इस तरह का व्यवहार दरिद्र #हिन्दी के दरिद्र रचनाकार करते हीं हैं जनरल साहब
इस तरह का व्यवहार दरिद्र #हिन्दी के दरिद्र रचनाकार करते हीं हैं जनरल साहब
बिहार में घमासान
बिहार में विधानसभा चुनावों का घमासान है। इस चुनाव के परिणाम देश की दिशा व दशा तय करेंगे। बिहार व उ0प्र0 में लोकसभा चुनाव 2014 में लोगों ने जाति के बन्धनों को तोड़ते हुये मतदान किया था। जबकि इन प्रदेशों में ऐसा कम ही होता है। यहॉं के लोग काम से अधिक जाति को तरजीह देते हैं। इन प्रदेशों में कहने को तो लोकतंत्र है, किन्तु आज भी लोगों की सामन्तवाद में आस्था है यहॉं के लोग जनप्रतिनिधियों को राजाओं की तरह देखते हैं और उसी तरह उन्हें सम्मान देते हैं। और यहॉं के जनप्रतिनिधि भी राजा महाराजाओं की तरह व्यवहार करते हैं।
लोगों का कहना है कि जल्द ही यह जातिगत आधार पर मतदान की प्रवृत्ति का लोप होगा, जबकि मेरा मानना है कि ऐसा अभी हाल के वर्षों में सम्भव नहीं है। हजारों वर्षों से समाई मानसिकता से लोग इतनी जल्दी निवृत नहीं हो सकते हमें इस तथ्य का ख्याल रखना चाहिये। लोकतंत्र में सभी वयस्कों को मत देने का अधिकार है। पिछड़ों और दलितों के वोट पूरी आबादी के 50 प्रतिशत से अधिक हैं। इन जातियों ने सदियों से सामन्तवाद को बरदाश्त किया है, पहली बार कुछ वर्षों से इन्हीं जातियों में से लोग निकलकर सामन्त बनने लगे हैं यह उनके लिये चमत्कार से कम नहीं है। अतः यह दौर उनके लिये अजूबे सा है और वे इसमें मुक्तला होकर खुश हैं उन्हें जातिवाद के दोषों का पाठ पढ़ाना उनके मनोहारी सपनों का कत्ल करने जैसा है।
बिहार में हास्यास्पद यह है कि लालू और नितीश एक हैं। बेशक पहले भी एक हुआ करते थे लालू, नितीश और पासवान जयप्रकाश जी के आन्दोलन की उपज है। राजनीति में इन तीनों ने बहुत कुछ पाया, बहुत नाम कमाया। लेकिन जैसा मैंने कहा कि राजा महाराजा लोगों को विचार से कोई लेना देना नहीं होता है उन्हें चिन्ता तो अपने साम्राज्य की होती है। यही स्थिति इन तीनों की है। लालू और पासवान को लोग तो पहले से ही जानते थे किन्तु लालू के साथ नितीश ने हाथ मिलाकर अपने को उन्हीं दोनों की श्रेणी में सम्मिलित कर लिया है।
बढ़ती हुयी भाजपा के वर्चस्व के सामने नितीश ने लालू से हाथ मिलाकर वक्त के तकाजे के मुताबिक कार्य किया, किन्तु इससे प्रबुद्धों के मध्य नितीश की साख अवश्य गिर गयी। इस गिरावट की जानकारी नितीश को अवश्य है उन्होंने लालू के साथ समझौता कर गरल का प्याला यूँ ही नहीं पी लिया. उन्हें पता है कि गठबन्धन के पश्चात उनके सामने जो मतदाताओं का हुजूम खड़ा होगा, उसे इन तमाम नैतिकताओं से कोई लेना देना नहीं है। किन्तु प्रश्न यह है कि राजद गठबन्धन की सरकार बनी तो लालू और नितीश की कब तक बनेगी ? यदि राजद गठबन्धन की सरकार बनती है तो उसकी उम्र ज्यादा नहीं होगी यह तय है, यदि उम्र का ख्याल नितीश ने किया तो बिहार में एक बार फिर अराजकता होगी यह भी तय है। राजग के लिये भी राह आसान नहीं है यदि परिणाम उनके मुताबिक हुये भी तो भी अच्छी सरकार चलाने का दावा करने वाले भाजपाइयों के लिये यह काम आसान नहीं होगा।
