इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) : कुछ निजी यादें
अलविदा इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) साहिब
प्रीतपाल कौर
इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) नहीं रहे। एक-एक कर के बहुत से लोग हमारी ज़िंदगी से चले जाते हैं। कुछ का जाना बहुत कुछ याद दिला देता है। वजह कि उनकी ज़िंदगी इतनी भरपूर होती है कि जो कोई भी उनकी ज़िंदगी को ज़रा सा छू भर ले वो उस पर अपनी एक अमिट छाप छोड़ जाते हैं। कुछ इस तरह कि अक्सर उनकी बातें याद आती हैं। जब वो जिंदा होते हैं तब भी और जो वे चले जाते हैं, तब भी।
इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) भी ऐसी ही शख्सियत के मालिक रहे। मैं उर्दू की दुनिया से ताल्लुक नहीं रखती, लेकिन चूँकि लिखती हूँ तो ज़ाहिर है जब मैं पहली दफा उनसे मिली तो बहुत उत्सुक थी उन्हें जानने को, समझने को और उनसे हो सके तो कुछ सीखने को।
इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) की शख्सियत और उनके साहित्यिक क़द को समझा पाना मेरी समझ से परे था। इसलिए कि मैं उर्दू नहीं पढ़ सकती। हालाँकि मेरे पिता के उर्दू और फारसी के जानकार होने की वजह से मैं उर्दू समझ लेती हूँ लेकिन जो कुछ भी इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) के बारे में जानती थी वो सब सुना- सुनाया था।
हाँ इतना ज़रूर जानती थी कि आज की दुनिया में उनके से ऊँचे क़द का उर्दू साहित्यकार मौजूद नहीं है। सो कुछ डर भी स्वाभाविक था।
वे मेरे घर में दिन के खाने पर आमंत्रित थे। मैंने उन्हें पहली दफा जब देखा तो बड़ा अच्छा एहसास हुआ। बेहद साधारण और खुशमिजाज़ इंसान। एक साधारण सा शर्ट और पेंट्स पहने हुए। तीखी नाक, सफेद बाल, कुछ कुछ गंजे। तीखी नज़रें। और अहिस्ता अहिस्ता चलने वाले और उसी तरह अहिस्ता अहिस्ता धीमे स्वर में मीठी आवाज़ में बातें करने वाले इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन)।
खाना खाते हुए खाने की कुछ तारीफ़ की और फिर और बातों का सिलसिला शुरू हो गया।

मुझे कुछ सुकून हुआ क्यूंकि मैं खाने के मामले में बहुत ज्यादा फिक्र -मंद नहीं रहती। अच्छा खाना बना हो , तबीयत से खा लिया जाये, खाने के दौरान और बाद में भी एह्साह खुशनुमा रहे तो मुझे लगता है दावत सफल रही। कुछ ऐसा ही मुझे उनका नजरिया भी लगा।
जब उन्हें मालूम हुआ कि मैं सिख परिवार से हूँ तो अचानक उत्साहित हो गए। कहने लगे कि कभी तुमने सोचा है कि मरने के बाद किससे मुलाक़ात होगी। मैं चुप। क्यूंकि मैने इस तरह से कभी सोचा नही था। मैंने कह भी दिया कि जब मरेंगे तो देखी जायेगी। वे हंस पड़े।
कहने लगे कि देखो मुझे तो लगता है कि जब मैं मरने के बाद उस पार जाउंगा तो वहां तक गोल मेज़ होगी, बड़ी सी। जिस के चरों तरफ खूब सारी कुर्सियाँ लगी होंगीं। और उन कुर्सियों में से एक पर अल्लाह बैठा होगा, एक पर जीसस बैठा होगा, एक पर रब्ब बैठा होगा, एक पर बाबा नानक होगा, एक पर भगवन शिव, एक पर भगवन विष्णु। और ऐसे ही एक-एक कुर्सी पर सब के खुदा बैठे होंगे। और फिर जो नौकर होगा इन सब का वो आवाज़ देगा कि चलो भाई अल्लाह वाले इधर आ जाओ। तो अल्लाह मुझे सामने खड़ा कर के मेरा हिसाब किताब करेगा और फैसला होगा। फिर मेरे बाद तुम्हारी बारी होगी तो तुम्हें बाबा नानक के पास जाना होगा, ऐसे ही होगा भाई।
और ठहाका लगा कर हंस पड़े।
हम सभी हंस पड़े। वे कहने लगे कि देखो हम सब को यही बताया जाता है कि मरने के बाद हमारा फैसला होगा। और सब के अलग अलग भगवन फैसला करते हैं तो ऐसा होना लाजिम है। सब को अपने अपने खुदा के पास तो जाना ही होगा।

Pritpal Kaur. Masters in Physics and Education, Pritpal Kaur started her journey into the world or words sometime around 1992-93. While working as casual announcer at AIR her short stories were published in Delhi press magazines and Hans. As she grdauated to television, she reported for the newsmagazine ‘Parakh’ telecast on Doordarshan. Later she joined NDTV as a full time correspondent, where she worked in the newsroom for close to six years before she left in 2002 for personal reasons.Her novel ‘half moon’ was published in the year 2012.

