बिजली कर्मचारियों व इंजीनियरों की बिल के विरोध में व्यापक आन्दोलन की तैयारी | बिजली अभियन्ताओं ने केन्द्रीय विद्युत मंत्री से किये पांच सवाल
नई दिल्ली/ लखनऊ। बिजली आपूर्ति के सम्पूर्ण निजीकरण हेतु केन्द्र सरकार द्वारा लोकसभा में रखे गये इलेक्ट्रीसिटी (एमेन्डमेन्ट) बिल 2014 और संसद की ऊर्जा मामलों की स्टैडिंग कमेटी ने प्रतिवेदन आमंत्रित कर चर्चा शुरू कर दी है। केन्द्र सरकार इलेक्ट्रीसिटी (एमेन्डमेन्ट) बिल 2014 पर तेजी दिखा रही है उसे देखते हुए बिजली कर्मचारियों एवं इंजीनियरों ने भी व्यापक आन्दोलन की तैयारी शुरू कर दी है।
स्टैडिंग कमेटी के अध्यक्ष डा0 किरीट सौमैय्या ने 14 जनवरी को सरकुलर जारी कर अमेन्डमेन्ट बिल पर प्रतिवेदन आमंत्रित किये हैं। केन्द्रीय विद्युत मंत्री पियूष गोयल ने स्टैडिंग कमेटी से अप्रैल के प्रारम्भ में रिपोर्ट देने को कहा है जिससे बिल को संसद के बजट सत्र में ही पारित कराया जा सके।
आल इण्डिया पावर इंजीनियर्स फेडरेशन के चेयरमैन शैलेन्द्र दुबे एवं उ0प्र0रा0वि0प0 अभियन्ता संघ के महासचिव डी0सी0 दीक्षित ने आज यहां बताया कि बिजली इंजीनियर स्टैडिंग कमेटी के समक्ष अपना प्रतिवेदन रखेगें और आगामी 25 जनवरी को दिल्ली में नेशनल कोआर्डिनेशन कमेटी ऑफ इलेक्ट्रीसिटी इम्प्लॉइज एण्ड इंजीनियर्स की बैठक में आन्दोलन के कार्यक्रम घोषित कर दिये जायेंगें। उन्होंने संशोधन बिल को जन विरोधी करार देते हुए कहा कि इससे केवल निजी घरानों का ही मुनाफा होगा जबकि बिजली कम्पनियों का घाटा बढ़ने के कारण आम जनता के लिए बिजली की दरें बढ़ेंगी। यदि यह बिल पारित हो गया तो विद्युत वितरण और विद्युत आपूर्ति के अलग-अलग लाईसेन्स दिये जायेंगें।
बिजली अभियंताओं ने सवाल किया है कि बिजली आपूर्ति के मामले में एक ही क्षेत्र में कई निजी कम्पनियों को लाईसेन्स देकर मोबाइल के सिमकार्ड की तरह अपनी मनपसंद कम्पनी से बिजली लेने की सुविधा जैसे- लुभावने नारे देने वाली केन्द्र सरकार को यह भी बताना चाहिए कि बिजली की कमी से ग्रस्त देश में जब वितरण नेटवर्क निजी बिजली नहीं रहेगी तो सिमकार्ड की तरह उपभोक्ता को कहां से और कैसे मनचाही बिजली मिल जायेगी। उन्होंने संशोधन बिल को पूरी तरह अव्यवहारिक बताते हुए केन्द्रीय विद्युत मंत्री पियूष गोयल को बिल पर स्वस्थ सावर्जनिक बहस का निमंत्रण देते हुए कहा कि विद्युत मंत्रालय को पहले आम जनता व बिजली कर्मचारियों को बिल के मामले संतुष्ट करना चाहिए तभी संसद में इस पर बहस हो। उन्होंने कहा कि पहला सवाल यह है कि बिजली आपूर्ति में कम्पटीशन और इसे बाजार के सहारे छोड़ने का क्या तात्पर्य है? कम्पटीशन तभी संभव है जब बिजली सरप्लस हो, कड़वी सच्चाई यह है कि देश में बिजली का अभूतपूर्व संकट है तो ऐसे हालात में किस कम्पटीशन की बात कही जा रही है।
दूसरा सवाल यह है कि बिजली वितरण कम्पनियों का घाटा साढ़े 03 लाख करोड़ रूपये से अधिक हो गया है तो सरकार यह बताये कि संशोधन बिल की किस धारा से इस घाटे की भरपाई हो सकेगी। तीसरा सवाल यह है कि कोयला और गैस के संकट के चलते लगभग 50000 मे0वा0 क्षमता के बिजली घर बन्द पड़े हैं तो इनके संचालन के लिए अमेण्डमेन्ट बिल में क्या प्राविधान है। चौथा सवाल यह कि निजी कम्पनियां औद्योगिक, वाणिज्यक और अधिक लोड वाले ऐसे उपभोक्ताओं को बिजली देना पसंद करेंगी जिनका टैरिफ अधिक होता है तो अन्य सामान्य उपभोक्ताओं का हाल क्या और बुरा नहीं हो जायेगा? और पांचवा सवाल यह है कि अरबों-खरबों रूपये खर्च करके सरकारी वितरण कम्पनियां वितरण का नेटवर्क बनायेगीं और उसके अनुरक्षण पर भारी रकम खर्च करेंगीं जबकि निजी कम्पनियां नाम मात्र का व्हीलिंग चार्ज देकर जिस नेटवर्क के सहारे मुनाफा कमायेगीं तो वितरण कम्पनियों के घाटे की भरपाई हेतु क्या बिजली टैरिफ बढ़ाकर अन्ततः आम जनता पर ही बोझ नहीं डाला जायेगा।
अभियन्ता पदाधिकारियों ने कहा कि लोकसभा में रखे गये 50 पृष्ठ के इलेक्ट्रीसिटी (एमेन्डमेन्ट) बिल 2014 के दूरगामी परिणाम हैं। अतः सरकार को कारपोरेट घरानों के अलावा आम जनता व कर्मचारियों के विचार भी जानने चाहिए अन्यथा आने वाले महीनों में बिजली के क्षेत्र में बड़ा टकराव और आद्योगिक अशान्ति होगी। इसकी सारी जिम्मेदारी केन्द्र सरकार की होगी।