‘आप’ से मोदी के चंद सवाल
‘आप’ से मोदी के चंद सवाल
‘आप’ ‘सिद्धांतवादी है या व्यवहारवादी’?
आम आदमी पार्टी (‘आप’) ने आगामी लोकसभा चुनाव के मद्देनजर देश के सभी जनसंगठनों से उनके साथ आने का आव्हान किया है। लेकिन ‘आप’ को यह समझना होगा कि पारदर्शिता; आंतरिक लोकतंत्र; साफ छवि के उम्मीदवार भर से बात बनने वाली नहीं है। जनलोकपाल जैसे कुछ प्रगतिशील कानून लाने से कुछ समय के लिए व्यवस्था बेहतर जरूर होती है, लेकिन उसमें बुनियादी बदलाव नहीं आता है। आजादी के बाद से देश ने गांधी के विकास और व्यवस्था के मॉडल को ठुकरा दिया जिससे लोगो के बीच खाई बढ़ती गई। 1990 के बाद के दशक बाद अपनाए गए नवउदारवाद के विकास मॉडल ने इस खाई को और गहरा कर दिया। इसे बदलने जैसी कोई बात ‘आप’ के दृष्टि पत्र में नहीं। झलकती। अपना कैरियर न तो उस वैकल्पिक झोड़: झूठे केस; जेल; जान का खतरा; आर्थिक तंगी; मीडिया उपेक्षा के बीच पिछले 25 साल से जमीनी स्तर पर सामाजिक-राजनैतिक बदलाव का काम कर रहे मेरे जैसे सैकड़ों समाजिक-राजनैतिक कार्यकर्ताओ को ‘आप’ का दृष्टि पत्र को पढ़कर गहरी निराशा है। इसलिए, इस बारे में हम आगे कुछ और सोचे उसके पहले कुछ जवाब चाहेंगे।
बेहद अफ़सोस है- इस मामले में ‘आप’ का दृष्टि पत्र कांग्रेस, भाजपा जैसी स्थापित पार्टी से कुछ ज्यादा जुदा नहीं है। यह दिल्ली केन्द्रित है और प्रमुख मुद्दों को सतही तौर पर रखा गया है; इसमें कही भी मुद्दों गहरी समझ नहीं झलकती।
पहला सवाल : देश की दो तिहाई जनता के लिए ‘आप’ के पास विकास का वैकल्पिक मॉडल क्या है? क्या वो गांधीजी की इस बात पर आधारित होगा – प्रकृति हर व्यक्ति की जरूरत पूरी कर सकती है, लेकिन किसी एक का भी लालच नहीं। नवउदारवाद के बाद अपने गए विकास के वर्तमान मॉडल से गाँव बर्बाद हो रहे है; पर्यावरण नष्ट हो रहा है; मौसम में अचानक बदलाव आ रहा है; अमीर-गरीब के बीच खाई बढ़ रही है, देश की दो तिहाई जनता 20 रुपए रोज पर जीवन गुजारती। जिस तर्ज पर आज दिल्ली और अन्य महानगरों का विकास हो रहा है उससे यह बर्बादी और बढ़ेगी।
दूसरा सवाल : ‘आप’ ‘सिद्धांतवादी है या व्यवहारवादी’? क्योंकि, ‘आप’ ने अपनी वेब साईट पर कहा है: “ ‘आप’ विचारधारा प्रेरित न होकर समाधान केन्द्रित है। राजनैतिक पार्टी को विचारधारा के खाके में बांधने की पुरानी परम्परा है। जिसके चलते, सब मुद्द्दों और उसके समाधान से भटक जाते हैं। हमारा लक्ष्य समाधान केन्द्रित है। अगर हमें समस्या का हल लेफ्ट (विचारधारा) से मिलेगा तो हम उस पर विचार करेंगे। उसी तरह, अगर हमे समस्या का हल राइट ( या सेंटर) में मिलेगा तो हम उस पर विचार करेंगे। विचारधारा पर उपदेश देना, तो राजनैतिक पंडितो और मीडिया का काम है” ।
हमारा मानना है की कोई भी सरकार किसी भी समस्या का हल अपनी पार्टी की विचारधारा के आधार पर ही निकलती है- उसमें, आर्थिक और सामाजिक नीति सबसे महत्वपूर्ण होती है। वही, उसे दूजी पार्टी से जुदा प्रस्तुत करती है। हालाँकि, अनुकूल परिस्थिति न होने पर सरकार के तात्कालिक निर्णय व्यवहारवाद से प्रेरित हो सकते हैं।
