सूप बोले सो बोले पर ये छलनी क्यों बोले ?
श्रीराम तिवारी

सीबीआई डायरेक्टर साहब की जुबान क्या फिसली 'नारीवादी प्रवक्ता' तो मानों अब लाल-पीले हो रहे हैं। मैं तो सीबीआई प्रमुख रंजीत सिन्हा साहब को 'संदेह का लाभ' देने के पक्ष में हूँ। क्योंकि आज वे भले ही देश और दुनिया में "थू-थू के पात्र" बन गए हैं किन्तु इस सिस्टम के 'अंदर की बात' तो उजागर हो ही गई। इसका श्रेय भी तो सिन्हा जी को ही मिलना चाहिए ! उनके इस आंशिक कथन यानी अप्रिय 'महावाक्य"अगर रेप को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेना चाहिए" को लोग बाग पूरे सन्दर्भ से अलग काटकर ही पढ़ रहे हैं। जबकि सीबीआई प्रमुख ने गोल्डन जुबली के मौके पर जो कहा उसकी अक्षरश: बानगी इस प्रकार है :-
"क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनी जामा पहना दिया जाना चाहिए, क्योंकि हमारे पास उसे रोकने के लिए पर्याप्त एजेंसियां नहीं हैं, जब कुछ राज्यों में केसिनो और लाटरी को इजाजत है तो क्रिकेट में सट्टेबाजी को कानूनी रूप देने में क्या हर्ज है ? यदि सट्टेबाजी को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेना चाहिए, ठीक उसी तरह जैसे अगर रेप को रोका नहीं जा सकता तो उसका आनंद लेना चाहिए।"

यानी असल बात क्रिकेट के सट्टे की और उसकी पैरवी की ही थी, किन्तु व्याकरण के अज्ञानी और वाग्मिता के कच्चे सिन्हा जी उपमा अलंकार में गच्चा खा गये। श्रीमान् सिन्हा साहब ! 'अब चेते का होत है, चिड़िया चुग गई खेत'। गनीमत है आप ने तुरन्त खेद व्यक्त कर दिया है वरना अभी तक सीबीआई की वर्दी तो क्या चड्डी भी फाड़ दी गई

श्रीराम तिवारी , लेखक जनवादी कवि और चिन्तक हैं. जनता के सवालों पर धारदार लेखन करते हैं.

होती। कहा जा सकता है कि आपकी जुबान फिसल गई थी ! लेकिन बिन प्रयास अनायास बोले गए शब्द चीख-चीख कर कह रहे हैं कि भारतीय नौकरशाह 'नारी मात्र' के बारे में क्या सोच रखते हैं? जिन्हे सीबी आई पर ज़रा ज्यादा ही नाज था ! यकीन था! वे अब गलती से भी उसका नाम लेना भी पसन्द नहीं करेंगे। अब तक तो नेता, बाबा और स्वामी ही बोल-बचन में बदनाम थे अब तो कहना पड़ेगा कि "सूप बोले सो बोले पर ये किन्तु छलनी क्यों बोले"?

संचार माध्यमों की महती कृपा से, उन्नत सूचना सम्पर्क क्रांति के सौजन्य से और आरटीआई क़ानून की उपलब्धता से हम भारत के नर-नारियों को अब 'अंदर की बातें' सहज ही पता चला जाती हैं। इसीलिये देश की जनता को वर्तमान भ्रष्ट व्यवस्था के हमाम में अधिकांश नंगे दिखाई देने लगे हैं। न केवल 'आसाराम एंड संस' जैसे अधिकांश ऐयाश हवाला कारोबारी- बाबा और रामदेव स्वामी बल्कि उनके परम भक्त अशोक सिंघल, न केवल भारतीय प्रशासनिक सेवाओं के छोटे -बड़े, दौलतखोर-औरतखोर हरामजादे मक्कार भ्रष्ट अधिकारी, न केवल राजनीति में सुरा-सुंदरी के अभिरंजक नेतागण बल्कि अब तो देश की सर्वाधिक सम्मान प्राप्त न्यायपालिका में भी नारी उत्पीड़न के मंजर देखने सुनने को मिलने लगे हैं। सुना था कि सारे कुएँ में भांग पड़ी है। अब साक्षात् दर्शन होने लगे हैं। जब बड़े-बड़े 'पीएमइन वेटिंग' बड़े-बड़े संत-महंत, बड़े-बड़े सामाजिक कार्यकर्ता, बड़े-बड़े धरती पकड़ नेता लफ्फाजी कर सकते हैं तो एक 'बेचारे तोते' याने सीबीआई अधिकारी के 'बोल-बचन' पर इतना मलाल क्या करना ? इसीलिये हे देशवासियो !आपका तोता वही तो बोलेगा जो आपने उसे सिखया होगा।