दोपहर का वक़्त उस रोज़ कब गुज़र गया पता ही नहीं चला। खाने के बाद उन्होंने कुछ देर आराम किया और फिर चले गए। अगले दिन उन्हें वापिस पाकिस्तान जाना था फिर उनसे मेरी मुलाक़ात उस बार नहीं हुयी।
इस के बाद वे कई बार दिल्ली आये और उनसे मुलाक़ात भी हुयी, कभी किसी जलसे में कभी किसी के घर पर। कुछ ज्यादा बातचीत नहीं हुयी। जितना में समझ पाई वे मितभाषी थे। लेकिन जब लिखते थे तो गज़ब लिखते थे। उनकी सारी संवेदनाएं उनके लेखन में शामिल हो जाती थीं।
कुछ चार साल पहले मुझे लाहौर जाने का मौक़ा मिला और मैंने फ़ौरन लपक लिया। वजह कि वो मेरी माँ का शहर है। जो एक बार वहां से आने के बाद कभी लौट कर नहीं जा पायीं। और मरने तक अक्सर खवाबों में लाहौर को देखती रहीं और कहती रहीं कि देखो आज रात मैंने फिर ख्वाब में लाहौर देखा। मैंने लाहौर देखा तो मैंने समझा कि इस शहर में क्या था जिसने मेरी माँ को ज़िंदगी भर ख्वाबों में सताना बरकरार रखा।
खैर मैं लाहौर गयी तो लाजिम था कि इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) से मुलाक़ात की जाती। तय हुआ कि एक शाम मैं उनके घर जाऊंगी चाय पीने के लिए।
मैंने उनके पता हासिल किया, टैक्सी मंगवाई और निकल पड़ी।
उनका घर है पुराने लाहौर की एक गली की शुरुआत में जो मैं ठीक से समझ नहीं पाई और जो ड्राईवर मेरे साथ था वो मुझ से भी बढ़ कर अनाड़ी निकला।
मैंने उस पर भरोसा किया कि समझ गया होगा और मुझे सीधे उनके घर ले जाएगा और उसको मुझ पर भरोसा था कि बीबी ने समझ लिया है खुद ही रास्ता बताती रहेगी।
सो हमारी कार गली में पहुँची और उनका घर पार कर के आगे और आगे चलती चली गयी। हम गलियां-दर-गलियां मुड़ते गए और जाने कहाँ पहुँच गए। जो स्कूल उन्होंने बताया था उसका कहीं नाम ठिकाना तक नहीं नज़र आ रहा था। खैर मैंने उन्हें फ़ोन लगाया, ड्राईवर से बात करवाई लेकिन बात कुछ बनी नहीं।
इतना समझ में आया कि हम आगे निकल गए हैं। मैंने ड्राईवर से कहा कि गाड़ी घुमाये और वापिस जहाँ से आये हैं वहीं चले।
जब हम कई गलियां मुड़ के गली के मुहाने पे पहुंचे तो पाया कि वे सड़क पर खड़े हमारा इंतजार कर रहे थे। उन्होंने हाथ हिला-हिला कर हमें रोका। ड्राईवर को एक मीठी डांट पिलाई और मुझे अन्दर ले कर गये।
वे अकेले रहते थे। घर बेहद साफ़ -सुथरा, बड़ा सा लिविंग रूम जिसमें चरों तरफ कालीन बिछे हुए, जिनसे पूरा फर्श ढंका हुआ था। एक नौकर था जो बेहतरीन चाय बना कर लाया। कहना न होगा चाय लाहौर में बड़ी उम्दा पिलायी जाती है। वजह शायद यह कि श्रीलंका से आती है। बेहद उम्दा क्वालिटी की चाय।