तीसरा सवाल : आपने अपने दृष्टि पत्र में गांधी के ‘स्वराज’ को स्थापित करने की बात की है। आप इसे कैसे प्राप्त करेंगे? क्योंकि, गांधी का ‘स्वराज’ व्यवहारवाद के सिद्दांत से नहीं पाया जा सकता,उसके मूल में तो गांधी की विचारधारा छुपी है; जिसे नेहरु से लेकर आज तक नकारा गया। गांधी साध्य से ज्यादा साधन में विश्वास करते थे। उनका कहना था- "आपके विश्वास आपके विचार बन जाते हैं, आपके विचार आपके शब्द बन जाते हैं, आपके शब्द आपके कार्य बन जाते हैं, आपके कार्य आपकी आदत बन जाते हैं, आपकी आदत आपके मूल्य बन जाते हैं और आपके मूल्य आपकी नियति बन जाते हैं।”
चौथा सवाल : क्या ‘आप’ मानती है- नवउदारवाद से उपजे निजीकरण के चलते भ्रष्टाचार बेतहाशा बढ़ा है? चाहे वो 2 जी घोटाला हो या कोयला आवंटन; बल्कि, दिल्ली की बिजली दर की समस्या की जड़ में भी निजीकरण है? इसलिए जनलोकपाल भर से भ्रष्टाचार की समस्या का स्थायी हल नहीं आएगा? दृष्टि पत्र बताता है- ‘आप’ नवउदारवाद की नीतियों के खिलाफ नहीं है।
पाँचवा सवाल : क्या ‘आप’ मानती है- सामाजिक-राजनैतिक गैरबराबरी भारतीय समाज की सबसे बड़ी समस्या है? क्योंकि ’आप’ के नीतिकार योगेन्द्र यादव ने ‘आप’ की वेब साईट पर अपने साक्षात्कार में ना सिर्फ इस गैरबराबरी से उत्पन्न टकराव से बचने की कोशिश की है, बल्कि जनसंगठनो पर इसके जाल में फंसने का आरोप लगाया है।
हम मानते हैं- समस्या, लोगों को आपके व्यापक लक्ष्य से जोड़ना का साधन मात्र है। भारत में सामाजिक टकराव से बचकर आप बुनियादी बदलाव नहीं ला सकते। हम सब अनेक विचारधाराओ से प्रभावित है- कोई मार्क्सवाद; कोई समाजवाद; कोई गांधीवाद; तो कोई अम्बेडकरवाद। हम में से कोई आदिवासियों के साथ काम कर रहा है; कोई मजदूरों के साथ; कोई किसानों के साथ; तो कोई दलितों के साथ। लेकिन, हम सबका लक्ष्य एक ही है- सामाजिक राजनैतिक बदलाव के जरिए ‘गैरबराबरी विहीन समाज’ का निर्माण।
जमीनी स्तर पर समाज के दबे हुए तबके के अधिकार की बात करने पर टकराव पैदा होगा ही। हम हमारा उदाहरण देखे, तो हमने आदिवासियों के बंधुआ मजदूर का मुद्दा उठाया तब किसान नाराज हो गए। असंगठित मजदूरों का मुद्दा उठाया, तो व्यापारी नाराज हो गए। उसी तरह, जब ‘आप’ जब दिल्ली में रिक्शा चालकों; दिल्ली के मध्यम वर्गीय घरो में काम करने महिला मजदूरों; झोपड़ पट्टी में और मध्यमवर्गीय कालोनियों में एक जैसी सुविधा और दोनों के बच्चे एक जैसे स्कूल में पढ़ाने का मुद्दा उठाएंगे, तब टकराव होगा ही। भारतीय समाज की सरंचना ऐसी है कि इसमें इस टकराव से नहीं बचा जा सकता।
छठवां सवाल : क्या ‘आप’ नवउदारवाद की नीति को किसानों की आत्महत्या का कारण नहीं मानते ? ‘आप’ ने किसानों की समस्या का हल स्वामीनाथन समिति के अनुरूप फसलों की कीमत तय करने को बताया है। जबकि, नवउदारवाद के इस दौर में ‘न्यूनतम खरीदी मूल्य’ के जरिए किसानों को कुछ तात्कालिक रहत तो दी जा सकती है, लेकिन फसलों की असली कीमत तो अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर ही तय होती है। नवउदारवादी नीति आने के बाद के आंकड़े देखें : 1995 से 2012 तक 2,84,694 किसानों ने आत्महत्या कर ली; 150 लाख किसान मजदूर बन गए, हर रोज 2000 किसान; सकल घरेलू उत्पाद में किसानी का हिस्सा 1994 से 2004 के बीच 30% से घटकर 20.62% रह गया; खाद्यान संकट आ गया है, अनाज की बोनी का छेत्र्फल 18% कम हो गया। इन सब समस्याओं से झूझने वाले ज्यादातर झोटी जोत के किसान हैं।
