रास्ते अलग हो गये। वास्तव में, यह पूँजीवादी शासक वर्ग के लिये अच्छा ही था क्योंकि उसे इन दोनों ही मदारियों की ज़रूरत है!

अण्णा हज़ारे के समर्थन में तमाम टुटपुँजिया वर्ग इकट्ठा हुये थे, जिनकी पहचान राजनीतिक चेतना के त्रासद अभाव से की जा सकती है। एक तरफ़ उच्च मध्यवर्ग की प्रतिक्रिया अण्णा हज़ारे के आन्दोलन के साथ खड़ी थी, जिसे कि अण्णा हज़ारे का जनवाद-नकार बहुत रास आ रहा था; वहीं, निम्न मध्यमवर्गीय आबादी भी महँगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार आदि से तंग होकर इस आन्दोलन के पक्ष में खड़ी थी, क्योंकि अपनी चेतना की कमी के कारण वह इन समस्याओं के मूल कारण को नहीं देख पा रही थी और उसे लग रहा था कि अण्णा हज़ारे जैसा कोई ‘विजिलाण्टे’, रखवाला, रक्षक, महात्मा इन समस्याओं का जादू की छड़ी से समाधान कर देगा। हर समस्या को भ्रष्टाचार और हर निम्न मध्यवर्गीय असन्तोष को ‘भारत माता की जय’ और ‘वन्दे मातरम’ जैसे जुमलों में अपचयित कर दिया गया।

केजरीवाल का सामाजिक आधार भी इसी प्रकार है, हालाँकि अनुपात बदल गये हैं। केजरीवाल और उसकी ‘आप’ शुरुआत में शहरी उच्च और मध्य मध्यमवर्गीय आबादी में आधार बनाते हुये सामने आये। आई.आई.टी., मेडिकल, मैनेजमेण्ट के छात्र, सिविल सेवा के आकाँक्षी युवा, विश्वविद्यालय आदि में पढ़ने वाले उच्च मध्यवर्गीय नौजवान केजरीवाल की ‘आप’ के शुरुआती सामाजिक आधार का निर्माण करते थे। इन वर्गों के भीतर जो प्रतिक्रियावाद मौजूद था वह केजरीवाल की सबसे अधिक सहायता कर रहा था। लेकिन योगेन्द्र यादव और आनन्द कुमार जैसे समाजवादियों ने इस उच्च मध्यवर्गीय परिघटना को निम्न मध्यम वर्गों और एक हद तक ग़रीब मज़दूर आबादी के एक हिस्से पर अपना वर्चस्व कायम करने के योग्य बनाया। यही वे लोग थे जो इस बात को समझ रहे थे कि ‘विकास’, ‘टेक्नोक्रैटिक एफिशियेंसी’, सामाजिक डार्विनवाद, ‘मुक्त’ प्रतियोगिता आदि के प्रति पढ़े-लिखे शहरी मध्यवर्ग के प्रतिक्रियावादी आग्रह के बूते पर ही ‘आप’ का चुनावी प्रयोग सफल नहीं हो सकता है। इन्होंने ‘आप’ के एजेण्डे में ग़रीब आबादी की माँगों को समेकित करने का काम किया। मिसाल के तौर पर, बिजली और पानी के सवाल के अलावा, अनधिकृत कालोनियों को नियमित करना, सभी झुग्गी निवासियों को पक्के मकान देना, सभी ठेका कर्मचारियों को नियमित करना, 500 नये सरकारी स्कूल बनवाना आदि जैसी माँगों को अलग-अलग समय पर ‘आप’ अपने माँगपत्रक में शामिल करती गयी। जिन समस्याओं का ज़िक्र ‘आप’ ने अपने घोषणापत्रें और पर्चों आदि में किया उनमें से एक के लिये भी पूरी पूँजीवादी व्यवस्था, उसमें निहित असमानता, संसाधनों के असमान वितरण, सम्पत्ति सम्बन्धों को ज़िम्मेदार नहीं ठहराया गया। इन सबके लिये केवल काँग्रेस, भाजपा जैसी पार्टियाँ और उनका भ्रष्टाचार ज़िम्मेदार था! हर समस्या का एक ही कारण-भ्रष्टाचार! यहाँ तक कि ग़रीबी के लिये भी काले धन को ज़िम्मेदार ठहराया गया जो कि विदेश चला जाता है! इस बात पर कोई सवाल नहीं उठाया गया कि जो अकूत सम्पदा देश के बाहर नहीं जाती उसका असमान वितरण क्यों होता है, और यह कि अगर विदेशों में जमा काला धन वापिस आ गया तो क्या वही भी उसी अनुपात में विभाजित नहीं होगा, जिस अनुपात में देश में ही रहने वाली सम्पदा होती है? लेकिन अमीरी-ग़रीबी, असमानता के बुनियादी सामाजिक-आर्थिक मुद्दे और इस सवाल को कि इसके लिये ज़िम्मेदार वास्तव में कौन है, केजरीवाल कभी उठाते ही नहीं। क्यों? इसे समझना ज़रूरी है।