जब मैं उनके घर में दाखिल हुई तो वहां सिर्फ इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) साहिब थे और उनका नौकर। कुछ ही देर में उनके शाम के दोस्त आने शुरू हो गए। पता लगा कि हर शाम इसी तरह उनके घर में दोस्त इकठा होते हैं। चाय के दौर चलते हैं, खाना पीना होता है और रात के खाने से पहले सब लोग अपने अपने घर को लौट जाते हैं। एक नियम सा है।
उन्होंने मेरा परिचय अपने दोस्तों से करवाया। बताया कि दिल्ली से आयी है। मेरा नाम उन्हें अटपटा तो लगा लेकिन फ़ौरन ही आए लोग भी समझ गए कि मेरे पुरखे लाहौर शहर से होंगे तभी मैं खिंची आयी हूँ इस शहर में।
दोस्तों में एक पुलिस अधिकारी भी थे। उन्होंने मुझसे पूछा कि मुझे लाहौर में कैसा लग रहा है। तो मैंने सच्चाई बयां की कि मुझे नहीं लग रहा कि में किसी पराये मुल्क में हूँ ।
इस पर उन्होंने कुछ हैरत ज़ाहिर की। जिस पर मुझे हैरत हुयी। क्यूंकि अक्सर पाकिस्तान जाने वाले यही कहते हैं कि पाकिस्तान के लोग बेहद मेहमान नवाज़ हैं।
एक बेहद खुशनुमा शाम मैंने इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) के घर पर उनके दोस्तों के साथ गुज़री।
बहुत बातें हुईं लेकिन वैसी कोई मज़ेदार बात नहीं हो पाई।
दोस्तों का जमघट लगा रहा। इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) वैसे भी बहुत कम बात करते हैं सो और लोग बातें करते रहे।
मुझ से हिंदुस्तान के बारे में बहुत कुछ पूछते रहे। मेरे उस परिवार के बारे में पूछते रहे जो पार्टीशन के वक़्त और उससे पहले लाहौर और साहिवाल से हिंदुस्तान चला गया था।
अफ़सोस भी ज़ाहिर किया गया कि मैं वीसा की पाबंदी की वजह से लाहौर के बाहर पत्तोकी और साहिवाल नहीं जा सकती जहाँ मेरे परिवार की खेती की ज़मीने थीं।
मैं जब उनसे विदा ले कर वापिस आ रही थी तो उन्होंने वादा किया था कि एक बार फिर मेरे घर आयेंगे खाने पर। ऐसा हुआ भी उसके अगले साल लेकिन उस वक़्त मैं खुद ही भारत से बाहर थी और उनसे मुलाक़ात नहीं कर सकी।
उसके बाद फिर कभी इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) से मुलाक़ात नहीं हुयी।
लेकिन उनकी मीठी आवाज़ और ठहरे हुए स्वर आज भी कानों में गूंज रहे हैं। उनका शांत चेहरा आँखों के सामने है और मुझे इस बात का यकीन है कि अब तक उनकी मुलाक़ात उनके अल्लाह से हो चुकी होगी।
वे उस गोल मेज़ से भी रूबरू हो चुके होंगे । और मेरे जैसे कई सिख भी उन्हें वहां मिले होंगें जो अपने रब्ब के सामने हाजरी भर रहे होंगें।
वे वहां भी अपनी उसी मीठी आवाज़ से सबका दिल जीत रहे होंगे।
अलविदा इंतजार हुसैन (इंतिज़ार हुसैन) साहिब।
शायद फिर कभी आपसे मुलाव्कात हो जाये। उम्मीद पर सभी जहाँ कायम हैं।