संजीव कुमार “अंतिम”

चुनाव ख़त्म हो चुका है और इसी के साथ मीडिया का पीक सीजन खत्म हो गया, सब ने जम के कमाई की, प्राइम टाइम पर जम के परिचर्चा, भाषणों और जनसभाओं का घंटो लाइव कवरेज दिया गया, कुछ स्टिंग ऑपरेशन भी किये गए, पर भगाना में चार दलित नाबालिगों के साथ हुए सामूहिक बलात्कार और उनका पिछले एक महीनों से जंतर मंतर पर धरना के लिए दो मिनट का कवरेज को भी समय नहीं मिला. मिले भी कैसे, वो आलिशान पंडालों, मंचों, रंग-बिरंगे रैलियों के सामने खुले आसमान में चारकोल की लहलहाती नंगी सड़क पर बैठे सैंकड़ों पर्दर्शनकारियों की क्या बिसात. चलिए छोड़िये, उन नाबालिग पीड़ित बच्चियों और उनके समर्थन में आये लोगो की करुणा पुकार, ये पुकार राजनितिक पार्टियों के नारे या भाषण नहीं हैं जो सावन (चुनावी मौसम) आने ही गरजते हैं, ये तो पीड़ा की आवाज है, जिनके अन्दर मानव ह्दय होगा वो सिर्फ जंतर मंतर पर बैठे उन बच्चियों के कपड़े से ढंके चेहरे के बीच से झलकते उन सूखे आँखों को ही देख कर समझ लेंगे.
पर चूँकि चुनाव ख़त्म है और अब मीडिया पर ना तो कोई लालच की बंदिश है और न ही दवाब, अब तो वो कुछ जरूरी सवाल उठा ही सकते हैं. ये सवाल उठना ही चाहिए कि आखिर चुनाव प्रचार और खरीद फरोख्त पर होने वाले इतने सारे पैसे कहाँ से आते हैं, और कोई देता है भी तो क्यूँ? उसके पीछे उनकी मंशा क्या हो सकती हैं?
आज गुजरात के विकास के मॉडल की पोल खुल चुकी है. पर इसके होने से पहले ही मोदी जी और उनका गुजरात मॉडल उनके समर्थकों के लिए एक आस्था बन चुका था जिसका आधार अफवाह और झूठ के सिवा कुछ भी नहीं है. इस आस्था को तोड़ना, उसे बनाने से ज्यादा कठिन है और हम ये मीडिया से आशा भी नहीं करना चाहते है. ये तो लम्बी समय की पुकार ही उस आस्था को तोड़ सकती है. जैसा कि 1990 के दशक में राम मंदिर के नाम पर बनायी गई आस्था को समय के चक्र ने ही तोड़ा. पर सवाल ये भी उठना चाहिए कि आखिर वो कौन सा मंत्र है जिसके बिनाह पे एक झूठ को लोगों की आस्था में परिवर्तित कर दिया जाता है. राम मंदिर के सवाल पर ही आस्था के ना तो बनने और ना ही उसके टूटने की प्रक्रिया को समझाने का प्रयास किया गया. और जब तक हम उस प्रक्रिया को नहीं समझ पाएंगे, तब तक राजनीतिक वर्ग ऐसे ही एक आस्था के टूटने पर दूसरे और दूसरे के टूटने पर तीसरी आस्था को जन्म देगी और उसके नाम पर जनता को बेवकूफ बनती रहेगी.
और प्रश्न सिर्फ उस आस्था के बनने और टूटने की प्रक्रिया को समझाने तक सीमित नहीं है, हमें इस मुद्दे को गाँव, कस्बे और छोटे-बड़े शहरों के गली-कूचे और चौराहों का मुद्दा बनाना होगा, जो कि बिना मीडिया की मदद के शायद ही संभव हो. राम मंदिर हो या सोमनाथ मंदिर के दरवाजे के प्रति आस्था की राजनीति हो, हमारे देश का बुद्धिजीवी वर्ग ने बहुत ही दक्षता से उसे उजागर किया पर उनकी खोज आम जनता तक आज भी नहीं पहुँच पाई है और यही कारण है कि ऐसे तत्व हर बार एक नई आस्था के आधार पर लोगों को बेवकूफ बनाते हैं. अब राम मंदिर का प्रश्न ही ले लीजये. देश के बुद्धिजीवी वर्ग ने इस सम्बन्ध में जो खोज की वो किताबों और लेखों तक सीमित रह गई और लोगों का राम मंदिर के प्रश्न पर आस्था के टूटने में इन खोजों का शायद ही कोई महत्व होगा क्यूंकि वो तो आम जनता की उस आम समझ से टूटी कि जिस मंदिर के नाम पर बीजेपी ने छः वर्षों तक शासन किया उस मंदिर में वो एक ईंट तक नहीं लगा सकी.
इसलिए अगर हमें बदलाव जमीनी स्तर पर लाना है तो हमें सबसे पहले ये समझाना होगा कि आम लोग मुद्दों को किस प्रकार समझते हैं और हमें उसी अनुसार अपनी रणनीति बनानी होगी. हमें इस देश की बुद्धिजीवी वर्ग और आम जनता के बीच बढ़ते दूरियों को पाटना होगा. इस क्रम में मीडिया अग्रणी भूमिका निभा सकती है और अगर मीडिया वो भूमिका निभाती भी है, जिसकी संभावना बहुत कम ही है, तब भी हम बुद्धिजीवी वर्ग अपने दायित्वों को झुठला नहीं सकते हैं. हमारा दायित्व सिर्फ शोध करने और लिखने तक सीमित नहीं होना चाहिए. हमें देश की जनता से एक गहरा सम्बन्ध, एक गहरा सम्वाद बनाना होगा वर्ना, ये राजनीतिक वर्ग हमारी इस कमी का ऐसे ही फायदा उठाते रहेंगे.

संजीव कुमार, लेखक रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता हैं व छात्रों के मंच “भई भोर” व “जागृति नाट्य मंच” के संस्थापक सदस्य हैं।