‘आप’ की आँखों में कुछ ‘महके’ हुये से राज़ हैं!

केजरीवाल दावा करते हैं कि ‘आप’ न तो वामपंथी है, न दक्षिणपंथी और न ही मध्यमार्गी! वह विचारधारा प्रेरित राजनीति नहीं करती है। उसकी राजनीति एक उत्तर-विचारधारा और उत्तर-राजनीति के दौर की राजनीति है! इतिहास गवाह है कि अन्ततः ऐसी सभी तथाकथित उत्तर-विचारधारा राजनीतियाँ दक्षिणपंथी राजनीति के किसी नये संस्करण की शुरुआत के पीछे काम करने वाले बहाने होते हैं। हम ‘आप’ के प्रतिक्रियावादी और दक्षिणपंथी चरित्र को दिखलाने के लिये ‘आप’ की कुछ चुप्पियों की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहेंगे।

‘आप’ का खुद का सर्वेक्षण बताता है कि दिल्ली में उसके अधिकाँश समर्थकों का कहना है कि वे दिल्ली में केजरीवाल को मुख्यमन्त्री पद पर देखना चाहते हैं, जबकि केन्द्र में वे मोदी को वोट करने वाले हैं। यह अनायास नहीं है। इसके पीछे गहरे कारण हैं।

‘आप’ जिन मुद्दों पर चुप है या कोई अवस्थिति नहीं अपनाती है, या फिर जिन मुद्दों को बस वह भ्रष्टाचार का नतीजा बताकर कन्धे उचका देती है, वे अहम मुद्दे हैं। मिसाल के तौर पर, जब ‘आप’ का चुनाव प्रचार जारी था उसी समय मुज़फ़्फ़रनगर में दंगे हुये। अब इस बात के पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं कि ये दंगे सोचे-समझे तौर पर संघी गिरोह ने करवाये थे। लेकिन अरविन्द केजरीवाल और ‘आप’ इस पर एक अहम बयान भी जारी नहीं करते! क्या यह चुप्पी चौंकाने वाली नहीं है? केजरीवाल उस सबसे बड़े ख़तरे पर चुप हैं जो आज भारत के सामने खड़ा है-मोदी के नेतृत्व में नया साम्प्रदायिक फासीवादी उभार! इस पर केजरीवाल एक शब्द तक नहीं बोलते। वह काँग्रेस की जो आलोचना करते हैं, वही आलोचना वह भाजपा की भी करते हैं जो भ्रष्टाचार के मुद्दे से कहीं आगे नहीं जाती है।

