लोहिया का नाम जपने वाले सपाई आज वैसे ही ड्रामेबाज लग रहे हैं जैसे बुद्ध का नाम जपने वाले भाजपाई.
मूलतः सपाई समाजवादी धोती के नीचे निक्कर ही धारण किए हुए हैं.
हाशिमपुरा फैसले के विरोध में 27 अप्रैल को लखनऊ में धरना प्रदर्शन करने वाले रिहाई मंच के नेताओं समेत सोलह लोगों पर दंगा आदि भड़काने का आरोप लगा कर पुलिस ने मुक़दमा कायम किया है. मुलायम सिंह के नेतृत्व वाली सपा सरकार के इशारे पर होने वाला यह कुकृत्य हमें अभी महाराष्ट्र सरकार के उस नियम की याद दिलाता है, जिसमें जनप्रतिनिधियों की आलोचना करने पर राष्ट्रद्रोह का मुक़दमा कायम करने की बात कही गई है.
सेक्युलर होने का दावा करने वाली सपा सरकार का यह कदम उसके सेक्युलरिज्म का भांडा फोड़ देता है. जिन लोगों पर मुक़दमा कायम किया गया है उनमें कवि, वकील, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्त्ता शामिल हैं. सपा सरकार का यह कदम हमें प्रो. कलबुर्गी की सांप्रदायिक ताकतों द्वारा हत्या किये जाने के घटनाक्रम की याद दिलाता है. सांप्रदायिक फासिस्ट ताकतें जहां एक ओर सीधी कार्रवाई में लेखकों, बुद्धिजीवियों की हत्या कर रही हैं; वहीं सेक्युलरिज्म की खाल ओढ़े हुई सपा जैसे समाजवादी रंगें सियार क़ानूनी प्रावधानों का दुरुपयोग करके कवियों, बुद्धिजीवियों पर फर्जी मुकदमे लाद कर उनकी आवाज को खामोश कर देना चाहते हैं. सांप्रदायिक फासिस्ट जिस तरह विपक्ष का कायल नहीं ठीक वही हरकत सपा की भी है.
मोदी सरकार के सत्ता में आने से पहले जिस तरह सपा ने मुजफ्फरनगर में दंगे होने दिए – वह इसका असली चरित्र है. मंदिर आंदोलन के दौर में मुलायम सिंह पर उनकी पार्टी में शामिल रहे बेनी प्रसाद वर्मा ने आरोप लगाया था कि मुलायम ने संघियों के खिलाफ उचित कार्रवाई करने में कोताही बरती. इस आरोप का खंडन मुलायम ने आज तक नहीं किया है. और नया घटनाक्रम भी इन बातों से निकलने वाले मतलब की ही ताईद करता है. इस सब के बावजूद जब मुलायम सिंह यादव नितीश पर बीजेपी से गठजोड़ की चर्चा करके अपने को शुद्ध-सेक्युलर घोषित कर रहे हैं तब उनकी अवसरवादी निर्लज्जता खुल कर सामने आती है.
वैसे सपा सरकार मोदीमीनिया के जबर्दस्त दबाव में है. मोदी की तरह ही सपा भी यूपी में मीडिया के इस्तेमाल की कोशिश में लगी है. आजकल उसके बड़े-बड़े विज्ञापन अखबारों में देखे जा सकते हैं. साफ है कौन सा अखबार राज्य के विज्ञापनों से होने वाली मोटी कमाई को छोड़ सकता है और जहां लाभ है, वहां निष्पक्षता जाए भाड़ में! जिस तरह मोदी जनता से हां बुलवाते हैं. उसी तरह मुलायम भी अभी 2-4 दिन पहले अखिलेश से हुंकारी भरवाते देखे गए.
कवि गोरख पांडे ने एक कविता लिखी थी. जिसमें उन्होंने समाजवाद के हाथी और घोड़े से आने की बात कही है- समाजवाद बबुआ धीरे-धीरे आई/..हाथी से आई घोड़ा से आई. तो हमने अभी लखटकिया बघ्घी से समाजवाद को यूपी में आते हुए देखा था... खूब धूम-धाम से. संपत्ति के नाम पर केवल एक बक्सा छोड़ कर जाने वाले लोहिया के ये समाजवादी आज लोहिया के विचारों के साथ 'दुराचार' कर रहे हैं... क्या लोहिया का आत्म-रुदन सुनाई देगा लोहिया के इन अनुयायिओं को! लोहिया जिस विश्व-नागरिकता का स्वप्न देखते थे क्या वह नागरिकों की बौद्धिक आजादी के बगैर संभव था. लोहिया का नाम जपने वाले सपाई आज वैसे ही ड्रामेबाज लग रहे हैं जैसे बुद्ध का नाम जपने वाले भाजपाई. मूलतः सपाई समाजवादी धोती के नीचे निक्कर ही धारण किए हुए हैं.
राजन विरूप
राजन विरूप, लेखक All India Students' Association (AISA) सेजुड़े हुए हैं।