उत्‍तर प्रदेश, देश की राजनीति की दिशा तय करता रहा है, यह जुमला अब धुँधलाता सा लग रहा है... बावजूद इसके 2017 में उत्‍तर प्रदेश में वर्चस्‍व की जंग के लिए हथियार पैने किए जाने लगे हैँ।
लोकसभा चुनाव और उसके बाद के राजनीतिक हालात देखते हुए काँग्रेस के लिए इस जंग की राह में ढेरों दुश्‍वारियाँ दिखाई दे रही हैं और लोकसभा चुनाव को हुए खासा वक्‍त बीतने के बाद भी अभी तक केंद्रीय नेतृत्‍व उत्‍तर प्रदेश को लेकर कोई ठोस फैसला नहीं ले सका है... प्रदेश में कांग्रेस के चेहरे पर झलकती हुई पस्‍ती लोग साफ़ देख पा रहे हैं।
प्रदेश में नेतृत्‍व परिवर्तन कर नया अध्‍यक्ष लाने की कोशिशें लोकसभा चुनाव के पहले से सुनने में आ रही हैं मगर अभी तक किन मजबूरियों के चलते अंजाम तक नहीं पहुँचाया जा सका, यह प्रश्‍न दबी जुबान से काँग्रेसी और खुली जुबान से आमजन राजनीतिक चर्चाओं में उठा रहे हैं और यही पस्‍त-हिम्‍मती अन्‍य दलों से मायूसजनों को भी काँग्रेस की और मुखातिब होने से रोक रही है।
अब प्रश्‍न उठता है कि उत्‍तर प्रदेश में कमलापति त्रिपाठी, एन.डी.तिवारी, एच.एन.बहुगुणा या वीरबहादुर सिंह जैसी राजनीतिक क्षमता और दक्षता वाला कौन नेता है काँग्रेस के पास जो प्रदेश में अध्‍यक्ष पद सँभालकर पार्टी मेँ एक नई जान फूँक सकता है और आमजन को एक बार फिर पार्टी की और मोड़ सकता है?
ऎसी मंशा दिल में पालते हुए ऊपर से इंकार में गर्दन हिलाने वालों की फेहरिश्‍त तो लंबी है किंतु अगर परिवार वाद और खानदानवाद से इतर निगाह डाली जाए तो आज की स्‍थितियों में जिस एक एक शख्‍शियत पर निगाह जाकर ठहरती है तो वह नाम पूर्व साँसद/सिने अभिनेता और असली समाजवादी वैचारिकता के साथ काँग्रेस मेँ आए राजबब्‍बर का नाम है।
राजबब्‍बर आज के विक्‍टोरियन समाजवादी खेमेँ के रँग-ढँग देख परखकर और तब उसे छोडकर वी.पी.सिँह जी के जनमोर्चा-2 ( 2007 ) के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष पद से होते हुए काँग्रेस मेँ पहुँचे, सपा के साथ एक काँटे की लडाई मेँ पराजय के तुरंत बाद सपा को ही पटकनी देकर फिर काँग्रेस साँसद बने और केँद्र मेँ सत्‍तारूढ दल के साँसद होते हुए अपने क्षेत्र में जनसमस्‍याओँ को लेकर सड़कोँ पर संघर्ष करते रहे...इसके पूर्व जनमोर्चा-2 के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष रहते हुए तत्‍कालीन सपा सरकार से दादरी भूमि अधिग्रहण के मुद्‍दे पर तगड़ा संघर्ष किया। उनकी पहचान एक संघर्षशील नेता की रही है।
आज भी प्रदेश मेँ सपा सत्‍ता में है। राजबब्‍बर के प्रदेश अध्‍यक्ष बनाए जाते ही सपा उन पर राजनीतिक निशाना साधेगी, इसका लाभ काँग्रेस को मिलेगा और एक बड़ा तबका काँग्रेस के साथ खड़ा होने के आसार बन सकते हैँ। राजबब्‍बर की धमनिरपेक्ष छवि को लेकर प्रदेश मेँ सत्‍ता पाने को आतुर भाजपा भी उन्‍हें अपने निशाने पर लेने से नहीं चूकेगी...ऎसे में वे काग्रेस के लिए कई तरफा हमलोँ का सामना कर काँग्रेस के लिए सीधे संघर्ष में आने के रास्‍ते खोल सकते हैँ और उन संघर्षो की अगुवाई कर काँग्रेस में एक बार फिर नई जान फूँक कर उसे प्रदेश की राजनीति के केंद्र में खड़ा कर सकते हैं।
अब यह फैसला तो तमाम अंदरूनी दबावों को दरकिनार कर काँग्रेस का शीर्ष नेतृत्‍व ही ले सकता है। यह तय उसी को करना है कि वह काँग्रेस को संघर्षोँ की राह पर ले जाकर जनता मेँ काँग्रेस की पैठ बनाना चाहती है या हाथ पर हाथ रख कर किसी चमत्‍कार का इंतजार करती है !!!
O- रामेन्द्र जनवार
रामेन्द्र जनवार, लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं। वे लखनऊ विश्वविद्यालय छात्रसंघ के महामंत्री व ऑल इण्डिया स्टूडेंट्स फेडरेशन की उप्र इकाई के अध्यक्ष रहे हैं।