इतनी मुस्तैदी तो सरकार तब भी नहीं दिखाती चाहे कोई माल्या माल लेकर निकल जाए
इतनी मुस्तैदी तो सरकार तब भी नहीं दिखाती चाहे कोई माल्या माल लेकर निकल जाए
गंगाजल बनाम पेयजल
जीयानन्द शर्मा
हमें भला क्या आपत्ति हो सकती है कि डाकिया अगर आपके घर में चिट्ठी की जगह गंगाजल ले आए। कम से कम प्यास से मर रहे लोगों के गले में अगर गंगाजल की एक बूंद की चली जाए तो इसमें विपक्ष या साधु-संतों को भला क्यों आपत्ति होनी चाहिए। घर-घर ऑन लाइन गंगाजल पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध सरकार की सोच शायद वहां तक पहुंची हो या न पहुंची हो लेकिन हम जैसे खुराफाती दिमाग वालों का दिमाग काफी आगे तक चलता है। इसलिए हम इसके दो फायदे देख रहे हैं। पहला तो यही कि प्यास से मरने वाले के गले में गंगाजल पहुंचने से संभावना है कि उसे कुछ सांसें और मिल जाएं और अगर ऐसा न भी हुआ तो भी मरने से पहले गंगाजल का सेवन उसे स्वर्ग मार्ग पर तो डाल ही देगा। न मरने वाले को और न उसके सगे-सम्बन्धियों को इस बात का मलाल रहेगा कि मरते हुए आदमी को गंगाजल तक नसीब नहीं हुआ।
अब इसमें हंगामा करने जैसी कौन सी बात है। लेकिन नहीं, विपक्ष को तो कोई मुद्दा चाहिए, सो मिल गया। कर्मजले इतना तक नहीं सोचते कि कम से कम मरने वाले की आत्मा की शांति के सदके में तो अपना मुंह बन्द रखें। कम से कम उसके अच्छे दिनों पर तो ग्रहण न लगाएं, भले ही वह इहलोक में नहीं परलोक में ही क्यों न आएं।
लॉजीकली भी अगर आप देखेंगे तो इस देश में भला डाकिए का काम ही क्या रह गया है। चिट्ठी-पार्सल का ज़माना तो अब रहा नहीं। देश डिजिटल हो गया है। हर काम की तरह संदेश भी ऑनलाइन हो गए हैं। ईमेल, फेसबुक, वाट्सएप, ब्लॉग, ट्वीटर जाने क्या-क्या साधन हैं संदेश भेजने के। अब कौन मूर्ख है जो डाकखाने जाएगा, अंतर्देशीय या पोस्टकार्ड लाएगा, देर तक उन पर कलम घिसेगा, थूक से लिफाफे पर टिकट चिपकाएगा, फिर कहीं जा कर चिट्ठी को पोस्ट करने के लिए लैटर बॉक्स ढूंढेगा। वह भी अगर नज़दीक में मिले तो गनीमत मानों। इतना फालतू वक्त आपके पास होगा तो पता नहीं, कम से कम मेरे पास तो बिल्कुल नहीं है। थोड़ा-बहुत डाक का काम बच गया था सो कुरियर सर्विस वालों ने सम्भाल लिया। मनीऑडर का भी कोई लफड़ा अब बचा नहीं, वह भी ऑनलाइन ट्रांसफर हो जाता है। तो सरकार का क्या माथा फिरा है कि बैठे-बिठाए किसी को मुफ्त की तनख्वाह देती फिरे।
सरकार तो जनता की भलाई ही चाह रही है और कर रही है। लोग बेवजह इस मुद्दे को तूल देकर ‘गंगाजल बनाम पेयजल’ बनाने की कोशिश कर रहे हैं।
अरे भई, सरकार प्यासे लोगों की प्यास बुझाने के भी तो पूरे इंतज़ाम कर ही रही है। क्या आपने कभी सुना कि पानी भरने के लिए धारा 144 लगाई गई हो। लेकिन सरकार ने लगाई ताकि अव्यवस्था न फैले। लोग शांति से पानी भरें और वन पीस में घर जाएं। सिर-फुटव्वल न हो। क्या आपने कभी सुना कि पानी पर फौज का कड़ा पहरा लगा दिया गया हो ताकि हर कोई पानी की चोरी न कर सके। लेकिन सरकार ने नदी-नहरों के चप्पे-चप्पे पर फौज तैनात की या नहीं? इसलिए ताकि कोई ऐरा-गैरा, नत्थू-खैरा पानी न चुरा सके। इतनी मुस्तैदी तो सरकार तब भी नहीं दिखाती चाहे उनके मंजे के नीचे से कोई माल्या माल लेकर निकल जाए। पानी को लेकर इतनी गंभीरता कभी किसी सरकार की आपने देखी? कहीं अगर कोई कमी रह भी रही है तो उसके लिए पानी की ट्रेनें चल रही हैं। अब अगर कोई पानी के टैंकर को लोगों तक पहुंचाने के बजाय किसी गरीब होटल वाले को बेच देता है या किसी नेता के घर पहुंचा देता है तो इसमें भी बुरा मानने वाली क्या बात है, वे सब भी तो बेचारे इंसान नहीं हैं। उन्हें भी तो पानी चाहिए कि नहीं। लेकिन ये तो हद हो गई। पहले कम से कम साधु-संत तो सरकार की हां में हां मिलाते थे, कुछ तो बढ़ चढ़कर स्टार प्रचारक की तरह काम करते थे लेकिन गंगाजल को ऑन लाइन करने के चक्कर में वे भी लाइन से बाहर हो गए।
अजी, किस्सा खत्म कीजिए और अच्छा काम होने दीजिए। अब इसमें क्या फर्क पड़ता है कि आपका देश छः ऋतुओं वाला देश है या सबसे पुरानी सभ्यताएं इसी देश की नदियों के किनारों पर बसी थीं या देवनागरी की वर्णमाला में जितने अक्षर हैं उन में से अधिकतर अक्षरों के नाम से कोई न कोई नदी इस देश में मौजूद है या बहती है और उसके बावजूद लोग प्यासे हैं। सरकार से जो भी बन पड़ा वह किया है और कर भी रही है इसमें न तो किसी को बवाल खड़ा करने की ज़रूरत है और न ही शक करने की गुंजाइश बाकी रह जाती है।


