इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला शिक्षा में समान अवसरों की गारंटी की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला शिक्षा में समान अवसरों की गारंटी की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
आरटीई फोरम ने किया इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत
नई दिल्ली, 19 अगस्त 2015। आरटीई फोरम ने सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पुनर्स्थापित करने के मद्देनजर इलाहाबाद हाईकोर्ट द्वारा कल मंगलवार को सुनाये गये उस फैसले का हार्दिक स्वागत किया है जिसके तहत निर्देशित किया गया है कि जन प्रतिनिधियों, नौकरशाहों और अन्य उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों, न्यायाधीशों के बच्चों का प्राइमरी स्कूलों में पढ़ना अनिवार्य है।
आरटीई फोरम के राष्ट्रीय संयोजक, अम्बरीष राय ने कहा कि दिनों-दिन बदहाली की तरफ बढ़ रहे प्रदेश के सरकारी स्कूलों में पठन-पाठन का स्तर सुधारने की दिशा में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया यह फैसला एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
श्री राय ने कहा कि इस फैसले ने 1966-68 में देश में प्रो. कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा पर गठित पहले आयोग द्वारा की गई अनुशंसाओं को फिर से बहस में ला दिया है जिसमें समान स्कूल प्रणाली की बात की गई थी। यह न केवल शिक्षा-व्यवस्था में बढ़ती असमानताओं को खत्म कर सबके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के समान अवसरों की गारंटी करेगा, बल्कि सरकारी स्कूलों की दुर्दशा एवं राज्य के नियंत्रण से मुक्त प्राइवेट स्कूलों की महंगी शिक्षा व्यवस्था तक पहुंचने में अक्षम होने के कारण शिक्षा के दायरे से बाहर रह गए करोड़ों-करोड़ गरीब, वंचित जनता के लिए भी शिक्षा के दरवाजे खोलेगा। उन्होंने कहा कि संविधान द्वारा हर बच्चे को दिये गये शिक्षा के मौलिक अधिकार की गारंटी के लिए बनाये गये शिक्षा अधिकार कानून, 2009 के वास्तविक अमलीकरण के लिए राज्यपोषित सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था के ढांचे को दुरुस्त करने के अलावे कोई विकल्प नहीं है। उन्होंने कहा कि यह फैसला एक ऐसे समय में आया है जब देश भर में शिक्षा नीति को पुनर्गठित करने की बात चल रही है। ऐसे में जरूरी है कि शिक्षा नीति में किसी भी किस्म का बदलाव व्यापक जनता के सरोकारों को ध्यान में रखते हुए किया जाए और समावेशी शिक्षा नीति को तरजीह दिया जाए। इस फैसले को ऐतिहासिक बताते हुए उन्होंने कहा कि अगर यह सही मायनों में लागू हुआ तो देश भर के सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता बढ़ाने और शिक्षा-व्याप्त में में व्याप्त विषमताओं को दूर करने की दिशा में एक नजीर का काम करेगा।
गौरतलब है कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सुधीर अग्रवाल ने शिव कुमार पाठक एवं अन्य की याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए कल यह फैसला दिया है कि उत्तर प्रदेश के सभी सरकारी कर्मचारियों के बच्चे सरकारी स्कूलों (प्राथमिक विद्यालय) में पढ़ेंगे।
हाईकोर्ट ने आदेश दिया है सभी एमपी, एमएलए, आईएएस के बच्चे सरकारी स्कूल जाएंगे। साथ ही अगर सरकारी कर्मचारियों ने अपने बच्चों को कांवेंट में पढ़ाया तो उन्हें उसके बराबर की फीस सरकारी खजाने में जमा करना होगा।
हाईकोर्ट ने यूपी के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वह अन्य अधिकारियों से परामर्श कर यह सुनिश्चित करें कि सरकारी, अर्द्धसरकारी विभागों के सेवकों, स्थानीय निकायों के जन प्रतिनिधियों, न्यायपालिका और सरकारी खजाने से वेतन, मानदेय या धन प्राप्त करने वाले लोगों के बच्चे अनिवार्य रूप से बोर्ड द्वारा संचालित स्कूलों में शिक्षा प्राप्त करें। वहीं, ऐसा न करने वालों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने मुख्य सचिव से छह महीने बाद उक्त कार्रवाई की रिपोर्ट भी मांगी है। यूपी के जूनियर और सीनियर बेसिक स्कूलों की दुर्दशा पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह सख्त कदम उठाया है।
फैसले में स्पष्ट तौर पर कहा गया है कि ‘‘अधिकारियों के बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ने के लिए अनिवार्य नहीं करने से इन स्कूलों की यह दुर्दशा है। इनमें न योग्य अध्यापक हैं और न ही मूलभूत सुविधा। ऐसे में जब तक ऐसे सरकारी स्कूलों में बड़े घरों के बच्चे नहीं पढ़ेंगे, तब तक इनकी दशा में सुधार नहीं होगा। देश की आजादी के 68 साल बीत जाने के बाद भी इन स्कूलों में मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं। ऐसे में सरकारी अधिकारियों, जनप्रतिनिधियों और राजकीय मदद ले रहे लोगों के बच्चों को बोर्ड के स्कूलों में पढ़ाना अनिवार्य किया जाए।”
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