"उत्तराखण्ड माने बाप का राज" तुम मानो या ना मानो ?
"उत्तराखण्ड माने बाप का राज" तुम मानो या ना मानो ?
ऐसी नीन्द तो कुम्भकर्ण भी नहीं सोता था,
जैसी ये नेता अफसर सन् 1975 से ले रहे हैं
चन्द्रशेखर करगैती
बल भैजी राज्य में आयी आपदा के कारणों पर मन्त्री हरक सिंह रावत का एनडीटीवी के प्राईम टाईम पर कहना है कि यह समय आपदा के कारणों पर जाने का नहीं है। गौर तलब है कि हरक सिंह रावत इस राज्य के दो-दो बार आपदा मन्त्री रहे हैं, वे यहाँ पहाड़ से विधायक भी रहे हैं, लेकिन आपदा राहत तन्त्र तथा चेतावनी तन्त्र विकसित करने के नाम पर क्या किया, इस पर वे कहते हैं कि यह चर्चा का विषय नहीं है। आखिर इन कारणों पर कब चर्चा की जायेगी, उनके पास इस बात का कोई जवाब नहीं था कि आपदा आने से पूर्व बचाव के क्या उपाय विकसित किये गये ? ये हरक सिंह रावत वही मन्त्री हैं जो केन्द्र सरकार द्वारा गंगोत्री, उत्तरकाशी और उसके आस पास के 135 के इलाके को सेंसेटिव जोन घोषित करने पर उसे डीनोटिफाईड करवाने को मुख्यमन्त्री बिज्जी भैजी के साथ दिल्ली दरबार में दस्तक दे रहे थे!
राज्य के मुख्यमन्त्री, आपदा रहत मन्त्री और अन्य वरिष्ठ मन्त्री, विधायक आपदा ग्रस्त क्षेत्रों में स्थायी कैम्प करने के बजाय देवदूतों की तरह से हेलिकॉप्टर से केवल हवाई दौरे कर रहे हैं, प्रेस कॉन्फ्रेस कर केवल बहादुर बाज बन ऐसे बयान बाजी कर रहे हैं जैसे यह सीजन की आख़िरी बारिश होगी ? गौर करने वाली बात है कि अभी वर्षा ऋतु के तीन माह बाकी हैं और आने वाला समय क्या तबाही मचायेगा इस पर कोई बात करने को तैयार नहीं है।
इन नेताओं और अफसरों को कभी अक्ल नहीं आनी, क्योंकि इनकी अक्ल के दरवाजे पर जीवीके के रेड्डी और जेपी के गौड़ और अम्बानियों के नोटों के बण्डलों का ढक्कन लगा हुआ है, जो लोगों द्वारा उपाय बताने पर भी इस नजर करने ही नहीं देता ? वरना जो तथ्य और चेतावनी मेरे जैसे सामान्य लोग पिछले तीन साल से बुक्का फाड़ कर दे रहे हैं, पर्यावरणविद् सालों से बता रहे हैं वह सत्ता में बैठे मोटी खाल वाले नेताओं को क्यों नहीं समझ में आ रहा है ?
अब समय आ गया है कि इन नेताओं की असलियत पहचानी जाये और इन्हें इनकी असली जगह पहुँचाया जाये, वो जेल से अच्छी कोई नहीं हो सकती, आखिर ये भी तो आपदा में मारे गये लोगो की मौत के कारक हैं.....
ऐसी नीन्द तो कुम्भकर्ण भी नहीं सोता था, जैसी ये नेता अफसर सन् 1975 से ले रहे हैं।
सियासत आपदा राहत कार्य में भी ?
बल भैजी उत्तरकाशी और मातली में चुने हुये प्रतिनिधि ऐसे गायब जैसे गधे के सर से सींग, लेकिन वहाँ पर अगर किसी की मौजूदगी दिखायी दे रही है तो वह हैं अपने मुख्यमन्त्री बिज्जी भैजी के सुपुत्र साकेत बहुगुणा की। अब जहाँ प्रशासन नहीं पहुँच पा रहा आखिर वे वहाँ कैसे पहुँचे ?
आखिर उनके लिये कौन सा मार्ग ढूँढा गया, हवा से गये तो हेलीकॉप्टर उड़ने की इजाजत किसने दी और हेलिकॉप्टर किसका ? सवाल ये भी कि वे क्षेत्र के अधिकारियों को किस हैसियत से दिशा निर्देश दे रहे हैं ? जब वे बिना किसी हैसियत के निर्देश दे रहे ह तो यह लाजिमी है कि कुछ जकडेत भी उनके साथ जरूर होंगे, और जकडेत होंगे तो खेल भी जरूर होगा, क्योंकि आम बाग की डील अभी बासी नहीं हुयी है ?
जहाँ चुने हुये जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के अफसरों को राहत कार्यों की कमान संभालनी चाहिये थी, वहाँ एक बेहैसियत व्यक्ति आपदा रहत कार्यों की देख रेख कर रहा है, आखिर क्यों ? क्या यह मुख्यमन्त्री के पुत्र होने की वजह से नहीं है ? अगर नहीं, तो फिर किस हैसियत से वे वहाँ हेलिकॉप्टर लेकर गये ?
सही कहते हैं अनिल स्वामी जी "उत्तराखण्ड माने बाप का राज" तुम मानो या ना मानो ?
इस बार की आपदा ने यह भी बता दिया है कि राज्य में अब सत्ता में बैठे, या अब सत्त्ताहीन हो गये राष्ट्रीय दलों के राजनेताओं की नजर में उत्तराखण्ड की हैसियत किसी किराए भाड़े के मकान से ज्यादा की नहीं है..... तभी तो आज बारह साल बीतने के बाद कभी ऐसी नीतियाँ नहीं बनायी जो यहाँ के संसाधनों को सुरक्षित रखती हों। उन्होंने ऐसी नीतियाँ बनायीं जो कम लागत में अधिक से अधिक दोहन कर मुनाफ़ा कमा सके। ताकि फ़ायदा उठाने वाला उनकी झोली भी भर सके।
अब भी ना समझे तो कब समझोगे ?


