श्रीराम तिवारी

जो थे फटे दूध की मानिंद वे खीर हो गए,

भ्रष्ट नेता अब लोकतंत्र की नजीर हो गए।

सरमायेदारों की जिन -जिन पर रही कृपादृष्टि,

जीतकर चुनाव वे लुटेरे सब वजीर हो गए।

पूँजीवादी नीतियों का ही नतीजा है दोस्त,

कि अमीर अब और ज्यादा अमीर हो गए।

शिक्षा- संचार क्रान्ति के मायने क्या जबकि,

हम पहले से ज्यादा लकीर के फ़कीर हो गए।

अब तो देवता भी डरते होंगे इनसे शायद,

धंधेबाज बलात्कारी जो धर्मवीर हो गए।

भगवान् भी हैरान होगा कि क्यों मेरे वंदे,

आजकल अधिकांश दूध से पनीर हो गए।

सितमगरों के सामने झुकना मंजूर नहीं,

इसलिए हम सच के बगलगीर हो गए।

श्रीराम तिवारी , लेखक जनवादी कवि और चिन्तक हैं. जनता के सवालों पर धारदार लेखन करते हैं।