सातवां सवाल : क्या ‘आप’ मानती है- नवउदारवाद से उपजे निजीकरण के चलते सरकार ने बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य सामाजिक सुविधा से सरकार ने अपना हाँथ खींचा और उसे बाजार के हाथ सौप दिया? निजीकरण के बाद सामाजिक सेवा का उपयोग करने वाला समाज आमीर और गरीब के दो वर्गों में बँट गया, जिसके चलते गैरबराबरी बढ़ी है। जब सभी वर्ग के बच्चे एक ही छत के नीचे बैठकर पढ़ते थे, तो इससे न सिर्फ शिक्षा की गुणवता बनाए रखने का दबाव होता था, बल्कि सामाजिक गैरबराबरी पर कुछ रोक लगती थी। लेकिन जब से निजी स्कूल आए हैं- सरकारी स्कूलों में 90% बच्चे दलित, आदिवासी, अल्पसंख्यक वर्ग के होते हैं, इसलिए इन स्कूलों की गुणवत्ता बनाए रखने का कोई सामाजिक दबाव नहीं होता है।
नौवां सवाल : क्या आप नहीं मानते कि देश के हर बच्चे को- चाहे फिर वो प्रधानमंत्री का बेटा हो, या चपरासी या दलित और आदिवासी का – सबको एक जैसी शिक्षा देने के लिए ‘सामान स्कूल प्रणाली’ लागू की जानी चाहिए?
दसवां सवाल : ‘आप’ पार्टी, मानती है स्थापित पार्टियों में व्यक्तिवाद की परम्परा हावी है ? ‘आप’ उससे अलग क्या सोचती है? वो, उससे से कैसे बचेगी? क्योंकि, ‘आप’ के प्रचार से लेकर वेब साईट पर विचारों से ज्यादा अरविन्द केजरीवाल छाए रहते हैं; ‘आप’ के मुख-पत्र ‘आप की क्रांति’ के शीर्षक के साथ अरविन्द केजरीवाल का फोटो तो है ही, लगभग हर पेज पर भी अरविन्द केजरीवाल छाए हुए हैं। जैसे, 1 दिसम्बर 2013 के 8 पृष्ठ के अंको में 7 पर उनका फोटो है।
इसी तरह जनलोकपाल आन्दोलन के दौरान व्यक्तिवाद को इतना ज्यादा बढ़ावा दिया कि अन्ना को गांधी का अवतार बता दिया। उस दौरान निकलने वाले मुख पत्र ‘आपका पन्ना’ के सारे अंक मुद्दों पर कम और अन्ना के गुणगान में ज्यादा लगे रहते थे। आज की युवा पीढी वैसे ही गांधी को लेकर भ्रमित है ऐसे में साल भर से कम समय में उस छवि को खंडित कर को कांग्रेस- भाजपा द्वारा भ्रमित किए जाने का आरोप लगाने से आज के युवाओं पर गांधी की छवि का क्या असर होगा?
ग्यारहवां सवाल : ‘आप’ अपने काम को क्रांति बता रही है। क्या यह यह गांधी, भगत सिंह, बिस्मिल, अशफाकउल्लाह, सहित उन सब लोगों के क्रांति के सपनों का अपमान नहीं है, जिनका आपने अपने दृष्टि पात्र में उल्लेख किया है? इन लोगों ने व्यवस्था के आमूलचूल परिवर्तन में ‘क्रांति’ की कल्पना की थी- सतही सुधार में नहीं।
बारहवां सवाल : मैं अरविन्द केजरीवाल और योगेन्द्र यादव को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूँ, और उन्हें इमानदार मानता हूँ। लेकिन फिर भी एक व्यक्तिगत सवाल है- ‘आप’ पार्टी के प्रमुख अरविन्द केजरीवाल की संस्था ‘कबीर’ और नीतिकार योगेन्द्र यादव जिस संस्था में काम करते उसे अमेरिका की फंडिंग एजेंसी ‘फोर्ड फाउंडेशन’ से फंडिंग लेने के क्या कारण थे? अमेरिका के प्रसिद्ध बुद्धीजीवी जेम्स पेट्रास के अनुसार ‘फोर्ड फाउंडेशन’ अमरीकी सरकार की संस्था सी. आई. एय के एजेंट के रूप में काम करती है।
इन मुद्दों पर जितनी सार्वजनिक बहस हो उतना अच्छा है। जवाब की आशा के साथ।
आपका
अनुराग मोदी, समाजवादी जन परिषद्,कोठीबाज़ार, बैतूल,


