इसीलिए एक बार लड़ो, लेकिन कस के लड़ो
इसीलिए एक बार लड़ो, लेकिन कस के लड़ो
अच्छा, अभी मैं सोच रहा था कि 23 तारीख को यानी परसों श्रीराम सेंटर से साहित्य अकादमी तक लेखकों का जो जुलूस निकल रहा है, उसे मौन रखने का आइडिया किसका था।
मुझे नहीं पता कि इसकी योजना कैसे बनी। प्रलेस, जलेस, जसम आदि लेखक संगठनों ने जब भी यह तय किया हो, मौन जुलूस निकालने का फैसला बड़ा घटिया है। न तो किसी का जनाज़ा है और न शोक सभा होनी है। मामला देश में फैले खराब माहौल के विरोध का है। विरोध मुखर होना चाहिए। नहीं?
भाई, बरसों से तो लेखक बिरादरी अपने लेखन के माध्यम से मौन विरोध ही करते आ रही है। ज्यादा से ज्यादा, लेखक संगठन किसी घटना पर एक प्रेस विज्ञप्ति या दुर्लभ बयान जारी कर देते हैं। मुझे नहीं याद कि बीते वर्षों में लेखक संगठनों ने कब दिल्ली की सड़क पर उतर कर नारा लगाया था। इस बार मौका था और वाम राजनीति का दस्तूर भी।
पुरस्कृत लेखकों को जो करना था, उन्होंने कर दिया। अब जो बचे हैं, जो अलेखक हैं, छुटभैये लेखक हैं, लेखकों के समर्थक हैं, पाठक हैं, जिनके पास लौटाने को पुरस्कार तो नहीं हैं लेकिन कंठ में आवाज़ है और मुट्ठियां भी सलामत हैं, उनका इतना तो इस्तेमाल इस मौके पर होना ही चाहिए था।
परसों के बाद किसी सांगठनिक प्रदर्शन आदि की फिलहाल खबर नहीं है। अकादमी की 23 को हो रही "आपात" बैठक में जो भी फैसला होगा, उसके बाद प्रतिक्रिया में जाने क्या नज़ारे देखने को मिलें? एक नवंबर को अशोक वाजपेयी मावलंकर हॉल में एक आयोजन बेशक कर रहे हैं, लेकिन उसके कॉस्मेटिक/कांग्रेसी होने की ही ज्यादा आशंका है। उसके बाद कितना टेम्पो बच पाएगा, पता नहीं।
इसीलिए एक बार लड़ो, लेकिन कस के लड़ो। लग्घी से पानी पिलाने से क्या होगा? पता चला कि दस साल बाद यही संगठन (बचे रहे तो) विश्लेषण करते फिरेंगे कि हमने 2015 में ऐतिहासिक गलती कर दी थी। याद है? एक गलती ज्योति बसु ने भी की थी!