दिल्ली की सरकार में पासवान बड़े शालीन दिखाई देते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि वह दिल्ली की मजबूत सरकार को अस्थिर नहीं कर सकते हैं। किन्तु बिहार में सत्ता की चाभी उनके व मांझी के हाथ में होगी और इन दोनों को साथ रखना भाजपा की मजबूरी है, वरना इनसे उनके विचार मेल नहीं खाते यह सभी समझते हैं।
कुछ दिनों पूर्व भारत के एक केन्द्रीय मंत्री जनरल वी0के0 सिंह ने हिन्दी साहित्यकारों को शराबी और शराब पीकर झगड़ा करने वाला बता डाला। हिन्दी साहित्यकार बहकने लगे, यह तो हिन्दी का अपमान है।
भइया क्यों अपमान है ? जनरल वी0के0 सिंह ने कौन ऐसी नई बात कह दी यह हिन्दी साहित्यकारों का प्रमुख चरित्र है वे तो बगैर शराब पिये हुये बहके हुये रहते हैं। वैसे भी हिन्दी साहित्य आखिरी सॉंसे ले रहा है और ऐसे में इस तरह के बयान जब आ जाते हैं तो लगता है कि कहीं ये ताबूत में आखिरी कील तो नहीं है।
हिन्दी साहित्यकार झगड़ालू होते हैं यह तो जगजाहिर है निराला और पंत जैसे कालजयी रचनाकारों के मध्य झगड़ा तो जगजाहिर है। झगड़े का स्तर इतना गिरा हुआ होता था कि लोगों को यकीन नहीं आता था कि ऐसे झगड़ालूओं ने इतनी अच्छी रचनायें कैसे रच दीं।
जनरल साहब ! साहित्यकार सभी ऐसे ही होते हैं शंकालू, झगड़ालू अहम में डूबे हुये। दूसरी उन्नत भाषाओं जैसे अंग्रेजी आदि के साहित्यकार चूंकि समृद्ध होते हैं इसलिये उनकी ढकी- छुपी रहती है। बेचारे हिन्दी के साहित्यकारों का जीवन अभावों में गुजरता है उम्दा साहित्य सृजन के पश्चात भी उन्हें प्रकाशक से बहुत कुछ नहीं मिलता। यहॉं पर प्रकाशक की भी कोई गलती नहीं है वह तो व्यापारी है, अपनी दुकान तो उसे भी चलानी होती है। जब हिन्दी साहित्यकारों की किताबें बिकती ही नहीं हैं तो वह भी बेचारा क्या करें। ऐसे में जब कभी सरकार का कोई नुमाइन्दा सरकारी खर्चे पर हिन्दी साहित्यकारों को पार्टी दे डालता है तो हिन्दी साहित्यकार भूखों नंगों की तरह टूट पड़ते हैं ज्यादा पी जाते हैं फिर तो शंहशाह हो जाते हैं पहले सरकार की ऐसी-तैसी फिर आयोजक की ऐसी-तैसी अन्त में आपस में ही एक दूसरे के कपड़े उतारने लगते हैं, गाली गलौज तो छोटी सी बात है उस समय सभी कालजयी रचनाकार होते हैं दर्द इस बात का सर पर चढ़कर बोलता है कि उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे हकदार थे। इस तरह का व्यवहार दरिद्र हिन्दी के दरिद्र रचनाकार करते हीं हैं जनरल साहब। चूंकि आपने तो अपना पूरा जीवन समृद्ध अंग्रेजी और उसके एटिकेट्स वाले रचनाकारों के बीच में बिताया है इसलिये आपके लिये यह नई चीज है।
अनामदास


