मध्य वर्ग का बदलता चरित्र -1
अनिल राजिमवाले
(विगत 26 अप्रेल 2013 को जाने माने विचारक अनिल राजिमवाले का व्याख्यान रायगढ़ इप्टा और प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) के संयुक्त आयोजन में हुआ था। इसके बाद 27 तथा 28 अप्रेल को रायगढ़ इप्टा द्वारा वैचारिक कार्यशाला भी आयोजित की गयी। अनिल जी ने मध्य वर्ग के बदलते चरित्र पर विस्तार से रोशनी डाली। उनके व्याख्यान का लिप्यान्तरण, उषा आठले के सौजन्य से इप्टानामा पर प्रकाशित है। इस महत्वपूर्ण व्याख्यान को हम यहाँ किस्तों में दे रहे हैं -हस्तक्षेप )
आज के भारत की कई विशेषताओं में एक विशेषता यह है कि मध्य वर्ग एक ऐसा उभरता हुआ तबका है, जिसकी संख्या, जिसका आकार और जिसकी अन्तर्विरोधी भूमिका बढ़ती जा रही है। इस विषय को लेकर कई तरह के मत प्रकट किए जा रहे हैं, चिंतायें प्रकट की जा रही हैं, आशायें प्रकट की जा रही हैं। और कभी-कभी यह देखने को मिलता है कि प्रगतिशील और वामपंथी आन्दोलन के अन्दर एक प्रकार की आशंका भी इस बात को लेकर प्रकट की जा रही है।

जिसे हम मध्यम वर्ग कहते हैं, मिडिल क्लास, हालाँकि इसे मिडिल क्लास कहना कहाँ तक उचित है, यह भी एक शोध कार्य का विषय है - यह हमारे समाज का, दुनिया के समाज का काफी पुराना तबका रहा है। इतिहास में इसने हमारे देश में और दुनिया में बहुत महत्वपूर्ण भूमिकायें अदा की हैं, इसे मैं रेखांकित करना चाहूँगा। आप सब औद्योगिक क्रान्ति और उस युग के साहित्य से परिचित हैं। मार्क्स और दूसरे महान विचारकों, जिनमें वेबर और दूसरे अनेक समाजशास्त्रियों ने इस विषय पर काफी कुछ अध्ययन किया है, लिखा है। इसलिये मध्य वर्ग एक स्वाभाविक परिणाम है, वह दरमियानी तबका, जो औद्योगिक क्रान्ति के फलस्वरूप पैदा हुआ। इसका चरित्र अनेक सामाजिक-सांस्कृतिक कारणों और कारकों से तय होता है। जब इस दुनिया में पूँजीवाद आया, और जब हमारे देश में भी जब पूँजीवाद आया तो उसकी देन के रूप में मध्य वर्ग आया - उसका एक हिस्सा मिडिलिंग सेक्शन्स थे। फ्रेंच में एक शब्द आता है - बुर्जुआ, जो अँग्रेजी में आ गया है और बाद में हिन्दी में भी आ गया है। दुर्भाग्य से आज क्रान्तिकारी या चरम क्रान्तिकारी लोग हैं, वे इस शब्द का उपयोग गाली देने के लिये इस्तेमाल करते हैं। बुर्जुआ का अर्थ होता है मध्यम तबका। यह मध्य वर्ग तब पैदा हुआ जब यूरोप में सामन्ती वर्ग और मज़दूर वर्ग के बीच में एक वर्ग पैदा हुआ।

अगर आप फ्रांसीसी क्रान्ति और यूरोपीय क्रान्तियों पर नज़र डालें तो इसमें सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों और क्रान्तियों में मध्यम वर्ग की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका नज़र आती है। मध्यम वर्ग वह वर्ग था, जिसने उस दौर में सामन्ती मूल्यों, सामन्ती संस्कृति, और सामन्ती परम्पराओं के खिलाफ़ विद्रोह की आवाज़ उठायी। जिसका एक महान परिणाम था 1779 की महान