कॉमरेड बर्धन ने "वर्ग की अवधारणा" को भारतीय समाज की जातिगत-संरचना में खोज निकाला और कहा कि "जाति ही वर्ग" है!
सत्य प्रकाश गुप्ता
लाखों, करोड़ों छात्र-नौजवान- श्रमिक-बुद्धिजीवी कॉमरेड ए बी बर्धन की क्रन्तिकारी चेतना से उनके आज़ादी-आंदोलन की शिरकत के समय से अवगत हैं। बंगाल से महाराष्ट्र के नागपुर में उनकी राजनीति की तलवार में चमक और बढ़ गयी। छात्र-आंदोलन और देश को अंग्रेज़ों की गुलामी से आज़ाद करने के आंदोलन को एकमात्र वामपंथी छात्र आंदोलन अखिल भारतीय छात्र संघ ( All India Student Federation ) नेतृत्व कर रहा था और कॉमरेड AISF का नेतृत्व कर रहे थे। अर्थशास्त्र से MA और कानून की डिग्री के बाद वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के कार्यकर्त्ता बने, श्रमिकों के आंदोलन का नेतृत्व किया और महाराष्ट्र विधानसभा में विधायक भी चुन कर गए। अंग्रेजी, हिंदी, मराठी के आकर्षक वक्ता रहे।
वाम-मोर्चा को एकीकृत करने की मुहीम वे लगातार करते रहे। वैश्विक उदार अर्थनीति के खिलाफ उन्होंने ट्रेड यूनियन के साथ-साथ गैर-कांग्रेस व् गैर भाजपा पार्टियों को भी एकीकृत करने का प्रयास किया। देश में बढ़ते धार्मिक-साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के खिलाफ राजनीतिक पार्टियों को कई-बार एक प्लेटफार्म पर लाने की कोशिश की और कामयाब भी हुए।
बर्धन जी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के लम्बे समय ( 1995-2012) के महासचिव रहे। 1924-2016 का भारत के समाज ने उन्हें बड़ा नेता बनते देखा और समाज ने उन्हें गरीबों के लिए संघर्ष करते देखा है। कई मुलाकातें हुईं, खुद अपना खाना लेते हुए उनको कई बार देखा, कई बार ससम्मान उनसे मुलाकात भी होती थी। देश में कुछ नेता अगर ईमानदार, कर्मठ , जुझारू नेता हैं तो उनमें से एक नेता कॉमरेड बर्धन रहे जो आज हमारे बीच नहीं रहे। उन्हें श्रद्धांजलि और लाल सलाम।
अपने छात्र जीवन में पहली बार श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में अखिल भारतीय नौजवान संघ के सम्मलेन में मैंने कामरेड बर्धन को सारगर्वित भाषण देते सुना था। फिर अपने जिला बेगुसराय में एक जनसमूह में भी उन्हें सुना और उसके बाद दिल्ली में उनसे कई बार मुलाक़ात होती थी। हँसते समय कृष्ण-मुख में सफ़ेद दन्त-पंक्ति उनके व्यक्तित्व को और भी खूबसूरत कर देती थी।
मंडल - विरोधी-आंदोलन में उनका राजनीतिक हस्तक्षेप बड़ा व्यापक रहा और उस समय उनकी एक किताब छात्रों-नौजवानों और देश के बुद्धिजीवियों ने खूब पढ़ी। उस वक़्त उनके भाषणों को लोग सहज और असहज भाव से सुनते और पढ़ते थे। जब उन्होंने कहा कि भारत में पिछड़ी, दलित जाति के अधिकांश जनता शोषित हैं और आर्थिक-सामाजिक रूप से अत्यंत पिछड़ा है और उस समय एकमात्र वामपंथी राजनीतिज्ञ की हैसियत से कामरेड बर्धन ने "वर्ग की अवधारणा" को भारतीय समाज की जातिगत-संरचना में खोज निकाला और कहा कि "जाति ही वर्ग" है!
कम्युनिस्ट पार्टी और उसके जनसंगठन में बिखराव आना शुरु हुआ लेकिन प्रतिबद्ध कम्युनिस्ट कॉलेजों, विश्विद्यालयों में पिछड़ी और दलित छात्रों के आगे ढाल बनकर खड़े रहे, आंदोलन जारी रहा...!
"पोस्ट-मंडल" ने देश की राजनीति में शिक्षित, गरीब और कमज़ोर आवाज़ को मुखर होते देखा। कामरेड बर्धन ने इस बात को बड़ी शिद्दत से देखा होगा, इतिहास के गर्भ में दफ़न होते इंसानों की पीढ़ियों की आवाज़ इतिहास की आवाज़ बन गयी और इसीलिए कॉमरेड बर्धन पार्टी और इनसे जुड़ी जनसंगठनों की कीमत पर "जाति की अवधारणा को वर्ग की अवधारणा" पर बल देते रहे और अगर भारत की वामपंथी राजनीति को उस समय अगर किसी ने दिल-दिमाग खोलकर व्याख्या की तो वे सिर्फ व सिर्फ कॉमरेड बर्धन रहे। हंगामा हुआ, वामपंथ से लेकर धुर-वामपंथी बुद्धिजीवियों ने कामरेड बर्धन की सामाजिक विश्लेषण व वर्ग की अवधारणा के प्रति समझदारी पर हमला शुरू कर दिया था, लेकिन वे तो भारत की विशाल सामूहिक चेतना के साथ यात्रा कर रहे थे।
पार्टी कमज़ोर हुई, परवाह नहीं, उसे फिर से मज़बूत करते रहे। उत्तर भारत और देश के दूसरे राज्यों में "पोस्ट-मंडल" राजनीति में अनेक नेताओं का जाति व धर्म के नाम पर सत्ता की होड़ लगी है। कामरेड बर्धन को भारतीय समाज के सामाजिक-सांस्कृतिक-बोधक राजनीतिज्ञ माना जाएगा जिन्होंने मार्क्सवाद को भारतीय समाज की संरचना में देखने की सैद्धान्तिक व व्यावहारिक कोशिश की। शायद पोस्ट-मंडल राजनीति पर वामपंथ का नियंत्रण हो सकता था लेकिन वामपंथी पार्टियां मंडल को लेकर बँटी हुई थीं। बर्धन आधुनिक भी उतने जितने प्रगतिशील परम्पराओं के रक्षक व वाहक भी बने रहे। संवेदनशील और सामाजिक-यथार्थ के परख दार थे।
देश में कुछ नेता अगर ईमानदार, कर्मठ, जुझारू नेता हैं तो उनमें से एक नेता कॉमरेड बर्धन रहे जो आज हमारे बीच नहीं रहे। उन्हें श्रद्धांजलि और लाल सलाम।
सत्य प्रकाश गुप्ता, लेखक फिल्म निर्देशक हैं।