आप सुन तो रहे हैं अखिलेशजी, शिल्पी गौड़ को सस्पेंड इसलिए किया गया !
आप सुन तो रहे हैं अखिलेशजी, शिल्पी गौड़ को सस्पेंड इसलिए किया गया !
लखनऊ। शिल्पी गौड़ हेड मिस्ट्रेस (प्रधान अध्यापिका) हैं, सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय रहती हैं और राजनैतिक-सामाजिक मुद्दों पर सोशल मीडिया पर बेबाकी से राय रखती हैं। पिछले दिनों उन्हें निलंबित कर दिया गया, जिसकी जानकारी शिल्पी गौड़ ने अपने फेसबुक स्टेटस के जरिए दी। यहां शिल्पी गौड़ के दो फेसबुक स्टेटस उनकी फेसबुक टाइमलाइन से आभार सहित दिए जा रहे हैं, ताकि आप भी समझ सकें कि शिल्पी गौड़ जैसे लोगों को ये सरकार और व्यवस्था बर्दाश्त क्यों नहीं करती, भले ही वह तथाकथित समाजवादियों की सरकार ही क्यों न हो -
Shilpi Gaur को नौकरी से सस्पेंड कर दिया गया..गुनाह कि वो हेड मास्टर थी और अपने सहायक अध्यापकों को स्कूल वक़्त पर आने की सलाह देती है और बच्चों की पढ़ाई के प्रति जागरूक हैं..खुद भी सरकारी प्राइमरी स्कूल में ही पढ़ी हैं इसलिए भावनात्मक रूप से वहां के बच्चों से खुद को गहरा जुड़ा हुआ महसूस करती हैं!!
दूसरी वजह वो चुपचाप अपनी नौकरी करती हैं और अपने से बड़े पद पर नियुक्त अध्यापकों की आँखों की सेंकाई का जरिया खुद को नहीं बनने देती, इसीलिए शिल्पी गौड़ को घमंडी, बदतमीज और गैर जिम्मेदार साबित किया गया।।
शिल्पी गौड़ दुखी है निराश है मगर हारी नही..कोई साथ न दो.. उन्हें अकेले लड़ना आता है,,अपने उसूलों और आत्मसम्मान से समझौता करके हराम की कमाई खाने का शिल्पी गौड़ को न तो शौक है न उनकी फितरत।
अपने व्यक्तिगत ईमानदारी और निष्ठा पर मुझे किसी की सहमति के मुहर की जरुरत नहीं है।।।।।
अंग्रेजी प्राइवेट स्कूल के बच्चों में कितनी भी प्रतिभा दिखे मुझे इससे कोई आश्चर्य कभी नही होता... ये योग्यताएँ जन्मजात या मेहनत से बनी नहीं होती इन योग्यताओं को पैसे से खरीद कर पैसे वाले माँ बाप अपने बच्चों को दे देते है...!!
दूसरी तरफ सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले गरीब, पिछड़े, खेतिहर, मजदूरों के बच्चे जिनके माँ बाप एक पेंसिल और नोट बुक देने में अपने बच्चों को कई-कई दिन इंतज़ार करवाते हैं..भूखा ही स्कूल भेज देते हैं मिड डे मील के भरोसे..,, उन बच्चों के पास दो रूपए वाली नोट बुक होती है (कुछ के पास वो भी नहीं..) वो उसे हफ्ते भर चलाने को विवश होते हैं.. पढ़ने के लिए इनकी आँखों में जुनून भी दिखेगा मगर शिक्षकों की मानसिकता कि कैसे भी ड्यूटी का टाइम पास हो जाये.. हैं तो सब गरीबों, पिछडों, दलितों की औलादें, पढ़ेंगे कैसे?.. ये तो जन्मजात अयोग्य, फिर क्या घण्टों फोन पर शुरू, तो कभी आपस में बैठकर गपशप, (अगर गप्पशप के दौरान बच्चे शोर मचने लगे आपस में तो कुटाई पक्की), बच्चों को भी समझ आता रहता है मगर लाचार नजरों से शिक्षकों के पढ़ाने का इंतज़ार करते रह जायेंगे.. इनके माँ बाप भी इतने जागरूक नहीं कि घर पर दो अक्षर पढ़ा सकें.. इन गरीब बच्चों का एक एक कीमती दिन इतनी बेदिली से तबाह किया जाता है, कि कभी हिसाब हो तो ये सरकारी स्कूलों के शिक्षक जवाब नही दे पाएंगे।। क्यों और किस मानसिकता के तहत इतनी हिम्मतें बढ़ती हैं इनकी कि बच्चों के भविष्य को सूली पर चढ़ाने पर आमादा हैं ये शिक्षक..?? ये भी सच है कि बगैर सरकारी निष्क्रियता के ये संभव भी नहीं...।
एक तरफ पैसे के बल पर अथाह योग्यताएँ बनाई जा रहीं, दूसरी तरफ अथाह निकम्मेपन से बड़ी गरीब आबादी का भविष्य दावं पर लगाया जा रहा।।
सिर्फ इतनी ही संवेदनहीनता नहीं अगर कोई सरकारी आयोजन किया जाता है स्कूली बच्चों के नाम पर उनको अगुआई या पुरस्कृत करने का, तो महंगे अंग्रेजी प्राइवेट स्कूलों के बच्चों को ही वहां बुलाकर प्रतिभा योग्यता का प्रदर्शन किया जाता है..वही सजे धजे बच्चे ही मंत्री के पास जाते हैं.. उन्हीं में विशिष्ट योग्यता भी होती है और वही सभी बच्चों के प्रतिनिधित्व का प्रतीक बनकर खड़े दिखते हैं..बाकि के करोड़ों गरीब अभावग्रस्त बच्चों को पूछने वाला कोई नहीं.. न तो सरकारें न बुद्धिजीवी..और सरकार के नुमाइंदे यहाँ तक कि देश के राष्ट्रपति भी इन्हीं बच्चों के नेता हैं..इन्हीं को पुरस्कृत करते हैं और इन्हीं के साथ मुस्कुराते फ़ोटो खिंचवाते हैं!!!!!