फ्रांसीसी क्रान्ति। फ्रांसीसी क्रान्ति एक दृष्टि से मध्यम वर्ग के नेतृत्व में चलने वाली राज्य क्रान्ति के रूप में इतिहास में दर्ज़ हो चुकी है। सामन्तवाद विरोधी क्रान्तियाँ तब होती हैं, जब पुराने सम्बंध समाज को जकड़ने लगते हैं, परम्परायें जकड़ने लगती हैं और जब मशीन पर आधारित उत्पादन, नई सम्भावनायें खोलता है। हमारे यहाँ भी भारत में अँग्रेजों के ज़माने में एक विकृत किस्म की औद्योगिक क्रान्ति हुयी थी आगे चलकर। यूरोप पर अगर नज़र डाली जाये तो यूरोप में बिना मध्यम वर्ग के किसी भी क्रान्ति की कल्पना नहीं की जा सकती है। महान अर्थशास्त्री, राजनीतिज्ञ, विचारधारा को जन्म देने वाले विद्वान मुख्य रूप से मध्य वर्ग से ही आये थे। वॉल्टेयर, रूसो, मॉन्टिस्क्यो, एडम स्मिथ, रिकार्डो, मार्क्स, एंगेल्स, हीगेल, जर्मन दार्शनिक, फ्रांसीसी राजनीतिज्ञ, इंग्लैण्ड के अर्थशास्त्रियों ने औद्योगिक क्रान्ति के परिणामों का अध्ययन और विश्लेषण कर नई ज्ञानशाखाओं को जन्म दिया। सामाजिक विज्ञानों के क्षेत्र में, साहित्य में, प्राकृतिक विज्ञान के क्षेत्र में - चार्ल्स डार्विन को कोई भुला नहीं सकता, न्यूटन तथा अन्य वैज्ञानिकों ने हमारी विचार-दृष्टि, हमारा दृष्टिकोण बदलने में सहायता की है। और इसलिये जब हम औद्योगिक क्रान्ति की बात करते हैं तो यह मध्यम तबके के पढ़े-लिखे लोग, जो अभिन्न रूप से इस नई चेतना के साथ जुड़े हुये हैं। ऐसा इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ था। यह भी एक विचारणीय विषय है कि औद्योगिक क्रान्ति से पहले का जो मानव-विकास का युग रहा है, उसमें जो बुद्धिमान लोग रहे हैं और औद्योगिक क्रान्ति के युग में जो बुद्धिमान विद्वान पैदा हुये हैं, उनमें क्या अन्तर है? उन्होंने क्या भूमिका अदा की है? मैं समझता हूँ कि जो पुनर्जागरण पैदा हुआ, जो एक नई आशा का संचार हुआ, जो नये विचार पैदा हुये - समाज के बारे में, समानता के बारे में, प्राकृतिक शक्तियों को अपने नियन्त्रण में लाने, सामाजिक शक्तियों पर विजय पाने, कि ये जो आशायें पैदा हुयीं इससे बहुत महत्वपूर्ण किस्म की खोजें हुयीं और इनसे मानव-मस्तिष्क का विकास, मानव-चेतना का विकास इससे पहले उतना कभी नहीं हुआ था, जितना औद्योगिक क्रान्ति के दौरान हुआ। और इसका वाहक था - मध्यम वर्ग। इस मध्यम वर्ग की खासियत यह है, उस के साथ एक फायदा यह है कि वह ज्ञान के संसाधनों के नज़दीक है। इस पर गहन रूप से विचार करने की ज़रूरत है। जब हम मध्यम वर्ग के एक हिस्से को बुद्धिजीवी वर्ग कहते हैं, इनन्टेलिजेन्सिया, जो ज्ञान के स्रोतों, उन संसाधनों के नज़दीक है, यह उनका इस्तेमाल करता है, जो समाज के अन्य वर्ग नहीं कर पाते हैं, दूर हैं। पूँजीपति वर्ग उत्पादन में लगा हुआ है, पूँजी कमाने में लगा हुआ है और उसके लिये ज्ञान का महत्व उतनी ही दूर तक है, जिससे कि उत्पादन हो, कारखाने लगें, यातायात के साधनों का प्रचार-