जुगनू शारदेय

यह बजट का खेला बड़ा अजीब है । जो लोग ईकॉनॉमी में बजट – बजट खेलते होंगे , वह वैसे ही हारते और जीतते होंगे जैसे क्रिकेट के तथाकथित विश्व कप में
खबरिया चैनल टीआरपी युद्ध में हारते जीतते रहते हैं । दिमाग से रेल बजट निकला ही नहीं कि हमारे सामने देश के विदेश बिहार का बजट सामने आ जाता है
। समझदार राज्य प्रतीक्षा कर लेते हैं कि बजटान वित्त मंत्री प्रणव मुखर्जी के बजट में क्या हड़कान होगा ,उसी के हिसाब से अपने राज्य का बजट
पेश करते हैं । लेकिन हमारे वित्त मंत्री सुशील कुमार मोदी 25 फरवरी को ही अपना बजट पेश कर देते हैं । इस बजट की तारीफ न करने पर वह नाराज नहीं
होते , हां उप मुख्य मंत्री न कहने पर नाराज होते हैं । दुनिया में तो यही भरम उन्होने फैलाया है कि हमने ही बिहार चलाया है । आखिर बिहार के
पैसे का हिसाब किताब रखते हैं । बात भी वही कार के विज्ञापन वाली है कि बच्ची ने कहा सची तो कार बेचक मनीजर ने कहा मुची । कार खरीदना थोड़ा महंगा
हुआ बिहार में - इसे ही कहते हैं इस हाथ ले , उस हाथ दे ।
सची बात है कि उनका बजट दाल रोटी के लिए ठीक है । पर पता नहीं सिमेंट पर क्यों उन्होने कर बढ़ाया है । इससे सिर्फ मकान ही महंगा नहीं होगा , बल्कि
बिहार के अनेक प्रोजेक्ट महंगे होंगे – मालिक हो आप बिहार चला रहे हो , इंफ्रास्ट्रक्चर को भी महंगा बना रहे हो । पर आज जब प्रणव बाबू का बजट
आएगा तो न जाने कितनों को रुलाएगा । कम से कम मोदी जी रुला तो नहीं रहे हैं । अभी पता नहीं कि प्रणव बाबू अपने बजट को कितना बंगाल बनाएंगे ।
बंगाल बनाएं या न बनाएं देश भर में फैला भद्रलोक बजट से यह उम्मीद करता है कि उसकी टैक्स में कुछ छूट दे दी जाए । अभी आशा है कि यह दो लाख रुपए
तक पहुंच जाएगा । बहुत सारे लोग तो साल का इतना पेंशन ही पाते हैं । पर कुछ भी हो जाए , यह देश तरह तरह के सेवा कर से मुक्त नहीं हो सकता । कुछ
छूट के बाद सरकार कुछ लेती है तो इसी को कहते हैं इस हाथ ले , उस हाथ दे ।
प्रणव बाबू तो बजट विशेषज्ञ हैं । न जाने कितना बजट पेश कर चुके हैं । जब मनमोहन सिंह का अवतरण नहीं हुआ था तो उसके पहले वही बजट पेश किया करते थे
। फिर कुछ दिनों के लिए स्वयंभू फकीर विश्वनाथ प्रताप सिंह ने भी बजट पेश करने का काम किया । बाबू से नेता बने य़शवंत सिन्हा ने भी बजट पेश किया ।
अभी तो ऐसा लग रहा है कि पी चिदबंरम ने कभी बजट पेश ही न किया हो। जबकि 1996 में अपने पहले बजट को उन्होने ड्रीम बजट कहलाया था । तब से हम गा
रहे हैं कि रुला के गया सपना मेरा । यह बजट है ही ऐसी चीज कि बहुत रुलाता है । अब जब कोई आसानी से अपने घर का बजट नहीं बना पाते तो लोग राज्य और
देश का बजट बना डालते हैं । करना जब कुछ नहीं हो , कहीं टैक्स लगा देना है , कहीं टैक्स हटा देना है । यही तो है असली इस हाथ ले , उस हाथ दे ।