केजरीवाल ‘यूथ फॉर इक्वॉलिटी’ जैसे समूहों की राजनीति पर भी चुप हैं जो कि सवर्णवादी अवस्थिति से आरक्षण का विरोध करते हैं। यह भी बताया जाता है कि केजरीवाल खुद ‘यूथ फॉर इक्वॉलिटी’ के सदस्य थे! यह कोई चौंकाने वाली बात नहीं है क्योंकि केजरीवाल जिस उच्च मध्यवर्गीय प्रतिक्रियावादी राजनीति की नुमाइन्दगी करते हैं, उसकी नैसर्गिक एकता इसी प्रकार की राजनीति से बनती है। स्त्रियों और पुरुषों के बीच की असमानता पर भी केजरीवाल का कोई स्टैण्ड नहीं है। वह महिलाओं की सुरक्षा के लिये कमाण्डो दस्ते बनाने की बात करते हैं। लेकिन यह पुरुषों द्वारा महिलाओं को दी जाने वाली सुरक्षा ही होगी। यह अपने आप में पूरी की पूरी पितृसत्तात्मक सामाजिक-सांस्कृतिक व्यवस्था पर प्रश्न नहीं है।

केजरीवाल की ‘आप’ कश्मीर और उत्तर-पूर्व में दमित राष्ट्रीयताओं के उत्पीड़न पर, आफ्स्पा, डिस्टर्ब्ड एरियाज़ एक्ट, पोटा, टाडा, यूएपीए, मकोका, आदि जैसे कानूनों पर बिल्कुल शान्त है! छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, उड़ीसा और झारखण्ड में आदिवासियों के कत्लेआम पर ‘आप’ चुप है! और इससे भी ख़तरनाक बात यह है कि इन सारे मुद्दों को केजरीवाल हमेशा भ्रष्टाचार पर अपचयित करने, इसके लिये भ्रष्ट काँग्रेस और भाजपा को ज़िम्मेदार ठहराने के लिये तत्पर रहता है। इस प्रकार भ्रष्टाचार का पूरा मुद्दा एक ऐसा उपकरण बन जाता है जो कि समस्याओं के असली कारण और हल तक पहुँचने की बजाय, उन मूल समस्याओं को ढँकने और छिपाने का उपकरण बन जाता है।

जिन मुद्दों पर ‘आप’ चुप है, वे सभी वे मुद्दे हैं जिन पर बोलना मोदी की फासीवादी राजनीति को ‘अनसेटल’ कर सकता है। मोदी इन मुद्दों पर सीधे एक प्रतिक्रियावादी अवस्थिति से बोलता है; ‘आप’ इन पर सीधे नहीं बोलती (इसके लिये भी सम्भवतः योगेन्द्र यादव और आनन्द कुमार जैसे समाजवादी दल्लों को धन्यवाद देना चाहिए!)। लेकिन इन पर एक साज़िशाना चुप्पी कायम रखती है। या फिर इन मुद्दों को भी भ्रष्टाचार की पैदावार बता देती है। तो सारा मसला अन्त में एक जनलोकपाल बनाने और भ्रष्टाचार का सफ़ाया करने पर आकर केन्द्रित हो जाता है! यह पूरी राजनीति सचेतन तौर पर न भी सही, तो वस्तुगत तौर पर अन्त में फासीवादी राजनीति की मदद करती है, क्योंकि ‘आप’ जिस प्रकार के राजनीतिक दल के तौर पर उभरी है, उसी रूप में उसका भारतीय पूँजीवादी राजनीति में बने रह पाना सम्भव नहीं है; या तो यह पार्टी ही बिखर जायेगी और इसके अधिकाँश तत्व दक्षिणपंथी उभार के पक्ष में जाकर खड़े हो जायेंगे, या फिर इस पार्टी का स्वरूप काफ़ी हद तक काँग्रेस, भाजपा जैसा ही हो जायेगा। इन दो सम्भावनाओं के अलावा हमें और कोई सम्भावना नज़र नहीं आती।

आगे भी जारी….
मौजूदा पूँजीवादी व्यवस्था की एक ज़रूरत है ‘आप’ का उभार
अभिनव सिन्हा, लेखक “मुक्तिकामी छात्रों-युवाओं का आव्हान पत्रिका के संपादक हैं।

आव्हान के सितम्‍बर-दिसम्‍बर 2013 अंक से साभार